MUJ17W31AY UPNIVESH KYON



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

R.N.I. REGISTRATION No.68496/97

Price this issue: Rs. 2/- Yearly Rs. 100/-. Life member Rs. 1000/-.

 


Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 22 Year 22 ISSUE 31AY, Aug 04-10, 2017. Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com MUJ17W31AY UPNIVESH KYON  

||श्री गणेशायेनमः||


विश्व के उपनिवेश वासियों के न्यायालय मे


मैं ईसाईयत, चर्च, इस्लाम, मस्जिद और उपनिवेश विरोधी हूँ। इनका एक भी विरोधी सुरक्षित अथवा जीवित नहीं है| चाहे वह आसमा बिन्त मरवान हों, या अम्बेडकर या शल्मान रुश्दी हों, या तसलीमा नसरीन या जगतगुरु अमृतानंद देवतीर्थ या साध्वी प्रज्ञा हों अथवा मैं| विशेष विवरण के लिये नीचे की लिंक पर क्लिक करें:-


http://society-politics.blurtit.com/23976/how-did-galileo-die-


http://www.aryavrt.com/asma-bint-marwan


http://www.legislation.gov.uk/ukpga/Geo6/10-11/30 के अनुसार ब्रिटेन शासित भारत का दो स्वतंत्र उपनिवेशों (भारत तथा पाकिस्तान) में विभाजन किया गया। सभी ब्रिटिश कानून आज भी लागू हैं। उपनिवेश का अर्थ स्वतंत्र नहीं होता। जब तक स्वतंत्र के पश्चात का 'उपनिवेश' शब्द अधिनियम से नहीं हटता। कानूनी भाषा मे इंडिया उपनिवेश ही रहेगा। 

एलिजाबेथ के बाइबल के अनुसार, स्वयं को स्वतंत्र मानने वाले उपनिवेशवासियों के पास जीवित रहने का अधिकार नहीं है. "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूं, यहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबल, लूका १९:२७). मनुष्य के पुत्र का मांस खा व लहू पियो” (बाइबल, यूहन्ना ६:५३)

भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन किये गए अपराध राज्य के विरुद्ध अपराध हैं, जिनका नियंत्रण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास है. राष्ट्रपति और राज्यपाल भारतीय संविधान के अनुच्छेदों १५९ व ६० के अंतर्गत अब्रह्मी संस्कृतियों के अनुयायियों द्वारा भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन किये जाने वाले अपराधों को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन संरक्षण, पोषण व संवर्धन देने के लिए विवश हैं.

राज्यपाल का मनोनयन एलिजाबेथ के मातहत और उपकरण करते हैं. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ का संकलन हर उस व्यक्ति को कत्ल कराने, उसका मांस खाने और लहू पीने का डायन एलिजाबेथ को सुगम मार्ग प्रशस्त करता है, जो ईसा को राजा नहीं स्वीकार करता. सन १८६० में उपरोक्त २ धाराएँ लागू हुई थीं, लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के प्रभाव के कारण आज तक बपतिस्मा, चर्च, अज़ान और मस्जिद पर लागू नहीं की गईं. कोई जज सुनवाई ही नहीं कर सकता| (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). बचना हो तो उपनिवेश से मुक्ति लें। 

ईशनिंदा के अपराध में कमलेश तिवारी पर रासुका भी लगी है और अब तक उनका सर कलम कर लाने वाले को ४१ करोड़ रु० देने का फतवा जारी हो चुका है. लेकिन काफिरों के ईष्टदेवों के निंदक मुसलमान और बपतिस्मा दिलाने वाले ईसाई आजतक अभियुक्त नहीं बने! उल्टे ईशनिन्दा व खुतबे के प्रसारण हेतु बदले में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी खजाने से वेतन देने का आदेश दे रखा है| (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६). इतना ही नहीं हज अनुदान के लिए भी कानून बना रखा है| (प्रफुल्ल गोरोडिया बनाम संघ सरकार, http://indiankanoon.org/doc/709044/ ).

ईशनिन्दक के लिए ईसाइयत और इस्लाम में मृत्यु दंड निर्धारित है. मस्जिदों से अज़ान और खुत्बों द्वारा काफिरों के विरुद्ध जो भी कहा जाता है, वह सब कुछ भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अंतर्गत अपराध ही है, जो सन १८६० ई० में इन कानूनों के अस्तित्व में आने के बाद से आज तक मस्जिदों या ईमामों पर कभी भी लागू नहीं की गईं. षड्यंत्र स्पष्ट है वैदिक सनातन संस्कृति को नष्ट करना है. जहां अब्रह्मी संस्कृतियों के अनुयायियों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) द्वारा ईशनिंदा का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार दिया गया है, वहीँ ईशनिंदा के विरोधी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत प्रताड़ित किया जा रहा है. कमलेश तिवारी तो रासुका में बंद हो गए. क्योंकि एलिजाबेथ को उपनिवेशवासियों को धरती से समाप्त करना है. उनको फांसी देने की मांग के लिए पुलिस की पिटाई हो चुकी है. थाना फूंका जा चुका है. राष्ट्रपति और राज्यपाल लाचार हैं. किसी मुसलमान पर अभियोग चलाने की संस्तुति नहीं दे सकते!

भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी उपनिवेशवासी का स्वाभिमान जग जाए और वह विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ, जेल में सन २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों ने किया है और अब कमलेश तिवारी ने किया है, त्यों ही उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को सहजता से समाप्त कर दिया जाये. यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति या राज्यपाल अथवा जिलाधीश ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया – जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय, जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है.

अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान, जिसने राज्यपालों, जजों व लोकसेवकों की पद, प्रभुता और पेट को वैदिक सनातन धर्म के समूल नाश से जोड़ दिया है, का संकलन कर जिन अनुच्छेदों २९(१), ३९(ग), ६० व १५९ और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ व १९७ द्वारा जिन अब्रह्मी संस्कृतियों को उनकी हत्या, लूट और बलात्कार की संस्कृतियों को बनाये रखने का मौलिक अधिकार दे कर इंडिया में रोका है और विकल्पहीन दया के पात्र जजों, सांसदों, विधायकों और लोक सेवकों ने जिस भारतीय संविधान में आस्था व निष्ठा की शपथ ली है (भारतीय संविधान, तीसरी अनुसूची), उन्होंने जहां भी आक्रमण या घुसपैठ की, वहाँ की मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया| लक्ष्य प्राप्ति में भले ही शताब्दियाँ लग जाएँ, अब्रह्मी संस्कृतियां आज तक विफल नहीं हुईं| बचना हो तो मुझसे संपर्क कीजिये। 

सत्ता के हस्तांतरण के दिन, यानी १५ अगस्त, १९४७ को, इंडिया पर एक पैसा विदेश कर्ज नहीं था और खजाने में १५५ करोड़ रूपये थे| आज प्रति व्यक्ति ४६००० रूपये से अधिक का कर्जदार है| एलिजाबेथ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) के अधिकार से उपनिवेशवासियों की जमीनें और जमींदारी लूटी| सोना लूटा| बैंक लूटे| पूँजी और उत्पादन के साधन लूटे| अब लूटने के लिए विदेशों से ५००० हजार से अधिक कम्पनियां बुला ली हैं| एक ईस्ट इंडिया कम्पनी को इंडिया आज तक झेल रहा है| अभी भी मुक्ति नहीं मिली है| ए कम्पनियां उपनिवेशवासियों का क्या हाल करेंगी?

राजा अपने राज्य और प्रिवीपर्स नहीं बचा सके. मेरे पितामह अपनी जमींदारी नहीं बचा सके. बैंकर अपने बैंक नहीं बचा सके. खानों के मालिक अपनी खानें नहीं बचा सके. मैं अपनी २ अरब की सम्पत्ति व हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल का ४ अरब का स्मारक न बचा सका और न लोकसेवक होते हुए पेंशन ही प्राप्त कर सका. और तो और सहारा श्री सुब्रत राय लम्बे अरसे से जेल में हैं. वह भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) से प्राप्त संरक्षण, पोषण व संवर्धन में! उपनिवेशवासी अपना पूजास्थल, नारियाँ, जीवन, सम्पत्ति और पूँजी कैसे बचायेंगे? क्या किसी उपनिवेशवासी को लज्जा नहीं आती? क्या कोई उपनिवेशवासी विरोध कर सकता है?

भारत सोने की चिड़िया था. यहाँ सोना गिना नहीं, तौला जाता था. सन १९१७ तक एक ₹ =१३$ था. १९४७ में घट कर १$ हुआ. ८ नवम्बर २०१६ तक एक $ का मूल्य ६७ हुआ. नमो ने ८ नवम्बर, २०१७ को शून्य कर दिया।

वह भी संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) से प्राप्त अधिकार से

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