Vivsh Jj

कानूनी सहायता NL CJ SC 15114y

Letter No; NL CJ SC 15114y Dated; Wednesday, January 14, 2015

इलाहाबाद उच्च न्यायालय

याचिका सं० ९६७२/१९८८

शिव आश्रय तिवारी व अन्य बनाम प्रथम अतिरिक्त जज व अन्य

न्यायमूर्ति श्री दत्तू (मुख्य न्यायाधीश), सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली.

न्यायमूर्ति महोदय,

उपरोक्त याचिका में आदेश दिनांक २८-७-१९८९ के अनुसार राजस्व अभिलेख में जालसाजी सिद्ध हो चुकी है. फिर भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ से मिले संरक्षण के रहते कोई जज किसी लोकसेवक का कुछ नहीं बिगाड़ सका. विवश न्यायमूर्ति ने दि० ९-८-१९८९ को कलक्टर से बात कर बदले में भूमि देने का आदेश दिया. असहाय जज तब से आज तक मुझे बदले में भूमि भी न दिला सके. मानवजाति की भलाई के लिए क्या आप मेरी गुप्त सहायता कर पुण्य अर्जित करेंगे?

ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने में केवल संतानहीनों की सम्पत्ति राजवाह (escheat} होती थी| एलिजाबेथ के उपनिवेश में किसी के पास सम्पत्ति व उत्पादन के साधन रखने का अधिकार ही नहीं|

संविधान के अनु० ३१ प्रदत्त सम्पत्ति के जिस अधिकार को अँगरेज़ और संविधान सभा के लोग न लूट पाए, उसे सांसदों और जजों ने मिल कर लूट लिया और अब तो इस अनुच्छेद को २० जून, १९७९ से भारतीय संविधान से ही मिटा दिया गया है| भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३९(ग) किसी नागरिक को सम्पत्ति या पूँजी रखने का अधिकार नहीं देता| इसे कोई भ्रष्टाचार नहीं मान सकता! (एआईआर, १९५१, एससी ४५८). जब १९९१ से ही बाजारी व्यवस्था लागू हो गई, तो अनुच्छेद ३९(ग) को हटाने में और ३१ को पुनर्जीवित करने में क्या कठिनाई है? आर्यावर्त सरकार यह जानना चाहती है|

न्यायमूर्ति जी! आप कितने विवश हैं, यह इसी बात से पता चलता है कि आप ने आज तक भारतीय स्वतंत्रता (उपनिवेश) अधिनियम१९४७ का विरोध नहीं किया. आप ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) और भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) का भी विरोध नहीं किया. आप ने दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं १९६ व १९७ के विरुद्ध भी ऊँगली नहीं उठाई.

मैं लगभग २ अरब रुपयोंकी सम्पत्ति का स्वामी हूँ, लेकिन ऋषिकेश में भिक्षा के अन्न पर जीवित हूँ| अब मैं दिल्ली हो या गोरखपुर कहीं भी नहीं जा सकता| मेरी सारी सम्पत्ति जजों ने लूटी है. विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/ahc-rg-12806y

आप एलिजाबेथ के उपनिवेश के दास हैं. छोटे जजों की नियुक्ति तो आयोग करता है, लेकिन उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के जज का मनोनयन एलिजाबेथ के दास करते हैं. बाकी विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/Home/aatankvadi-bhrasta-judge

जब मैं सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट का नारा, “यतो धर्मस्ततो जयः” पढ़ता हूँ, तो मुझे जजों के विवेक पर तरस आता है. जज न्याय करने का अधिकार उसी क्षण खो देते हैं, जिस क्षण वे भारतीय संविधान विधियों की मर्यादा बनाये रखने की शपथ लेते हैं| {भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३९(ग), ३००(क) भारतीय संविधान, तीसरी अनुसूची, प्रारूप }. ईसाई व मुसलमान सहित एलिजाबेथ के पास हर नागरिक की सम्पत्ति व पूँजी को लूटने का अधिकार है| जज, जनसेवक और जनता एलिजाबेथ के पशु हैं| जज सहित लोकसेवक नागरिक को भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) के अधीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ द्वारा दिए गए विवश राष्ट्रपति और राज्यपाल के संरक्षण में लूटने के लिए नियुक्त किये गए हैं| लोकसेवक तभी तक नौकरी कर पाएंगे जब तक नागरिक को लूटेंगे| जजों को डूब मरना चाहिए| पद, प्रभुता और पेट के लोभ में न्यायमूर्ति अपना ही सर्वस्व मिटाने के लिए विवश हैं.

आप का नम्बर कब आएगा?

http://www.indiancorruptjudges.com/ नामक URL सच्चाई को छिपाने के लिए है. भ्रष्टाचार भारतीय संविधान से प्रायोजित है| विकल्पहीन लोकसेवकों की नियुक्ति ही लूटने के लिए की जाती है| जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३१ से प्राप्त सम्पत्ति के मौलिक अधिकार को सांसदों और जजों ने मिलकर नागरिकों से लूट लिया और अनुच्छेद ३९(ग) व्यक्ति को सम्पत्ति व पूँजी रखने का अधिकार ही नहीं देता, वहीं दंप्रसं की धारा १९७ ने सत्ता का केन्द्रीयकरण एलिजाबेथ के हाथों में कर दिया है| एलिजाबेथ के मनोनीत लुटेरों के विरुद्ध कहीं सुनवाई नहीं हो सकती| यह कहना गलत है कि कानून सबके लिए एक समान है अथवा कानून अपना कार्य करता है| एलिजाबेथ द्वारा दंप्रसं की धारा १९७ भयादोहन के लिए उपयोग में लाई जा रही है| लोकसेवक, पुलिस, नागरिक व जज सभी दंप्रसं की धारा १९७ से पीड़ित हैं| आज अपराधी वह है जिसे एलिजाबेथ अपराधी माने| यही कारण है कि जहां येदियुरप्पा और मधु कोड़ा जेल गए, वहीं किसानों, लोकसेवकों और यहाँ तक कि रामप्रसाद बिस्मिल जैसे उन हुतात्माओं तक की जमीनें लूटने, जिसके बलिदान के कारण वे मुख्य मंत्री व राज्यपाल बने, वाले मुख्य मंत्री मुलायम मायावती जेल नहीं भेजे जा रहे हैं| चुनाव द्वारा भी जनता एलिजाबेथ की लूट से मुक्ति नहीं पा सकती|

दया के पात्र राज्यपालों ने संविधान के अ० १५९ के अधीन नागरिकों से सम्पत्ति पूँजी छीनने की शपथ ली है न्यायपालिका ने संविधान और कानूनों को बनाये रखने की शपथ ली है| लोकसेवकों को राज्य नागरिकों की सम्पत्ति पूँजी लूटने के लिए नियुक्त करते हैं| लोकसेवक लूटें तो जेल जाएँ और न लूटें तो जेल जाएँ| इंडिया में लोकतंत्र नहीं एलिजाबेथतंत्र है|

ईसाइयत के उन्नति के लिए माउंटबेटन ने अपनी पत्नी संयुक्त रूप से नेहरु और जिन्ना को सौंपा. न्यायमूर्ति जी! मैं आप के वैदिक सनातन संस्कृति के रक्षा के लिए लड़ रहा हूँ. मैं बातों में विश्वास नहीं करता, प्रयत्न में विश्वास करता हूँ. मैंने बाबरी ढांचा गिरवाया है और मालेगांव का अभियुक्त भी हूँ. मात्र ४२ बार जेल जा चुका हूँ. मरने से नहीं डरता. क्या आप वैदिक सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए मुझे मेरी भूमियाँ भी नहीं दिला सकते?

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी (सू० स०) फोन: (+९१) ९८६८३२४०२५/९१५२५७९०४१

प्रतिलिपि उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, NALSA, UPSLSA, मुख्य मंत्री एवं राज्यपाल उप्र और राष्ट्रपति.

 

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