Muj14W29 dpskdhara 196



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

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Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 19 Year 19 ISSUE 29, Jul 11-17, 2014. This issue is Muj14W29 dpskdhara 196


Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com



Muj14W29 dpskdhara 196

मौत का फंदा धारा १९६

जिससे भी सम्बन्धित हो:-

अभियोग रोहिणी के MM वि० श्री संदीप गुप्ता के न्यायालय का है| एलिजाबेथ के दबाव के कारण बारम्बार अनुरोध के बाद भी दिल्ली सरकार हम  पर थाना नरेला दिल्ली से प्राथमिकी स० ४०६/२००३ व १६६/२००६ के अधीन चले अभियोग वापस न ले सकी| NBW के बाद ३०-१-१४ को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ८२ के अधीन कार्यवाही भी हो गई|

क्यों कि इंडिया आज भी ब्रिटिश उपनिवेश है| {भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, १९४७, अनुच्छेद ६ (ब)(।।) भारतीय संविधान व राष्ट्कुल की सदस्यता}. इंडिया में ओपरेशन ब्लू स्टार सहित सभी निर्णय, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन एलिजाबेथ द्वारा लिए जाते हैं| एलिजाबेथ ईसा के आदेश (बाइबल, लूका १९:२७) और भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) के अधिकार से वैदिक सनातन धर्म मिटा रही है| हम अब्रह्मी संस्कृतियों के विरोधी हैं| इसलिए हमें जीवित छोड़ना एलिजाबेथ के हित में नहीं है|

एलिजाबेथ के उपनिवेश इंडिया के भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) सबसे बड़ा आतंकवादी है, जिसका १९५० से आज तक किसी ने विरोध ही नहीं किया|

अब्रह्मी संस्कृतियों' के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल भारतीय संविधान के अनुच्छेदों, क्रमशः ६० व १५९ व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन, शपथ लेने के लिए विवश कर दिए गए हैं|

अब्रह्मी संस्कृतियों' के विश्वास के अनुसार अविश्वासियों को कत्ल कर देना ही अविश्वासियों पर दया करना और स्वर्ग, जहाँ विलासिता की सभी वस्तुएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, प्राप्ति का पक्का उपाय है| भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) अब्रह्मी संस्कृतियों' को अपनी अब्रह्मी संस्कृतियों' को बनाये रखने का यानी मानवमात्र की हत्या का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार देता है|

अधीन रखने के लिए अधिनियम

अब्रह्मी संस्कृतियों द्वारा अपमानित होकर भी कोई विरोध न कर सके और ईसाई व मुसलमान  को अविश्वासियों को कत्ल करने की और विश्व में ईसा का राज्य व सरियत लागू करने यानी वैदिक सनातन संस्कृति को निर्मूल करने की शिक्षा मिलती रहे यह सुनिश्चित करने के लिए इंडिया में ई०स० १८६० में भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ को लागू किया गया था| गहन अध्ययन से पता चलता है कि इन धाराओं का संकलन बलबा रोकने के लिए या किसी की धार्मिक भावना को आहत होने से रोकने के लिए नहीं, जैसा कि बनावटी तौर पर धाराओं में बताया गया है, बल्कि वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों को लगातार अपमानित कराने, नारियों का बलात्कार कराने, दास बनवाने अन्यथा नरसंहार कराने के लिए किया गया है| नागरिक की भावनाओं से इन धाराओं का कोई सरोकार नहीं है| क्यों कि कुटिलता पूर्वक इन धाराओं के अंतर्गत किये गये अपराध राज्य के विरुद्ध अपराध बना दिए गए हैं और इन धाराओं के अपराध में अभियोग चलाने का अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत तब के वाइसराय जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश में से किसी एक को दिया गया है| नागरिक क्या राष्ट्रपति, राज्यपाल, पुलिस और जज भी असहाय हैं| चर्चों के उपदेशों, मस्जिदों से अज़ान और खुत्बों द्वारा अविश्वासियों के विरुद्ध जो भी कहा जाता है, वह सब कुछ उपरोक्त धाराओं के अंतर्गत अपराध ही है, जो मस्जिदों या ईमामों पर कभी भी लागू नहीं किया गया| क्योंकि एलिजाबेथ को मुसलमानों व ईसाईयों सहित अविश्वासियों को धरती से समाप्त करना है| उपरोक्त धाराओं का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी नागरिक का स्वाभिमान जग जाए और वह विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ और जेल में सन २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों ने किया है, तो उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को सहजता से समाप्त कर दिया जाये| यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति या राज्यपाल ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है| सन १९५० में भारतीय संविधान को थोपे जाने के बाद स्थिति और भयावह हो गई है| जिनके पास वैदिक सनातन धर्म के अनुयायियों के जान-माल के रक्षा का दायित्व है, उनको पद, प्रभुता और पेट के लोभ में वैदिक सनातन धर्म को मिटाने के लिए विवश कर दिया गया है| संविधान का अनुच्छेद २९(१) अब्रह्मी संस्कृतियों को अपनी संस्कृति बनाये रखने का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार देता है| ईमाम मुसलमानों को आप के हत्या और नारियों के बलात्कार की शिक्षा देता है| बदले में सर्वोच्च न्यायालय, भारतीय संविधान के अनुच्छेद २७ का उल्लंघन कर, आप के कर के पैसे से ईमामों को वेतन (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६) व मुसलमानों को हज अनुदान ( http://indiankanoon.org/doc/709044/) दिलवाने के लिए विवश है|

अविश्वासियों को भारतीय दंड संहिता की धारा १०२ के अधीन प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है| यह संस्कृतियों का युद्ध है| मुसलमान नया खलीफा घोषित कर चुके हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि उनके पुराने खलीफा का क्या हुआ? ५३ ईसाई व मुसलमान देश एलिजाबेथ के उपनिवेश हैं| वे तभी तक जीवित हैं, जब तक वैदिक सनातन धर्म जीवित है| अगर मुसलमान अपना अस्तित्व चाहते हों तो इस युद्ध में आर्यावर्त सरकार को सहयोग दें| हम मानवजाति को मुक्ति दिलाने के लिए लड़ रहे हैं|

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, फोन ९१५२५७९०४१

१३ जुलाई. २०१४य.

Registration Number is : DARPG/E/2014/04056

 

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