PRESS KII AAZAADI

प्रेस की आज़ादी.

प्रेस की आज़ादी पर जान स्विंटन ने कहा था.,,

कुछ शताब्दियों पूर्व, प्रेस को राज्य का चौथा स्तंभ माना जाता था – अन्य तीन स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका थे.

प्रेस की ईमानदारी और पवित्रता लगातार घटती रही. अंततः, न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व स्टाफ प्रमुख ने सन १९५३ में, अपने कहेगये भाषण में निम्नलिखित वाक्यों में स्वीकार किया,

“आज स्वतंत्र प्रेस नाम की कोई चीज नहीं. यह आप और मैं दोनों जानते हैं. आप लोगों में से ऐसा कोई नहीं, जो ईमानदारी से अपने विचार लिख सके. मुझे ईमानदारी के साथ अपने प्रेस में अपने विचार न व्यक्त करने के लिए साप्ताहिक धन मिलता है.

“आप में कोई भी मूर्ख ही होगा, जो ईमानदारी से अपने विचार लिख कर नौकरी गवां कर दूसरी नौकरी ढूँढना चाहेगा... स्तंभकार का पेशा सत्य को नष्ट करना है. बिल्कुल झूठ लिखना; दूषित करना; गालियां देना;... हम पर्दे के पीछे शासकों के लिए कार्य करने वाले मातहत और उपकरण हैं. ... हम लोग बौद्धिक वेश्याएं हैं.”

अतएव हमे प्रेस की बेईमानी पर घड़ियाली आंसू नहीं बहाना चाहिए. इंडिया में तो प्रेस की बौद्धिक वेश्यावृत्ति विदेशों से बहुत ही सस्ती है.

 

 

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