Muj17W22 BABRI REVIVED



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

R.N.I. REGISTRATION No.68496/97

Price this issue: Rs. 2/- Yearly Rs. 100/-. Life member Rs. 1000/-.

 


Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 22 Year 22 ISSUE 22,  Jun 02 - 08, 2017. Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com Muj17W22 BABRI REVIVED

  

||श्री गणेशायेनमः||

बाबरी पुनर्जीवित

पत्रांक;BABRI17 दिनांक; 2/6/2017

URL;

महामहिम श्री बान की मून जी!

1. बाबरी परीक्षण के पुनर्जीवन और अभियुक्तों की जमानत के पश्चात, मैं, अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, निम्न कारणों से, मामले की सुनवाई अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में कराए जाने का अनुरोध करता हूँ.

2. इस मामले में मैंने पूर्व में ६ शपथपत्र दिए थे, लेकिन मेरा कोई शपथपत्र किसी कोर्ट के पत्रावली में नहीं है. विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/babri-affidavits

3. इंडिया एलिजाबेथ का स्वतंत्र उपनिवेश है और इस मामले में स्वयं वादी है. एलिजाबेथ को ईसा का आदेश है, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूं, यहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबल, लूका १९:२७). विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/bhartiya-swatantrta-adhiniyam-1947

4. पंथनिरपेक्ष, सहिष्णु और साम्प्रदायिक सद्भाववादी इस्लाम के कुरान ने मानव जाति को दो हिस्सों मोमिन और काफ़िर में बाँट रखा है| धरती को भी दो हिस्सों दार उल हर्ब और दार उल इस्लाम में बाँट रखा है| (कुरान ८:३९). काफ़िर को कत्ल करना (कुरआन ८:१७) व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलना मुसलमानों का जिहाद (भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से दिया गया काफिरों की हत्या करने का असीमित संवैधानिक मौलिक मजहबी अधिकार) है|

5. भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से प्रायोजित, मस्जिदों और चर्चों से ईशनिंदा का प्रसारण और जातिहिंसक शिक्षायें, सन १८६० से लागू भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन, राज्य के विरुद्ध अपराध नहीं मानी जाती| आज तक किसी राष्ट्रपति या राज्यपाल ने, किसी ईमाम पर अभियोग चलाने के लिए संस्तुति नहीं दिया. कोई मुसलमान बंदी नहीं बना.

6. भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी उपनिवेशवासी का स्वाभिमान जग जाए और वह जातिहिंसा का विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ, जेल में सन १९९९ से बंद दारा सिंह ने, २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों और अब कमलेश तिवारी ने किया है, त्यों ही उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को सहजता से समाप्त कर दिया जाये. यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति या राज्यपाल अथवा जिलाधीश ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय, जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है.

7. ईशनिंदा करने और कत्ल करने की शिक्षा देने वाले मुअज्ज़िन, ईमाम और मौलवी, जो सबके गरिमा का हनन करते हैं, अपनी गरिमा और जीविका की रक्षा के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद २७ का उल्लंघन कर, सर्वोच्च न्यायलय के आदेश से, सरकारी खजाने से वेतन पाते हैं| (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६) और हज अनुदान भी| (प्रफुल्ल गोरोडिया बनाम संघ सरकार, http://indiankanoon.org/doc/709044/  ). न्यायपालिका ने यह भी निर्णय दे दिया है कि बाइबल और कुरान के विरुद्ध कोई जज सुनवाई ही नहीं कर सकता| (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). इस प्रकार अज़ान और खुत्बे भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अपराध से मुक्त हैं| ताकि मानवजाति को नष्ट कर दिया जाये.

8. ठीक इसके विपरीत आत्मरक्षार्थ भारतीय दंड संहिता की धाराओं १०२ व १०५ के अधीन अपराधी अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध, इन्हीं भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन राज्य के विरुद्ध गैर जमानती संज्ञेय अपराध हैं| मुसलमान उसे ईशनिंदा के अपराध में कत्ल करने के फतवे देता है और सरकार रासुका में अभियोग चलाती है.

9.  इस प्रकार एलिजाबेथ मानवजाति को मिटाने में लिप्त है. मुझे मानवता की रक्षा का भारतीय दंड संहिता की धारा १०२ के अधीन पूरा अधिकार है. इसलिए मैंने ६ दिसम्बर, १९९२ को बाबरी ढाँचा गिरवा दिया, जो भारतीय दंड संहिता की धारा ९६ के अधीन अपराध नहीं है.

10.    इसलिए परीक्षण अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में चलाया जाना न्यायहित में है.

प्रार्थना

अतः मामले की सुनवाई अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में करवाने की कृपा करें.

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी

०२/०६/१७


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