Muj17W39 Rohingya



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

R.N.I. REGISTRATION No.68496/97

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Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 22 Year 22 ISSUE 39, Sep 29-Oct 05, 2017. Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com Muj17W39 Rohingya 

 ||श्री गणेशायेनमः||

रोहिंग्या मुसलमान
कृपया रोहिंग्या और इंडियन मुसलमान का भेद न कीजिए।
पंथनिरपेक्ष, सहिष्णु और साम्प्रदायिक सद्भाववादी इस्लाम के कुरान ने मानव जाति को दो हिस्सों मोमिन और काफिर में बाँट रखा है । धरती को भी दो हिस्सों दार उल हर्ब और दार उल इस्लाम में बाँट रखा है (कुरान ८:३९).
काफ़िर को कत्ल करना (कुरआन ८:१७) व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलना मुसलमानों का जिहाद (भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से दिया गया काफिरों की हत्या करने का असीमित संवैधानिक मौलिक मजहबी अधिकार) है। काफिर के हत्या का यह अधिकार, यदि रोहिंग्या मुसलमान न रहें, तो भी समाप्त नहीं होगा।
उपनिवेशवासी की हत्या का अधिकार देने वाले इन बाइबिल, कुरान और भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) और इनके संरक्षण, पोषण और संवर्धन की शपथ लेने वाले राष्ट्रपति (अनुच्छेद६०) और राज्यपालों (अनुच्छेद१५९) का विरोध कौन करेगा?
http://www.aryavrt.com/azaan-aur-snvidhan
यह देश एलिजाबेथ का उपनिवेश है। उपनिवेश वासी एलिजाबेथ के बलिपशु हैं।
अपने ही कानूनों को नहीं मानती एलिजाबेथ। 
क्या बलि का बकरा कहीं न्याय पा सकता है? संविधान का अक्षरश: पालन किया गया होता तो मुझे उपनिवेश विरोध के अपराध मे भादंसं की धारा १२१ के अंतर्गत सन २००० मे ही फांसी मिल चुकी होती।
एलिजाबेथ के मनोनीत राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद १५९ व दंप्रसं की धारा १९६ के अधीन आज भी मुझे फांसी दिलाने हेतु अधिकृत हैं।
इंडियन उपनिवेश के संविधान और भादंसं की धारा १२१ के अधीन ईसाइयत, बाइबिल, इसलाम, कुरान और संविधान के विरुद्ध टिप्पणी भी राज्य के विरुद्ध अपराध है  रासुका या मृत्यु का आमंत्रण है।
अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान,
जिसने राज्यपालों, जजों व लोकसेवकों के पद, प्रभुता और पेट को वैदिक सनातन धर्म के समूल नाश से जोड़ दिया है, का संकलन कर जिन अनुच्छेदों २९(१), ३९(ग), ६० व १५९ और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ व १९७ द्वारा अब्रह्मीसंस्कृतियों को उनकी  हत्या, लूट और बलात्कार की संस्कृतियों को बनाये रखने का मौलिक अधिकार देकर इंडिया में रोका है और विकल्पहीन दया के पात्र जजों, सांसदों, विधायकों और लोक सेवकों ने जिस भारतीय संविधान में आस्था व निष्ठा की शपथ ली है (भारतीय संविधान, तीसरी अनुसूची), उन्होंने जहां भी आक्रमण या घुसपैठ की, वहाँ की मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया| लक्ष्य प्राप्ति में भले ही शताब्दियाँ लग जाएँ, ये संस्कृतियां आज तक विफल नहीं हुईं| इन्हीं अब्रह्मी संस्कृतियों को २०वीं सदी के मीरजाफर पाकपिता - राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी ने वैदिक सनातन संस्कृति को मिटाने के लिए इंडिया में रखा है. विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-
http://www.aryavrt.com/astitv-ka-snkt
यदि ये संस्कृतियां रहेंगी तो अमेरिकी लाल भारतीयों और माया संस्कृति की भांति सनातन मिटा दिया जाएगा।
मैं आपको प्रेरित करता हूं कि आप मुझे फांसी दिलाइए।
₹ की कीमत
यह कि भारत सोने की चिड़िया था. यहाँ सोना गिना नहीं, तौला जाता था. सन १९१७ तक एक ₹ =१३$ था. १९४७ में घट कर १$ हुआ. ८ नवम्बर २०१६ तक एक $ का मूल्य ₹ ६७ हुआ. नमो ने ८ नवम्बर, २०१७ को ₹ शून्य कर दिया।
‌यह कि इंडियन उपनिवेशवासी जिसे ₹ कहते हैं, वह ₹ देने का प्रतिज्ञा पत्र है. धारक का ₹ रिजर्वबैंक के पास रहता है, जिसे धारक को देने के लिए गवर्नर प्रतिज्ञा बद्ध है. इतना ही नहीं, केन्द्रीय सरकार द्वारा ₹ का प्रतिज्ञापत्र प्रत्याभूत भी है.रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की धारा ३३(४) के अनुसार १५ अक्टूबर, १९९० तक १ ₹ का मूल्य ०.११८४८९ ग्राम शुद्ध सोना था, १९९० के बाद से ₹ की कोई कीमत नहीं.
‌यद्यपि  इस ठगी से विश्व का हर व्यक्ति  पीड़ित है, तथापि दिल्ली  उच्च न्यायालय  तक मेरी अपील निरस्त होती रही. अंत में कानून में १९९० के प्रभाव से संशोधन हो गया. संशोधन के फल स्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार नहीं की. एलिजाबेथ अपने ही वचन से मुकर गई. जब कि इस धोखाधड़ी से जज सहित हर उपनिवेश वासी भी पीड़ित था और आज भी है! क्या यही जज की स्वतंत्रता है? क्या महामहिम या कोई जज इस ठगी का विरोध कर सकता है?
मस्जिद, अजान और खुत्बे
भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी उपनिवेशवासी का स्वाभिमान जग जाए और वह इस्लाम का विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ, जेल में सन १९९९ से बंद दारा सिंह ने, २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों और अब कमलेश तिवारी ने किया है, त्यों ही उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को सहजता से समाप्त कर दिया जाये. यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति या राज्यपाल अथवा जिलाधीश ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया – जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय, जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है.
इतना और बता दूं कि इसलाम के स्थापना के बाद से ही आप व एलिजाबेथ सहित हर काफिर प्रसन्नता पूर्वक कत्ल होने की धमकी  सुनता है। लेकिन विरोध कोई नहीं करता और जो विरोध करता है, उसकी ही जड़ काफिर काटते हैं।
विवरण हेतु क्लिक करें,
http://www.aryavrt.com/judgment-on-azaan-eng
‌अप्रति


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