PEESTV KA VIRODH


पीस टीवी का विरोध

क्या हम या हमारे पुजारी मन्दिरों से प्रसारण करते हैं कि मात्र ईश्वर की पूजा हो सकती है? क्या हमारे उत्साही भगवा आतंकी ईसाई व मुसलमान के विरुद्ध जिहाद करने के लिए कहते हैं? क्या हमारे उत्साही भगवा आतंकी कहते हैं कि अब्रह्मी संस्कृतियों को छोड़ दो, जजिया दो अन्यथा हम तुम्हें कत्ल कर देंगे? क्या हमारा ईश्वर कहता है कि जो मुझे राजा स्वीकार न करे उसे उत्साही भगवा आतंकी कत्ल कर दें? (बाइबल, लूका १९:२७). मीडिया बताए कि कौन बिगाड़ रहा है शांति, सहअस्तित्व और सांप्रदायिक सद्भाव? जातिहिंसा तो अब्रह्मी संस्कृतियों के प्रसार का आधार है!

एलिजाबेथ का ईसा कहता है, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूंयहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबललूका १९:२७). कटारिया जी! इसी हठधर्मिता के आधार पर ब्रिटेन ने ५३ ईसाई व मुसलमान देशो को अपना उपनिवेश बनाया हुआ है. उपनिवेश प्रजातंत्र और स्वतंत्रता कैसे है?

आप भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) द्वारा घोषित अपराधी हैं ईसाइयों के, यदि आप बपतिस्मा नहीं लेते और मुसलमानों के भी यदि आप काफ़िर हैं। या तो आप मात्र अल्लाह की पूजा नहीँ करते हैं (कुरआन २१:९८ व नमाज) अथवा ईसा को अपना राजा स्वीकार नहीँ करते हैं। (बाइबललूका १९:२७). दोनों परिस्थितियों में आप कत्ल कर दिए जायेंगे.

जो भी पन्थनिरपेक्ष है और जिसने भी भारतीय संविधान की शपथ ली है-आत्मघाती और अपराधी है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९() से प्राप्त अधिकार से अपने मजहब का पालन करते हुए उसकी हत्या या तो ईसाई (बाइबल, लूका १९:२७) करेगा अथवा मुसलमान (कुरान :१९१).

मुसलमानों और ईसाइयों के साथ कोई सह - अस्तित्व नहीं हो सकता है. जब तक मुसलमान व ईसाई मुहम्मद और यीशु में विश्वास करते हैं, वे मानवजाति के लिए और यहां तक ​​कि खुद एक दूसरे के लिए खतरा हैं.

धर्मनिरपेक्षता और बहुसंस्कृतिवाद यहूदी, ईसाई और इस्लाम मजहबों की दासता की मांग के कारण दिवालिया हो चुके हैं. {अज़ान, (कुरान २:१९१-१९४ व ८:३९) और (बाइबल, पलायन, अध्याय २०, दस आज्ञाएँ, नियम ३ व ५) व (बाइबल, लूका १९:२७)}. द्वैतवादी नैतिकता की सहिष्णुता की संस्कृति पवित्र असहिष्णुता की हठधर्मिता के सामने ढह जाती है| लेकिन भयवश बुद्धिजीवी इस असफलता की अनदेखी करते हैं| अब्रह्मी संस्कृतियों में विश्वास की कोई स्वतंत्रता नहीं है|

मुसलमानों और ईसाइयों को अपने अब्रह्मी संस्कृतियों को त्यागना होगा, अपने नफरत की संस्कृति (केवल अल्लाह पूज्य है की अज़ान द्वारा घोषणा और अकेले यीशु मोक्ष प्रदान कर सकते हैं की घोषणा का परित्याग करना पडेगा) गैर मुसलमानों और गैर ईसाइयों में साथी के रूप में शामिल होना होगा| अन्यथा गैर मुसलमानों और गैर ईसाइयों को नैतिक अधिकार है कि वे मुसलमानों और ईसाइयों से स्वयं को अलग कर लें| अब्रह्मी संस्कृतियों को प्रतिबंधित करें| मुसलमानों और ईसाइयों के आव्रजन को प्रतिबंधित कर दें और उन्हें कत्ल कर दें, जो मानवजाति को दास बनाने अन्यथा कत्ल करने का षड्यंत्र कर रहे हैं - सर्वधर्म समभाव के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं| अब्रह्मी संस्कृतियों के आचरण मानवता और नैतिकता के विरुद्ध हैं|

आप या तो मात्र अल्लाह की उपासना नहीं करते अथवा ईसा को अपना राजा स्वीकार नहीं करते अतएव आप को जीवित रहने का अधिकार तक नहीं है| अतः आप मुसलमान (बाइबल, लूका १९:२७) हैं तो ईसाई आप की हत्या करेगा और यदि ईसाई हैं (कुरानसूरह अल अनफाल ८:३९) तो मुसलमान|

भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) ईसाईयों व मुसलमानों को अपनी इन लुटेरी, बलात्कारी और खूनी संस्कृतियों को बनाये रखने का असीमित मौलिक अधिकार देता है व राष्ट्रपति और राज्यपाल को भारतीय संविधान के अनुच्छेदों क्रमशः ६० व १५९ के अधीन इनका संरक्षणपोषण व संवर्धन करने की शपथ लेनी पड़ती है|

जजों ने भी भारतीय संविधान के अनुसूची ३ के प्रारूप ४ व ८ के अधीन ईसाईयों व मुसलमानों को अपनी इन लुटेरी, बलात्कारी और खूनी संस्कृतियों को बनाये रखने के असीमित मौलिक अधिकार देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) को बनाये रखने की शपथ ली है|

इसके अतिरिक्त पद, प्रभुता व पेट के लोभमें राष्ट्रपति व राज्यपाल, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन, ईसाई व मुसलमान को, भारतीय संविधान और कानूनों द्वारा संरक्षणपोषण व संवर्धन देनेकेलिए, संविधान के अनुच्छेदों ६० व १५९ के अंतर्गत, शपथ द्वारा विवश कर दिए गए हैं|.

ब्रिटिश उपनिवेश के शासकों के अधिकार शून्य हैं. इसलिए उपनिवेश से मुक्ति लेने के बारे में विचार करिये.

राष्ट्रपति और राज्यपाल बताएं कि मस्जिदों के भडकाऊ अज़ान और खुत्बों पर १८६० से आज तक कार्यवाही क्यों नहीं होती? ईमाम/मुअज्जिन को किसी जज ने सन १८६० से आज तक जेल क्यों नहीं भेजा? उलटे निर्णय दे दिया कि बाइबल और कुरान के विरुद्ध कोई जज सुनवाई ही नहीं कर सकता| (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि इमामों को सरकार खजाने से वेतन दे (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६) और हज अनुदान जारी रहे| (प्रफुल्ल गोरोडिया बनाम संघ सरकार, http://indiankanoon.org/doc/709044/).

 आर्यावर्त सरकार द्वारा मानवता के हित में जारी....


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