Pragya letter

 

पांचजन्य साप्ताहिक से ...

न्यायाधीश महोदय! सुनिए एक साध्वी की करुण पुकार

तारीख: 2/2/2013 2:36:27 PM

 

 

सोनिया कांग्रेस के दरबारी महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक जुमला उछाला 'भगवा आतंकवाद', तो सोनियाकी अध्यक्षता वाली संप्रग सरकार ने उसे सिद्ध करने के लिए कुछ षड्यंत्र रचे। आतंकवाद विरोधी दस्ते (एंटीटेरेरिस्ट स्क्वाड-एटीएस) ने सरकार के इशारे पर समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मालेगांव विस्फोट, मक्कामस्जिद में धमाका आदि मामले दोबारा खंगाले और झूठी कहानी, झूठे सुबूत गढ़कर कुछ हिन्दुओं को पकड़ा,उनमें स्वामी असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा सिंह प्रमुख हैं। हालांकि 5 साल बाद भी इनमें से किसी के भीखिलाफ पुख्ता जानकारी नहीं दी गई है, पर विचाराधीन कैदी बनाकर प्रताड़ित किया जा रहा है, ताकि 'भगवाआतंकवाद' के नाम पर कुछ भगवा वेशधारी चेहरों को प्रस्तुत किया जा सके। मालेगांव विस्फोट के संदर्भ मेंगिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह इन दिनों बहुत बीमार हैं और उन्होंने जेल से ही न्यायाधीश महोदय को जोमार्मिक पत्र लिखा, उसे यहां हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पूरी सच्चाई आपके समक्ष स्वत: ही आ जाएगी। -सं.

ईसाइयत और इस्लाम को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से संरक्षण देना स्वयं में एक षड्यंत्र है| मिडिया भारतीय संविधान का विरोध कब करेगी?

टिप्पणी: एक सुबूत है| वह है विशेष गृह सचिव सुश्री चितकला जुत्शी का दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन राज्यपाल से दिलाया गया अभियोग चलाने का संस्तुति पत्र| मोटरसाइकिल का इंजिन न० चैसिस न० मिटा हुआ है| यानी अभियोग का सुबूत ही नहीं है|

Extract of Sanction order No. TER-0109/CR NO- 34/SPL-1-B, Home Department (Special) Mantralaya, Mumbai-400 032, Dated the 17th January, 2009, By order and in the name of the Governor of Maharashtra, signed by Ms. Chitkala Zutshi, Addl. Chief Secretary (Home), Maharashtra Government, Mumbai, Web site http://www.aryavrt.com/Home/chargesheet-download Vol-1a page 88 "In furtherance of the criminal conspiracy hatched by arrested and wanted accused persons, the arrested accused at Sr. No. 1 knew that her LML Freedom Motor cycle vide No. GL-05-BR-1920 was being used by the wanted accused person at Sr. No. 1. The wanted accused at Sr. No. 1 had knowingly not only erased the chassis and engine number but also used bogus registration number vide MH-15 P-4572 of LML Freedom Motor cycle. This fact is emerged in a statement of one of the witnesses."

 

अमेरिका आज भी है, लेकिन लाल भारतीय और उनकी माया संस्कृति मिट गई| सोनिया वैदिक सनातन संस्कृति मिटाएगी, आप का मांस खाएगी और लहू पीयेगी| (बाइबल, यूहन्ना ६:५३).  इंडिया तो रहेगा| लेकिन सुशीलकुमार शिंदे, पृथ्वीराज शंकरनारायणन और उनकी वैदिक सनातन संस्कृति  बचेगीबचना हो तो अभिनव भारत और आर्यावर्त सरकार को सहयोग दीजिये| यह युद्ध मात्र हम लड़ सकते हैं| ईसाइयत और इस्लाम को धरती पर रहने का कोई अधिकार नहीं है| चर्चों व मस्जिदों से ईसाई व मुसलमान को कत्ल करने की शिक्षा दी जाती है| अतएव चर्च व मस्जिद नष्ट करना भारतीय दंड संहिता के धारा १०२ के अधीन हमारा कानूनी अधिकार है| हमने बाबरी ढांचा गिराया है| हम मालेगांव व अन्य मस्जिदों में विष्फोट के अभियुक्त हैं| हमारे ९ अधिकारी २००८ से जेलों में बंद हैं| जिन लोगों को अपना जीवन, अपनी आजादी और अपनी नारियों का और अपना सम्मान चाहिए हमे सहयोग दें| हम ईसाइयत और इस्लाम को नहीं रहने देंगे|

http://www|aryavrt|com/Home/aryavrt-in-news

वो (यहूदी)  एक कमजोर कौम थी

हिन्दू और यहूदी धर्म में वैसे तो कोइ समानता नहीं, लेकिन फिर भी आज दोनों धर्म समान धरातल पर खड़े दिखते हैं. यहूदी धर्म से जहां इस्लाम और इसाइयत दोनों का ही उद्भव हुआ, वहां हिन्दू धर्म तो खुद ही बहुत सारे धर्मों का समागम है, और भी कई दूसरे धर्मों का जन्म उससे हुआ.

 

दोनों ही धर्म पुराने हैं लेकिन जहां यहूदी धर्म अब धरातल से लगभग मिट चुका है (इसके सिर्फ 1 करोड़ बीस लाख मानने वाले ही दुनिया में हैं) वहां हिन्दू धर्म अब भी प्रबल रूप से जीवित है (लगभग 85 करोड़ मानने वाले). दोनों ही धर्म अब मुख्य रूप से एक राष्ट्र में सिमट चुके हैं और दोनों पर ही अब्राहमिक धर्म (इस्लाम और इसाइयत) की टेढ़ी नजर है|

 

दोनों ही धर्मों का जोर प्रसार और लोगों को अपने धर्म में शामिल करने पर नहीं है.

 

किसी जमाने में यहूदी बेहद कमजोर कौम हुआ करती थी. यह कौम पूरे युरोप में बिखरी हुई थी और अमेरिका में अपना प्रभाव बनाना शुरु ही किया था. संख्या में कम, लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न और पढ़े-लिखे लोगों की यह कौम बहुत से इसाइयों की आंखों में खटकती थी. पूर्वाग्रह की हद क्या होगी यह इससे ही समझ सकते हैं कि शेक्सपीयर तक ने अपने नाटक मर्चेन्ट आफ वेनिस में यहूदी व्यापारीयों को खुल कर कोसा था. याद है आपको शाइलॉक? ये भी याद करिये कि जोर उसके उस खास वर्ग के होने पर बहुत था.

 

असल में इसाइयत का यहूदियों से पुराना बैर था, उनके नबी (जीसस) को भी आखिर यहूदियों के कहने पर ही कत्ल किया गया था. बहुत दिनों तक इसाई यहूदियों द्वारा दमित भी रहे, लेकिन रोमन राजा के इसाई धर्म अपनाने के बाद इसाईयत का जोर युरोप में जो हुआ वह अब तक चालू है. धीरे-धीरे यहूदी और युरोप के बाकी धर्म हाशिये पर चले गये. यहूदी भी इस नई व्यवस्था में मिल गये. अब वह न शासक रहे न शोषक, वर्ण व्यवस्था में भी उनका स्थान दोयम था, लेकिन अपनी मेहनत लगन और अक्ल से वह समाज में आगे रहे. (स्वयं ईसाई ही कहते हैं कि ईसा कभी धरती पर पैदा ही नहीं हुआ)

 

लेकिन उनके पास न सामरिक शक्ति थी, ना राजनैतिक, और यह बात उन्हें बहुत महंगी पड़ी. द्वितीय विश्वयुद्ध में 30 लाख यहूदियों को हिटलर और दूसरे यहूदी विरोधियों ने मार दिया और यहूदी कुछ नहीं कर पाये. वह एक कमजोर कौम थी जिसपर जो चाहे, जैसा चाहे अत्याचार कर सकता था. हिटलर ने यह्युदियों को शहर से दूर अलग इलाकों में रहने पर मजबूर किया, और हर यहूदी को अपनी पहचान के लिये खास मार्क पहनना होता था (स्टार) जिस तरह आज तालिबानी पाकिस्तानी में इस्लाम को न मानने वालों को पहनना होता है.

 

यहूदियों ने बुरे दिन पहले भी देखे थे, लेकिन हर बार वो आगे बढ़ गये और पुराने दुख भूलते गये. लेकिन जिन्हें यह यहूदियों कि कमजोरी लगी, उन्होंने इसे कायरता समझा. उस समाज में यह बात प्रचलित थी कि यहूदी में हिम्मत नहीं होती. वह डरपोक होता है. जबर मुस्लिम और ईसाई दोनों ही इस कमजोर कौम को दबा-कुचल कर खुश थे.

 

यहूदियों ने एक भी युद्ध नहीं लड़ा.

उनकी कोई सेना नहीं थी.

वो सब के सब गैर सैनिक नागरिक थे जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध में पकड़-पकड़ कर मारा गया, उनके साथ कैम्पों में अमानवीय व्यवहार किया गया और गैस चैम्बरों में भर दिया गया.

 

बिना युद्ध लड़े एक कौम के 30 लाख लोगों की हत्या?

जो उस समय कुल यहूदी जनसंख्या की आधी थी!

मतलब एक कौम को आधा साफ कर दिया गया!

 

जिन कमजोर और बेबस यहूदियों को इतनी आसानी से मौत दी गई आज वह कहा हैं?

 

    उनका प्रभुत्व अमेरिका की राजनीति पर है.

    दुनिया का हर रैडिकल यहूदियों के नाम से कांप उठता है.

    यहूदी लड़ाके दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक हैं.

    यहूदीयों के अस्त्र-शस्त्र बहुत उन्नत हैं.

 

आज यहूदी ऐसी जगह रहते हैं जहां वो हर तरफ से दुश्मनों से घिरे हैं. फिर भी उनका वजूद प्रबल है. उनका हर दुश्मन उनसे घबराता है और उनके आगे पानी मांगता है.

 

क्यों?

क्योंकि 30 लाख लोगों को खोने के बाद यहूदियों ने फैसला किया

 

Never again!

दोबारा कभी नहीं.

 

यही उनकी जीवनशैली है दोबारा कभी नहीं!

 

    आज के यहूदियों में मुझे कल के हिन्दुओं का चेहरा दिखाई देता है.

 

क्योंकि दुनिया में यह भी इतने ही अकेले हैं जितने की यहूदी. रैडिकल ईसाइयत और इस्लाम का जितना दबाव हिन्दुओं पर बढ़ रहा है उसकी वजह से हिन्दू धर्म ने जो राह पकड़ी है वह शायद उसी मोड़ पर रुकेगी जिस पर आज यहूदी हैं|

 

भारतीय संविधान मानव मात्र को दास बनाने अथवा कत्ल करने की संहिता है| भारतीय संविधान, कुरान और बाइबल से मानव जाति के, डायनासोर की भांति, अस्तित्व को खतरा है|

केवल वे ही संस्कृतियां जीवित बचीं, जिन्होंने भारत में शरण लिया| इसीलिए परभक्षी संस्कृतियां ईसाइयत और इस्लाम वैदिक सनातन संस्कृति को मिटाना चाहती हैं, ताकि सबको अपना दास बना कर निर्ममता पूर्वक लूटा जा सके|

जहां हिंदुओं ने सभी देशों ओर मजहबों के पीडितों को शरण दिया, वहीं अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान का संकलन कर जिन विश्व की सर्वाधिक आबादी ईसाइयत और दूसरी सर्वाधिक आबादी इस्लाम को वैदिक सनातन धर्म को मिटाने के लिए इंडिया में रोका है, उन्होंने जहां भी आक्रमण या घुसपैठ की, वहाँ की मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया| लक्ष्य प्राप्ति में भले ही शताब्दियाँ लग जाएँ, ईसाइयत और इस्लाम आज तक विफल नहीं हुए|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से अधिकार प्राप्त कर, (यह अनुच्छेद दोनों को पूजा स्थल तोड़ने, हत्या, लूट, धर्मान्तरण और नारी बलात्कार का असीमित मौलिक अधिकार देता है) ईसाइयत व इस्लाम मिशन व जिहाद की हठधर्मिता के बल पर वैदिक संस्कृति को मिटा रहे हैं| मंदिर तोड़ रहे हैं| मन्दिरों के चढ़ावों को लूट रहे हैं|

वे हठधर्मी सिद्धांत हैं, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूंयहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबललूका १९:२७) और "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना)  बाकी न रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये|" (कुरानसूरह  अल अनफाल ८:३९). (कुरान, बनी इस्राएल १७:८१ व कुरानसूरह अल-अम्बिया २१:५८). (बाइबलव्यवस्था विवरण १२:१-३)]. 

नेताओं, सुधारकों, संतों, मीडिया, इस्लामी मौलवियों, मिशनरी और लोकसेवकों द्वारा जानबूझ कर मानवता को धोखा दिया जा रहा हैंसच छुपा नहीं है, न ही इसे जानना मुश्किल है| मानव उन्मूलन की कीमत पर आतंकित और असहाय मीडिया जानबूझकर अनभिज्ञ  बनी हुई है| मुसलमानों और ईसाइयों द्वारा तब तक जिहाद और मिशन जारी रहेगा, जब तक हम उनके साधन और प्रेरणास्रोत को नष्ट न कर दें| उनके साधन पेट्रो डालर और मिशनरी फंड और प्रेरणास्रोत कुरान (कुरान ८:३९) और बाइबल (बाइबल, लूका १९:२७) है

स्पष्टतः वैदिक सनातन धर्म मिटाना दोनों का घोषित कार्यक्रम है| जब वैदिक सनातन संस्कृति मिट जाएगी तो अर्मगेद्दन के लिए ईसा इस्लाम को भी मिटा देगा|

Http://www.countdown.org/armageddon/antichrist.htm

लोकसेवक दया के पात्र हैं| उन्होंने अपने जीविका, पद और प्रभुता हेतु अपनी सम्पत्ति पूँजी रखने का अधिकार स्वेच्छा से त्याग दिया है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३१ ३९(). अपने जीवन का अधिकार खो दिया है| [बाइबल, लूका, १९:२७ और कुरान :१९१, भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९() के साथ पठित|] अपनी नारियां ईसाइयत और इस्लाम को सौँप दी हैं| (बाइबल, याशयाह १३:१६) और (कुरान २३:). इसके बदले में सोनिया का ईसा उनको बेटी (बाइबल , कोरिन्थिंस :३६) से विवाह का व अल्लाह पुत्रवधू (कुरान, ३३:३७-३८) से निकाह करने का अधिकार दे चुका है| जहां भारतीय संविधान ईसाइयत और इस्लाम को अपनी संस्कृतियों को बनाये रखने का असीमित मौलिक अधिकार देता है, वहीँ उनको वैदिक सनातन धर्म को बनाये रखने का कोई अधिकार नहीं है|

लोकसेवक के पास कोई विकल्प भी नहीं है| या तो वे स्वयं अपनी मौत स्वीकार करें, अपनी नारियों का अपनी आखों के सामने बलात्कार कराएँ, शासकों (सोनिया) की दासता स्वीकार करें अपनी संस्कृति मिटायें अथवा जेल जाएँ|

लोकसेवक के अपराध परिस्थितिजन्य हैं, जिनके लिए भारतीय संविधान उत्तरदायी है| ऐसे भारतीय संविधान को रद्दी की टोकरी में डालना अपरिहार्य है| हम अभिनव भारत और आर्यावर्त सरकार के लोग आतताई ईसाइयत और इस्लाम को इंडिया में रखने वाले भारतीय संविधान को रद्द करने की मुहिम में लगे हैं| सोनिया के देश पर आधिपत्य को स्वीकार करते ही आप ही नहीं, सारी मानव जाति ईसा की भेंड़ हैं||

क्या आप हमे सहयोग देंगे?

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, फोन ९१५२५७९०४१

 

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मा. न्यायाधीश महोदय,

उच्च न्यायालय, मुम्बई (महाराष्ट्र)

द्वारा- श्रीमान अधीक्षक, केन्द्रीय कारागृह भोपाल (म.प्र.)

विषय- स्वास्थ्य विषय से सम्बन्धित।

महोदय,

मैं, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर मालेगांव विस्फोट प्रकरण (2008) में विचाराधीन कैदी हूं और अभी एक अन्य प्रकरण में मध्य प्रदेश की भोपाल स्थित केन्द्रीय जेल में हूं। आज दिनांक 16 जनवरी, 2013 को जो सज्जन मुझसे जेल में भेंट करने आये उन्होंने आपके द्वारा आदेशित पत्र मुझे दिखाया, जिसमें आपने मेरी अस्वस्थता के उपचार हेतु उचित स्थान के चयन का निर्णय करने को कहा है। महोदय, मैं यह जानकर कि आपने मेरे स्वास्थ्य की संवेदनापूर्वक चिंता कर आदेश दिया, मैं आपकी बहुत-बहुत आभारी हूं। आपके आदेश से ही मुझे यह हौसला मिला है कि मैं आपसे अपनी मन:स्थिति व्यक्त करूं। मुझे लगता है कि आप मेरी सारी शारीरिक स्थिति, मानसिक स्थिति और विवशता को भली-भांति समझ सकेंगे। अत: मैं आपसे अपनी बात संक्षेप में कहती हूं, जो इस प्रकार है-

0 मैं बचपन से ही सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, सिद्वान्तवादी व राष्ट्रभक्त हूं। मेरे पिता ने मेरा निर्माण इन्हीं संस्कारों में गढ़कर किया है। मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता व देश की संभ्रांत नागरिक हूं।

0 मैं जनवरी, 2007 से संन्यासी हूं।

0 अक्टूबर, 2008 में मुझे सूरत से एटीएस इंस्पेक्टर सावंत का फोन आया कि आप कानून की मदद करिए, सूरत आ जाइये, मुझे आपसे एक 'बाइक' के बारे में जानकारी चाहिए। मैं कानून को मदद पहुंचाने व अपने कर्तव्य को निभाने हेतु 10 अक्टूबर सुबह सूरत पहुंची।

0 इं. सावंत ने अपने साथियों सहित अपने बड़े साहब के समक्ष पेश कर देने को कहकर 16 अक्टूबर की रात्रि को मुझे मुम्बई लाये। मुम्बई की काला चौकी में मुझे 13 दिनों तक गैरकानूनी रुप से रखा और भयानक शारीरिक, मानसिक व अश्लील प्रताड़नाएं दीं।

0 एक स्त्री होने पर भी मुझे बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों ने सामूहिक रुप से गोल घेरे में घेर कर बेल्टों से पीटा, पटका, गालियां दीं तथा अश्लील सी.डी. सुनवाई। उनका (एटीएस का) यह क्रम दिन-रात चलता रहा।

0 फिर पता नहीं क्यों मुझे राजपूत होटल ले गये और अत्यधिक प्रताड़ित किया जिससे मेरे पेट के पास फेफड़े की झिल्ली फट गयी। मेरे बेहोश हो जाने व सांस न आने पर मुझे एक प्राइवेट हास्पिटल  'सुश्रुशा' में आक्सीजन पर रखा गया। इसी हास्पिटल में झिल्ली फटने की रपट है। आपके आदेश पर वह रपट आपके समक्ष उपस्थित की जायेगी। दो दिन सुश्रुशा हास्पिटल में रखकर गुप्त रूप से फिर हास्पिटल बदल दिया और एक अन्य प्राइवेट हास्पिटल में आक्सीजन पर ही रखा गया। इस प्रकार 5 दिनों तक मुझे आक्सीजन पर रखा गया।

0 थोड़ा आराम मिलने पर पुन: काला चौकी के मि. सावंत के आफिस रूम में रखा गया तथा पुन: अश्लील गालियां, प्रताड़नाएं दी जाती रहीं।

0 फिर मुझे यहीं से रात्रि को लेकर नासिक गये, फिर 13 दिन बाद गिरफ्तार दिखाया गया। इतने दिनों मैंने कुछ खाया नहीं तथा प्रताड़नाओं और मुंह बांधकर रखे जाने से मैं बहुत ही विक्षिप्त अवस्था में आ गई थी।

0 इस बीच बेहोशी की अवस्था में मेरा भगवा वस्त्र उतार कर मुझे सलवार-सूट पहनाया गया।

0 बिना न्यायालय की अनुमति के, गैरकानूनी तरीके से मेरा नाकर्ो पौलिग्राफी व ब्रेन मैपिंग किया गया। फिर गिरफ्तारी के पश्चात पुन: ये सभी टेस्ट दोबारा किये गये।

0 जज साहब, इतनी अमानुषिक प्रताड़नाएं दिए जाने के कारण मुझे गम्भीर रूप से रीढ़ की हड्डी की तकलीफ व अन्य तकलीफें होने से मैं चलने, उठने, बैठने में असमर्थ हूं। इनकी (एटीएस की) प्रताड़नाओं से मानसिक रुप से भी बहुत ही परेशान हूंं। अब सहनशीलता की भी कमी हो रही है।

0 कारागृह में मुझे यह पांचवा वर्ष चल रहा है। इस कारागृही जीवन में भी मेरी सात्विकता नष्ट करने के लिये मुम्बई जेल में मेरे भोजन में अण्डा दिया गया। इस विपरीत वातावरण से मुझे अब और भी कोई गम्भीर बीमारियां हो गई हैं। अब मैं कैंसर (ब्रेस्ट) के रोग से भी ग्रस्त हो गयी हूं। परिणामस्वरुप मैं अब डाक्टरों के द्वारा बताया गया भोजन करने में भी असमर्थ हूं।

0 इन्ही तकलीफों के चलते मुझे इलाज के लिए, टेस्ट के लिये न्यायालय के आदेश पर मुम्बई व नासिक के अस्पताल भेजा जाता था, किन्तु वहां के पुलिसकर्मी जे.जे. हास्पिटल अथवा किसी सरकारी हास्पिटल अथवा आयुर्वेदिक हास्पिटल ले जाते, जहां न्यायालय का आदेश देखकर मुझे 'एडमिट' तो किया जाता था, कागजी कार्रवाई की जाती, किन्तु मेरा उपचार नहीं किया जाता था।

0 2009 में एक बार मेरा ब्रेस्ट का आपरेशन किया गया, 2010 में पुन: वहां तकलीफ हुई। मैं मकोका हटने पर नासिक के कारागृह में थी। वहां मुझे जिला अस्पताल भेजा गया। न्यायालय के आदेश पर एक टीम बनाई गई जिसने अपनी रपट में पुन:. आपरेशन की सलाह दी। किन्तु मकोका लगने पर मुझे पुन: मुम्बई ले जाया गया।

0  अभी मैं मार्च, 2012 से म.प्र. की भोपाल जेल में हूं। यहां मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने पर जब अस्पताल भेजा गया तो वहां भी पुलिस वालों ने जबरन पेरशान किया। जेल प्रशासन इलाज करवाना चाहता था, किन्तु जो सुरक्षा अधिकारी मेरे साथ थे, वे अमानवीय गैरकानूनी व्यवहार करते रहे। अत: मुझे अस्पताल से बिना उपचार के वापस आना पड़ा। ऐसा कई बार हुआ।

0 ऐसा अभी तक निरन्तर होता आ रहा है। मैं इलाज लेना चाहती थी, टेस्ट भी करवाने अस्पताल गयी, किन्तु सरकारी रवैया, कोर्ट, कानून, पुलिस के झंझटों से डरकर कोई उपचार ही नहीं करना चाहता। अब मैं पांच वर्षों से इन सभी परेशानियों को झेलते-झेलते थक गई हूं।

0 महोदय मैंने अब यही तय किया कि संन्यासी जीवन के इस शरीर को तमाम बीमारियों से अब योग-प्राणायाम से जितने दिन चल जाये, उतना ठीक है, किन्तु अब जेल अभिरक्षा में रहते हुए कोई इलाज नहीं करवाऊंगी। महोदय, मैंने यह निर्णय स्वेच्छा से नहीं लिया है। कारागृही जीवन, तमाम प्रतिबन्धों के परिणामस्वरुप तनाव से शरीर पर विपरीत असर होने के चलते विवश होकर ही मैंने यह निर्णय लिया है। आप इसे अन्यथा न लें और मेरी भावना व परिस्थिति को समझें।

0 महोदय मैं एक संन्यासी हूं। हमारा त्यागपूर्ण संयमी जीवन होता है। स्वतंत्र प्रकृति से स्वतंत्र वातावरण में ही यह संभव होता है। 5 वर्षों से मेरी प्रकृति, दिनचर्या, मर्यादा, मेरे जीवन मूल्यों के विपरीत मुझे अकारण कारागृह में रखा गया है। अत: इन प्रताड़नाओं व अमानवीयता से एक संन्यासी का संवेदनशील जीवन असम्भव है।

0  मैंने सभी विपरीत परिस्थितियों से अपने को अलग करने का प्रयास कर इन शारीरिक कष्टों को सहते हुए अपने ठाकुर (ईश्वर) के स्मरण में ही अपने को सीमित कर दिया है। जितने दिन जिऊंगी, ठीक है, किन्तु उचित उपचार व जांच से दूर रहूंगी। यदि स्वतंत्र हुई तो अपनी पंसद का उपचार, बिना किसी बंधन के करवा कर इस शरीर को स्वस्थ करने तथा संन्यासी जीवन पद्धति से मन को ठीक कर कुछ समय जी सकूंगी।

0 महोदय आपसे अनुरोध है कि आप मेरे तथा भारतीय संस्कृति में एक संन्यासी जीवन की पद्धति व इसके विपरीत दुष्परिणामों को अनुभूत करेंगे। मेरे निर्णय को उचित समझकर मेरे निवेदन पर ध्यान देंगे। यदि मेरे लिये कानून के अन्तर्गत स्वतंत्रता (जमानत) का प्रावधान है, क्योंकि में अभी संशयित (विचारधीन) हूं, तो आप अपने विवेकीय मापदण्डों पर मुझे जमानत देने की कृपा करें।

0 मेरे द्वारा लिखे गये प्रत्येक कारण के लिखित सबूत हैं, यदि आपका आदेश हुआ तो वह सभी सबूत आपके समक्ष (मेरी रपट सहित) प्रस्तुत की जा सकती है। मैं कानून की धाराएं नहीं जानती हूं। बस इतना है कि मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैंने हमेशा एक राष्ट्रभक्तिपूर्ण, संवैधानिक, नियमानुसार जीवन जिया है, अभी भी जी रही हूं। आज तक मेरा कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। मुझे मुम्बई एटीएस ने जबरन इस प्रकरण में फंसाया है।

निवेदक: प्रज्ञा सिंह

 

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prgya.pdf
(139k)
AyodhyaP Tripathi,
Apr 21, 2013, 2:24 AM
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