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मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

R.N.I. REGISTRATION No.68496/97

Price this issue: Rs. 2/- Yearly Rs. 100/-. Life member Rs. 1000/-.

 


Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 22 Year 22 ISSUE 41, Oct 13-19, 2017. Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com Muj17W41 NL jansunwai

 ||श्री गणेशायेनमः||

जन सुनवाई पोर्टल किसलिए?

मै आप का ध्यान भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) और दँप्रसॅँ धारा १९७ की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ. इस अनुच्छेद की तर्कपूर्ण विवेचना कीजिए. अनुच्छेद नीचे उद्धृत है:-

३९(ग)- आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि जिससे धन व उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए 

अहितकारी संकेन्द्रण न हो" भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व. अनुच्छेद ३९(ग).

इस अनुच्छेद ने नागरिक को किसान के पशु से भी निकृष्ट बना दिया है. राज्य के स्थापना का उद्देश्य प्रजा के जान-माल की रक्षा करना है. इस अनुच्छेद के अधीन राज्य प्रजा को स्वयं लूटता है. भारतीय संविधान के उद्देशिका में समाजवादी शब्द ३-१-१९७७ को जोड़ा गया और १९९१ में बिना संशोधन के अपना टनों सोना बिकने के बाद मुद्रा का २३% अवमूल्यन करके देश बाजारी व्यवस्था पर उतर आया. फिर भी यह अनुच्छेद ज्यों का त्यों बना हुआ है. इस अनुच्छेद के अनुसार व्यक्ति की स्थिति किसान के पशु से भी बुरी है. जिसकी सम्पत्ति चाहती है, एलिज़ाबेथ लूट लेती है. देखें नीचे:-

१९७. न्यायाधीशों और लोकसेवकों का अभियोजन- (१) जब किसी व्यक्ति पर, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या ऐसा लोकसेवक है या था जिसे सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से ही उसके पद से हटाया जा सकेगा, अन्यथा नहीं, किसी ऐसे अपराध का अभियोग है जिसके बारे में यह अभिकथित हो कि वह उसके द्वारा तब किया गया था जब वह अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य कर रहा था या जब उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था, तब कोई भी न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान - ... सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं; ...

उपरोक्त अनुच्छेद के अनुसार नागरिक के पास धन का संकेन्द्रण नहीं होना चाहिए. अतएव एलिज़ाबेथ के लिए जनता की सम्पत्ति लूटना लोकसेवक के पदीय कर्तव्य का निर्वहन है और लूट का विरोध श्री अनुपम खेर के भांति संसद या विधायिका के विशेषाधिकार का हनन. यदि घोटाले की रकम मिल भी जाये तो भी राहुल के अनुसार रकम का ९५% एलिज़ाबेथ व उसके मातहत और उपकरण खा जायेंगे. जनता को मात्र ५% मिलेगा। 

एलिज़ाबेथ द्वारा मनोनीत जो राज्यपाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) के संरक्षण, संवर्धन व पोषण की भारतीय के अनुच्छेद १५९ के अधीन शपथ लेते है. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ द्वारा जो राज्यपाल भ्रष्ट लोक सेवकों को संरक्षण देने के लिए विवश हैं और जजों ने भी जिस अनुच्छेद ३९(ग) को बनाये रखने की शपथ ली है, (भारतीय संविधान, तीसरी अनुसूची, प्रारूप ४ व ८), से निकृष्ट भ्रष्टाचारी कौन हो सकता है?

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ के अधीन संरक्षण दे कर जजों व लोकसेवकों को जनता को लूटने के लिए नियुक्त किया गया है| जब तक जज के अर्दली तारीख पर १० रूपये भेंट लेते हैं, इलाहाबाद उच्च न्यायलय का रजिस्ट्रार तारीख देने के लिए ५०० रूपये और जब तक चौराहे पर ट्राफिक पुलिस वसूली करता है, इन्हें तब तक भ्रष्टाचार नहीं माना जाता - जब तक एलिज़ाबेथ को हिस्सा मिलता है, उनको दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ के अधीन एलिज़ाबेथ अपने द्वारा मनोनीत राज्यपालों से संरक्षण दिलवाती है. हिस्सा न मिले तो एलिज़ाबेथ संरक्षण वापस करवा लेती है.

सब कुछ एलीज़ाबेथ के नियंत्रण मे है। राज्यपाल और जज दोनों ही आतंक की  साया मे रहते हैं। नारायण दत्त तिवारी ने मुख्यमंत्री राजशेखार के भ्रष्टाचार का विरोध किया तो पद गवां बैठे और न्यायमूर्ती कर्णन ने भष्ट जजों की नियुक्ति का विरोध किया और जेल चले गए। 

जज राज्यपाल भूमाफिया, भ्रष्ट और आतंकवादी हैं. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल टीवी राजेश्वर और भूतपूर्व मुख्यमंत्री मुलायम ने गोरखपुर स्थित 

हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल के स्मारक की . एकड़ भूमि ३३ करोड़ रुपयों में व्यापारियों के हाथ बेच दी| जिसके बलिदान के कारण राज्यपाल बने

जब उसे ही नहीं छोड़ा, तो किसे छोड़ेंगे? अब राज्यपाल बनवारी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ के अंतर्गत मुख्यमंत्री मायावती को संरक्षण दे हे

 है. मायावती इंजीनियरों को कत्ल करवा रही है और जन्मदिन पर नोटों की माला पहन रही है| प्रदेश को लूट रही है| हिस्सा राज्यपाल बनवारी और 

एलिज़ाबेथ को दे रही हैजज न्याय के नाम पर अन्याय करते हैं. सत्यमेव जयतेको पीछे धकेल कर, काला लबादा पहन कर, जिस पर कोई दाग 

नहीं लग सकता, विजय को जजों ने गले में उल्टा लटका रखा है. यानी जज तो न्याय कर ही नहीं सकते! जजों ने अपने जहरीले दांत तो उसी दिन 

दिखा दिए थे, जिस दिन जजों ने नागरिकों को प्राप्त संपत्ति के मौलिक अधिकार को लूटा जाना न्याय माना था. ( आई आर १९५१ एस सी ४५८

और ईसाइयत और इस्लाम को अभय दान दिया था. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४)

न्यायपालिका भ्रष्टाचार, ठगी, शोषण, उत्पीड़न, कानूनी छल, जालसाजी, बेईमानी आदि का संगठित तंत्र है| जजों को न्याय के लिए नहीं, अपितु 

जनसेवकों द्वारा एन केन प्रकारेण जनता से लूटी गई सम्पत्तियों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३००() के अधीन बचाने के लिए नियुक्त किया 

जाता है|

सहारा श्री सुब्रत राय जेल मे है। भारतीय संविधान के प्रभाव में एलिज़ाबेथ रतन टाटा, मुकेश-अनिल अम्बानी आदि के द्वारा जनता को लूटने से मात्र आर्यावर्त सरकार बचा सकती है| अतएव भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहें तो उपनिवेश, संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद ३९(ग) को संविधान से और धारा १९७ को दंड प्रक्रिया संहिता से हटाने और अनुच्छेद ३१ को पुनर्जीवित करने में हमारी सहायता करें. 

[अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी.]

नीचे मै आप को दो आदेशों का विवेचन करने के लिए भेज रहा हूँ. राजस्व कर्मियों की जालसाजी सिद्ध है. बेचारा जज ३९(ग) के प्रभाव  में कुछ न कर पाया. दोनों आदेश आज भी निरस्त नहीं हुए हैं। पिछले २८ वर्षों से आज तक किसी जज को साहस नहीं हुआ कि या तो राजस्व कर्मियों को दंडित करे अथवा बदले में ही सही मुझे भूमि ही दिलवा दे! 

सभी लोकसेवक आतंक की साया मे जनता को लूटने और हिस्सा एलीज़ाबेथ तक पहुंचाने के लिए विवश हैं। 


ANNEXURE-1

IN THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD.

*-*-*-*-*-*

CIVIL MISC. WRIT PETITION NO. 9672 OF 1988

District:-Gorakhpur

Shiv Ashrey Tiwari and others ..........Petitioners

versus

Ist . Addl. District Judge, Gorakhpur and others....Respdts.

REPORT/ORDER OF THE JOINT REGISTRAR, DT. 28.7.1989

Hon. Ravi S. Dhavan,J.

In compliance of your Lordship’s order, I checked annexure No. RA-5 and RA-6 on the record of writ Petition No. 9672/88 Sheo Asrey Tewari & and others Vs. I Addl. District Judge & another in respect of plot no. 927 of village Turkamanpur Tappa Kasba Pargana Haveli Sadar Gorkhpur of the year 1323 fasli and 1295 fasli and found that conversation of the land from bigha to acres is correct.

In Khasra of village Turkmanpur(Collector’s record) of 1322 fasli, there are two sets of plots, against Plot no. 927, one set consists of sub -plot no,881, 882, 883 and 888. Another set consists of sub plot no. 875-876-877 and 878. In column no. 3 total area is written to be. 7.32 acre. But in Fard Mutabiqat (Comparative table) of 1322 fasli(Lekhpsl’s record) of village Turkmanpur plot no. 927 consists of sub-plots 881, 882,883,884,885, 875, 876, 877, 878 and 886. Thus, there are addition of plot nos. 884 ,885 after plot no. 888 and 886 after plot no. 878 in Lekhpal’s record and both the records do not tally.

Against the original entry of plot no. 878, figure ‘8’was added on left side to make it read as ‘887’. Thereafter figure ‘8’ on the left side of original figure was cut. This gives impression that it can be read as 878 and 887 both. At page 99, there are cutting but no official has signed on such cutting.

As directed by your Lordship, Urdu, Hindi and English transliteration of the relevant records has been done, which is attached herewith for your Lordship’s kind perusal.

Submitted for kind perusal and order.

Sd/-K.N.Ojha

Joint Registrar ©

28-07-1989

TRUE COPY

Sd. Illegible 3.9.90

S.O.COPYING’D’ SECTION

HIGH COURT ALLAHABAD.

 

\

IN THE HON'BLE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD

*******

ANNEXURE NO.2

IN

CIVIL MISC. WRIT PETITION NO. 9672 OF 1988

District:-Gorakhpur

Shiv Ashrey Tiwari and others ..........Petitioners

versus

Ist . Addl. District Judge, Gorakhpur and others....Respdts.

HIGH COURT, ALLAHABAD

ORDER-SHEET

9-8-1989

Hon: Ravi S. Dhavan

Present:

The petitioner No. 2 in person, Mr. G.L. Tripathi Standing Counsel on behalf of state of U.P. Mr. S. Mandyan, Advocate for Respondent No. 4, holding the brief of Mr. B.D. Mandhyan, Advocate, Mr. K.B. Mathur, Advocate otherwise standing counsel, U.P. for Respondent No. 5.

The petitioner No. 2 has filed an affidavit with eleven annexures, which with the exception of one refer to the land records, otherwise in the possession of the district administration i.e. the State. A copy of this affidavit has already been delivered to counsel for the parties.

All the Respondents have jointly and unanimously prayed and requested the court that the matter be adjourned for today as they feel that the matter needs to be discussed with the Collector and District Magistrate, Gorakhpur. The reason for short adjournment was explained by learned counsel aforesaid. Regard being had to the record as of date, including certified copies of land records filed today, a short adjournment over the week-end was desired to obtain instructions. It was further contended that in consultation with the Collector/ District Magistrate party Respondents would seek instructions to suggest a proposal if another tract of land contiguous to that in the possession of petitioner, as of date, can be made available, subject to such orders as may be passed by this court, so that the interest of all parties can be protected. The request for adjournment, to let the Collector and District Magistrate consider the matter is not unreasonable. The matter is thus adjourned to be listed on August 18, 1989, as August 15 and 17 are public holidays.

After the aforesaid order was passed and at the rising of the court, Mr. B.D. Mandhyan, Advocate entered appearance to insist that the matter be taken up as unlisted tomorrow. The Court requested learned counsel to be briefed by his colleagues in this case on the proceedings as are on record, during his absence, as the request for adjournment may ultimately see a solution and end litigation. Learned counsel insisted that the District Magistrate Gorakhpur has nothing to do with the matter and that he must have his say.

As the matter cannot proceed beyond court hours in any case, place as unlisted tomorrow so that Mr. B.D. Mandhyan, Advocate, may have his say on whatever he contends. Let the record be before the court.

Sd. Ravi S. Dhavan, J.

TRUE COPY

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