Muj14W07C S377 IPC



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

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Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 19 Year 19 ISSUE 07C, Feb 07-13, 2014. This issue is Muj14W07C S377 IPC


Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com; Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com



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भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ की समाप्ति जरूरी क्यों?

'अहम् ब्रह्म अस्मि' का तात्पर्य

मनुष्य को जन्म के साथ ही वीर्य के रुप में सारी शक्ति मिली है। वीर्य अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का दाता, स्वतंत्रता, परमानंद, आरोग्य, ओज, तेज और स्मृति का जनक है| वीर्य का सूक्ष्म अंश ब्रह्म यानी मानव के रोम-रोम में उपलब्ध चेतन परमाणु है| यह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व-व्याप्त, वह शक्ति है जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं। वीर्यक्षरण करने व कराने वाला, स्वयं का ही नहीं मानवता का भयानक शत्रु है|

अहम् ब्रह्मास्मि का सरल हिन्दी अनुवाद है कि मैं ब्रह्म हूँ । साधारण व्यक्ति दिग्भ्रमित हैं। इसका कारण यह है कि लोग - जड़ बुद्धि व्याख्याकारों के कहे को अपनाते है। किसी भी अभिकथन के अभिप्राय को जानने के लिए आवश्यक है कि उसके पूर्वपक्ष को समझा जाय। हम वैदिक पंथी उपनिषदों के एक मात्र प्रमाणिक भाष्यकार आदिशंकराचार्य के कथन को प्रमाण मानते हैं, जो किसी व्यक्ति-मन में किसी भी तरह का अंध-विश्वास अथवा विभ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहते थे।

इस अभिकथन के दो स्पष्ट पूर्व-पक्ष हैं-

१) वह धारणा जो व्यक्ति को अधीन करने के लिए धर्म का आश्रित बनाती है। जैसे, एक मनुष्य क्या कर सकता है, करने वाला तो कोई और ही है। मीमांसा दर्शन की कर्मकांड-वादी समझ, जिसके अनुसार फल देवता देते हैं, कर्मकांड की प्राविधि ही सब कुछ है । वह दर्शन व्यक्ति सत्ता को तुच्छ और गौण करता है - देवता, मन्त्र और धर्म को श्रेष्ठ बताता है। सम्प्रभु व्यक्ति के पास पराश्रित (दास) और हताश होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। धर्म में पैगंबर/पौरोहित्य के वर्चस्व तथा कर्मकांड की 'अर्थ-हीन' दुरुहता को (अहम् ब्रह्मास्मि) का अभिकथन चुनौती देता है।

२) सांख्य-दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति (जीव) स्वयं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी करती है - प्रकृति करती है। बंधन में भी सम्प्रभु पुरूष को प्रकृति डालती है तो मुक्त भी सम्प्रभु पुरूष को प्रकृति करती है। यानी सम्प्रभु पुरूष (दास बनकर) सिर्फ़ प्रकृति के इशारे पर नाचता है। इस विचारधारा के अनुसार तो व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व है ही नहीं। इस 'अर्थ-हीन' दुरुहता को (अहम् ब्रह्मास्मि) का अभिकथन चुनौती देता है।

इन दो मानव-सत्ता विरोधी धारणाओं का खंडन और निषेध करके शंकराचार्य मानव-व्यक्तित्व की गरिमा की स्थापना करते हैं। आइये, समझे कि अहम् ब्रह्मास्मि का वास्तविक तात्पर्य क्या है? आप किसे चाहते हैं?

अहम् यानी मैं स्वयं ब्रह्म अस्मि यानी हूँ और यही सच है और यह उतना ही सच है जितना कि दो और दो का चार होना| अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निर्देशित करता है कि मानव यानी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों! आप चाहे मुसलमान हो या ईसाई, अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। किसी ईश्वर, पैगंबर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्ति को अनावश्यक महत्त्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो - उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो, उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ। जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा - उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।

खतने पर अपने शोध के पश्चात १८९१ में प्रकाशित अपने ऐतिहासिक पुस्तक में चिकित्सक पीटर चार्ल्स रेमोंदिनो ने लिखा है कि पराजित शत्रु को जीवन भर पुंसत्वहीन कर (वीर्यहीन कर) दास के रूप में उपयोग करने के लिए शिश्न के अन्गोच्छेदन या अंडकोष निकाल कर बधिया करने (जैसा कि किसान सांड़ के साथ करता है) से खतना करना कम घातक है| पीटर जी यह बताना भूल गए कि दास बनाने के लिए खतने से भी कम घातक वेश्यावृत्ति और समलैंगिक सम्बन्ध को संरक्षण देना है|

http://en.wikipedia.org/wiki/Peter_Charles_Remondino

किसान को सांड़ को दास बना कर खेती के योग्य बैल बनाने के लिए सांड़ का बंध्याकरण करना पड़ता है| आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों के अनुयायी, लूट और कामुक सुख के लोभ में, स्वेच्छा से गाजे बाजे के साथ, मजहब की आड़ में, खतना और इन्द्र की भांति मेनकाओं, वैश्यावृति, समलैंगिक सम्बन्ध और कुमारी माओं को महिमामंडित कर - संप्रभु मनुष्य के ब्रह्मतेज को छीन कर दास बनाती हैं और उनको जीवन भर रोगी, अशक्त और दास बन कर जीने के लिए विवश करती हैं| संत, पुरोहित, मीडिया और शासक मनुष्य से उसके ईशत्व को छीनने वाली अब्रह्मी संस्कृतियों' को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं| यहाँ विश्वामित्र और मेनका का प्रसंग प्रासंगिक है| इंद्र ने वीर्यवान विश्वामित्र को पराजित करने के लिए मेनका का उपयोग किया| मूसा (बाइबल, याशयाह १३:१६) व मुहम्मद (कुरान २३:६) ने तो इंद्र की भांति धरती की सभी नारियां मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप रखी हैं|. इतना ही नहीं ईसा ने बेटी (बाइबल, , कोरिन्थिंस ७:३६) से विवाह की छूट दी है| अल्लाह ने मुहम्मद का निकाह उसकी पुत्रवधू जैनब (कुरान, ३३:३७-३८) से किया और ५२ वर्ष के आयु में ६ वर्ष की आयशा से उसका निकाह किया| आप की कन्या को बिना विवाह बच्चे पैदा करने के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र संघ कानून पहले ही बना चुका है| [मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा| अनुच्छेद २५(२)]. विवाह या बिना विवाह सभी जच्चे-बच्चे को समान सामाजिक सुरक्षा प्रदान होगी|”]. लव जेहाद, बेटी व पुत्रवधू से विवाह, सहजीवन व समलैंगिक मैथुन और सगोत्रीय विवाह को कानूनी मान्यता मिल गई है| बारमें दारू पीने वाली बालाओं का सम्मान हो रहा है! विवाह सम्बन्ध अब बेमानी हो चुके हैं| जजों ने सहजीवन (बिना विवाह यौन सम्बन्ध) और सगोत्रीय विवाह (भाई-बहन यौन सम्बन्ध) को कानूनी मान्यता दे दी है| सोनिया के सत्ता में आने के बाद सन २००५ से तीन प्रदेशों केरल, गुजरात और राजस्थान में स्कूलों में यौन शिक्षा लागू हो गई है| शीघ्र ही अमेरिका की भांति इंडिया के विद्यालयों में गर्भ निरोधक गोलियां बांटी जाएँगी| जजों की कृपा से आप की कन्याएं मदिरालयों में दारू पीने और नाच घरों में नाचने के लिए स्वतन्त्र हैं| उज्ज्वला - नारायण दत्त तिवारी और आरुषि - हेमराज में जजों के फैसलों ने आने वाले समाज की दिशा निर्धारित कर दी है| आप वैश्यावृत्ति से अपनी नारियों को बचा न पाएंगे|

आतताई मजहब ईसाइयत के प्रसार हेतु मैकाले ने निःशुल्क ब्रह्मचर्य के शिक्षा केंद्र गुरुकुलों को मिटाकर किसान द्वारा सांड़ को बैल बनाकर दास के रूप में उपयोग करने की भांति, महँगी वीर्यहीन करने वाली यौनशिक्षा थोपकर मानवमात्र को अशक्त तो सन १८३५ के बाद ही कर दिया| २६ जनवरी, १९५० से, माउन्टबेटन ने, इंद्र के मेनका की भांति, अपनी पत्नी एडविना को नेहरू व जिन्ना को सौंप कर, ब्रिटिश उपनिवेश इंडिया पर मृत्यु के फंदे व परभक्षी भारतीय संविधान को लादकर मानवमात्र को अशक्त और पराजित कर रखा है| मानवमात्र से उन की अपनी ही धरती छीन कर ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया| मजहब के आधार पर पुनः दो भाग कर इंडिया और पाकिस्तान बना दिया| (भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, १९४७). माउन्टबेटन को इससे भी संतुष्टि नहीं हुई| उसने मौत के फंदे व परभक्षी भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन करा कर, मानवमात्र को कत्ल होने के लिए, सदा सदा के लिए मानवमात्र की धरती छीन कर संयुक्त रूप से मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप दिया|

राष्ट्रपति और राज्यपालों को वैदिक सनातन संस्कृति को समूल नष्ट करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद ६० व १५९ के अधीन शपथ लेने के लिये विवश कर दिया| इतना ही नहीं मस्जिदों और चर्चों से ईशनिंदा का प्रसारण और जातिहिंसक शिक्षायें भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन राज्य के विरुद्ध अपराध नहीं मानी जाती| लेकिन आत्मरक्षार्थ भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १०२ व १०५ के अधीन अपराधी संस्कृतियों अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन राज्य के विरुद्ध गैर जमानती संज्ञेय अपराध है|

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, फोन ९१५२५७९०४१

१२/०२/१४

Registration Number is : DEPOJ/E/2014/00148

http://pgportal.gov.in

यह सार्वजनिक अभिलेख है| कोई भी व्यक्ति इस पर हुई कार्यवाही का उपरोक्त न० द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है|

 

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AyodhyaP Tripathi,
Feb 12, 2014, 3:01 AM
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AyodhyaP Tripathi,
Feb 12, 2014, 2:59 AM
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