Vishwas

विश्वास

विश्वास आधारित ईसाइयत और इस्लाम

मैं महात्मा बुद्ध के कथन को उद्धृत करता हूँ,

किसी के कथन अथवा लेखन पर, उसे आप ने चाहे जहां से पढ़ा या सुना हो, यहाँ तक कि मेरे कथन पर भी, तब तक विश्वास न करो, जब तक उस कथन से आप अपने तर्क और विवेक की कसौटी से सहमत न हों|

अहम् ब्रह्मास्मि बनाम भेंड़ और मुजाहिद

ब्रह्म यानी चेतन परमाणु सच्चिदानंद ईश्वर का सूक्षतम लेकिन सम्पूर्ण अंश है| यह व्याख्या के परिधि में आ ही नहीं सकता| इसकी मात्र अनुभूति हो सकती है| इसे समझने के लिए मैं एक लघु कथा का आश्रय लेता हूँ|

एक गांव में चार अंधे रहते थे| उस गांव में एक हाथी आया| गावं के लोग हाथी देखने के लिए उमड पड़े| अंधे भी गए| लेकिन वे देख तो सकते नहीं थे| अतएव, सभी अंधों ने हाथी को छुआ| जिसके हाथ में हाथी का कान लगा, उसने बताया कि हाथी सूप है| जिसके हाथ पैर लगा उसने बताया कि हाथी खम्भा है| जिसके हाथ शरीर लगा उसने बताया कि हाथी पहाड़ है और जिसके हाथ पूँछ लगी उसने बताया कि हाथी रस्सी है|

'अहम् ब्रह्म अस्मि' का तात्पर्य

अहम् ब्रह्मास्मि का सरल हिन्दी अनुवाद है कि मैं ब्रह्म हूँ । साधारण व्यक्ति दिग्भ्रमित हैं। इसका कारण यह है लोग - जड़ बुद्धि व्याख्याकारों के कहे को अपनाते है। किसी भी अभिकथन के अभिप्राय को जानने के लिए आवश्यक है कि उसके पूर्वपक्ष को समझा जाय। हम वैदिक पंथी उपनिषदों के एक मात्र प्रमाणिक भाष्यकार आदिशंकराचार्य के कथन को प्रमाण मानते हैं, जो किसी व्यक्ति-मन में किसी भी तरह का अंध-विश्वास अथवा विभ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहते थे।

इस अभिकथन के दो स्पष्ट पूर्व-पक्ष हैं-

१) वह धारणा जो व्यक्ति को अधीन करने के लिए धर्म का आश्रित बनाती है। जैसे, एक मनुष्य क्या कर सकता है करने वाला तो कोई और ही है। मीमांसा दर्शन का कर्मकांड-वादी समझ , जिसके अनुसार फल देवता देते हैं, कर्मकांड की प्राविधि ही सब कुछ है । वह दर्शन व्यक्ति सत्ता को तुच्छ और गौण करता है- देवता, मन्त्र और धर्म को श्रेष्ठ बताता है। एक मानव - व्यक्ति के पास पराश्रित और हताश होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। धर्म में पैगंबर/पौरोहित्य के वर्चस्व तथा कर्मकांड की 'अर्थ-हीन' दुरुहता को यह अभिकथन चुनौती देता है।

२) सांख्य-दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति (जीव) स्वयं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी करती है -प्रकृति करती है। बंधन में भी पुरूष को प्रकृति डालती है तो मुक्त भी पुरूष को प्रकृति करती है। यानि पुरूष सिर्फ़ प्रकृति के इशारे पर नाचता है। इस विचारधारा के अनुसार तो मानव-व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व है ही नहीं।

इन दो मानव-सत्ता विरोधी धारणाओं का खंडन और निषेध करते हुए शंकराचार्य मानव-व्यक्तित्व की गरिमा की स्थापना करते हैं। आइये, समझे कि अहम् ब्रह्मास्मि का वास्तविक तात्पर्य क्या है?

अहम् यानी मैं स्वयं ब्रह्म हूँ और यही सच है और यह उतना ही सच है जितना कि दो और दो का चार होना|

ब्रह्म है मानव के रोम-रोम में उपलब्ध चेतन परमाणु| यह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व-व्याप्त, वह शक्ति है जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं। अस्मि यानी हूँ|

व्यक्ति का यह सर्वशक्तिमान चेतन परमाणु वीर्य में निहित है| आतताई मजहब यहूदी और इस्लाम खतना द्वारा व्यक्ति के इसी वीर्य को नष्ट कर उसे दास बना चुके हैं|

अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निर्देशित करता है कि मानव यानी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों !

अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। कोई ईश्वर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्तियों को अनावश्यक महत्त्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो -उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो , उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ।

जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा-उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।

ठीक इसके विपरीत,

यहूदीवाद, ईसाइयत और इस्लाम की मौलिक कमजोरी उनके चारित्रिक दोष में है| ईसाइयत और इस्लाम व्यक्ति के व्यक्तिगत विवेक का उन्मूलन कर उसे बिना सोचे समझे हठी मजहबी सिद्धांतों की अधीनता को स्वीकार करने के लिए विवश करते हैं| ईसा मुहम्मद ने मानव की पीढ़ियों से संचित हृदय से सेवित सच्चरित्रता, सम्पत्ति उपासना की स्वतंत्रता और नारियों की गरिमा कौमार्य को लूट यौनाचार के लोभ में इनके अनुयायियों से छीन लिया है| कुरान बाइबल हर विवेक, तर्क या प्राकृतिक सिद्धांतों के ऊपर हैं| वह बात भी और वह निंदनीय कार्य भी सही है, जिसे स्वाभाविक नैतिकता की कसौटी पर स्वयं इन पैगम्बरों के गढे ईश्वर भी सही नहीं मानते, क्यों कि पैगम्बरों ने ऐसा कहा किया था| उदाहरण के लिए चोरी, लूट नारी बलात्कार ईसाइयत और इस्लाम दोनों में निषिद्ध है| लेकिन इतर धर्मावलंबियों की लूट (कुरान :, ४१ ६९) नारी बलात्कार स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र उपाय है| ईसाइयत और इस्लाम के ईश्वरों ने विवेक सहज अंतरात्मा के उद्गार को निषिद्ध कर दिया है| (बाइबल, उत्पत्ति :१७) (कुरान :३५) ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायियों के बाइबल कुरान के आज्ञाओं मुहम्मद ईसा के कार्यकलापों पर कोई प्रश्न नहीं कर सकता| (कुरान :१०१ १०२). (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). मानव अपनी तर्क-बुद्धि से कुछ भी कह या कर नहीं सकता| स्वाध्याय आत्मचिंतन के लिए ईसाइयत और इस्लाम में कोई स्थान नहीं| अशांति, हत्या, लूट बलात्कार के विरुद्ध भी, जिनका ईसाइयत और इस्लाम समर्थन करते हैं, अनंत काल से प्रतिपादित वेदों स्मृतियों का प्रयोग सर्वथा वर्जित है|

इस्लाम सदा सदा के लिए काफिरों के गले पर रखी हुई तलवार है| अजान गैर-मुसलमान मानव जाति के आराध्य देवों का अपमान और भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ २९५ के अधीन संज्ञेय गैर-जमानती अपराध है-जिसके बदले दण्डित करने के स्थान पर ईमामों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २७ का उल्लंघन कर १० अरब रुपयों वार्षिक से अधिक ईमामों को वेतन दिया जा रहा है| (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६). आप अजान, नमाज, ईमाम या कुरान को ईशनिंदा का दोषी नहीं ठहरा सकते| लेकिन यदि आप कुरान की असलियत को प्रकाशित कर दें तो ईश-निंदक हैं| सारी विषमताओं के होते हुए भी कुरान बाइबल पर उंगली नहीं उठाई जा सकती| ऐसा करना ईश-निंदा है| जिसके लिए ईसाइयत और इस्लाम में मृत्युदंड है और भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ २९५ के अधीन संज्ञेय गैर-जमानती अपराध है, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ द्वारा राज्यपालों से नियंत्रित है और मात्र हिंदुओं पर लागू है|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से अधिकार प्राप्त कर, (यह अनुच्छेद दोनों को पूजा स्थल तोड़ने, हत्या, लूट, धर्मान्तरण और नारी बलात्कार का असीमित मौलिक अधिकार देता है) ईसाइयत व इस्लाम मिशन व जिहाद की हठधर्मिता के बल पर वैदिक संस्कृति को मिटा रहे हैं| मंदिर तोड़ रहे हैं| मन्दिरों के चढ़ावों को लूट रहे हैं|

वे हठधर्मी सिद्धांत हैं, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूंयहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबललूका १९:२७) और "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना)  बाकी न रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये|" (कुरानसूरह  अल अनफाल ८:३९). (कुरान, बनी इस्राएल १७:८१ व कुरानसूरह अल-अम्बिया २१:५८). (बाइबलव्यवस्था विवरण १२:१-३)]. 

मुहम्मद के कार्टून बनाने पर ईशनिंदा के लिए मौत का  देने वाले मूर्ख मुसलमान (कुरान :३५), वैदिक सनातन धर्म का और ईश्वर का, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण में हमारे कर के वेतन से अजान द्वारा हमारे ईश्वर का अपमान क्यों करते हैं? (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६) ईश निंदा के अपराध में हम मुसलमानों को कत्ल क्यों करें? पाकपिता गाँधी और भारतीय संविधान ने हमसे उपासना की स्वतंत्रता का वादा किया गया है, ईमाम मस्जिदों से, "ला इलाहलिल्लाहू मुहम्मद्दुर रसुल्ल्लाहू" क्यों चिल्लाते हैं? हम अल्लाह के उपासना की दासता क्यों स्वीकार करें? ईश्वर का अपमान कराने वाली सरकार को सत्ता में रहने का अधिकार नहीं|

मानव जाति जीवित नहीं बच सकती| मीडिया यह सवाल नहीं उठाती

 

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