Muj13W52D NMO


मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

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Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 18 Year 18 ISSUE 52D, Dec. 27, 2013 - Jan. 02, 2014. This issue is Muj13W52D NMO

Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 18 Year 18. Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com Web site: http://aaryavrt.blogspot.com and http://www.aryavrt.com

 


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क्या नमो अपनी भी रक्षा कर पाएंगे?


चुनाव धोखा है| इंडिया का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और राज्यपाल भी अंग्रेजों का दास है|


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इंडिया आज भी राष्ट्रकुल का सदस्य व ब्रिटिश उपनिवेश है| {भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, १९४७ व भारतीय संविधान का अनुच्छेद ६ (ब)(।।)}. क्या मोदी हमें स्वतंत्रता दिला देंगे? उपरोक्त सच्चाई लिखने या कहने वाला जीवित नहीं छोड़ा जाता|


मैकाले ने निःशुल्क ब्रह्मचर्य के शिक्षा केंद्र गुरुकुलों को मिटाकर किसान द्वारा सांड़ को बैल बनाकर दास के रूप में उपयोग करने की भांति, महँगी वीर्यहीन करने वाली यौनशिक्षा थोपकर मानवमात्र को अशक्त तो सन १८३५ के बाद ही कर दिया| २६ जनवरी, १९५० से, माउन्टबेटन ने, इंद्र के मेनका की भांति, अपनी पत्नी एडविना को नेहरू व जिन्ना को सौंप कर, ब्रिटिश उपनिवेश इंडिया पर मृत्यु के फंदे व परभक्षी भारतीय संविधान को लादकर मानवमात्र को अशक्त और पराजित कर रखा है| मानवमात्र से उन की अपनी ही धरती छीन कर ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया| मजहब के आधार पर पुनः दो भाग कर इंडिया और पाकिस्तान बना दिया| (भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, १९४७). माउन्टबेटन को इससे भी संतुष्टि नहीं हुई| उसने मौत के फंदे व परभक्षी भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन करा कर, मानवमात्र को कत्ल होने के लिए, सदा सदा के लिए मानवमात्र की धरती छीन कर संयुक्त रूप से मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप दिया| इतना ही नहीं मस्जिदों और चर्चों से ईशनिंदा का प्रसारण और जातिहिंसक शिक्षायें भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन राज्य के विरुद्ध अपराध नहीं मानी जाती| लेकिन आत्मरक्षार्थ भारतीय दंड संहिता की धाराओं १०२ व १०५ के अधीन अपराधी संस्कृतियों ईसाइयत और इस्लाम का विरोध भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन राज्य के विरुद्ध गैर जमानती संज्ञेय अपराध है|


क्या नमो गुरुकुलों की निःशुल्क ब्रह्मचर्य की शिक्षा व्यवस्था को लागू करा पाएंगे?


अधीन रखने के लिए अधिनियम


इस्लाम द्वारा अपमानित होकर भी कोई विरोध न कर सके और मुसलमानों को काफिरों को कत्ल करने की और विश्व में सरियत लागू करने यानी वैदिक सनातन संस्कृति को निर्मूल करने की शिक्षा मिलती रहे – यह सुनिश्चित करने के लिए इंडिया में ई०स० १८६० में भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ को लागू किया गया था| गहन अध्ययन से पता चलता है कि इन धाराओं का संकलन बलबा रोकने के लिए या किसी की धार्मिक भावना को आहत होने से रोकने के लिए नहीं, जैसा कि बनावटी तौर पर धाराओं में बताया गया है, बल्कि वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों को लगातार अपमानित कराने, दास बनवाने अन्यथा नरसंहार कराने के लिए किया गया है| नागरिक की भावनाओं से इन धाराओं का कोई सरोकार नहीं है| क्यों कि इन धाराओं के अंतर्गत किये अपराध राज्य के विरुद्ध अपराध हैं और इन धाराओं के अपराध में अभियोग चलाने का अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत तब के वाइसराय जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश में से किसी एक को दिया गया है| नागरिक क्या पुलिस और जज भी असहाय हैं| मस्जिदों से अज़ान और खुत्बों द्वारा काफिरों के विरुद्ध जो भी कहा जाता है, वह सब कुछ उपरोक्त धाराओं के अंतर्गत अपराध ही है, जो मस्जिदों या ईमामों पर कभी भी लागू नहीं किया गया| उपरोक्त धाराओं का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी नागरिक का स्वाभिमान जग जाए और वह विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ और जेल में सन २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों ने किया है, तो उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई इस्लाम का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को समाप्त कर दिया जाये| यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति, राज्यपाल ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया – जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है|


इतना ही नहीं! वैदिक सनातन संस्कृति को समूल नष्ट करने व सबको दास बनाने का ईसाइयत और इस्लाम को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) के अधीन असीमित मौलिक मजहबी अधिकार दिया गया है|


ईसाइयत और इस्लाम के इन अधिकारों का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने के लिए, राष्ट्रपति और राज्यपालों को, भारतीय संविधान के अनुच्छेद ६० व १५९ के अधीन, शपथ दिला कर विवश कर दिया गया है| लेकिन वैदिक सनातन धर्म अभी तक मिटा नहीं और जब तक वैदिक सनातन धर्म रहेगा, लोगों को दास बनाने में कठिनाई होगी| अतएव सोनिया सरकार मानसून सत्र में साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा अधिनियम,२०११ ला रही है| संदेश स्पष्ट है| कांग्रेस जिताओ हिंदू मिटाओ|


क्या नमो भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ को हटा पायेंगे?


सोनिया के साम्प्रदायिक साम्राज्य विस्तारवादी ईसा को अर्मगेद्दन द्वारा धरती पर केवल अपनी पूजा करानी है| हिरण्यकश्यप की दैत्य संस्कृति न बची और केवल उसी की पूजा तो हो न सकी, अब ईसा और ईसाइयत की बारी है| चुनाव द्वारा भी इनमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं| कुरान के अनुसार अल्लाह व उसके साम्प्रदायिक साम्राज्य विस्तारवादी इस्लाम ने मानव जाति को दो हिस्सों मोमिन और काफ़िर में बाँट रखा है| धरती को भी दो हिस्सों दार उल हर्ब और दार उल इस्लाम में बाँट रखा है| (कुरान ८:३९) काफ़िर को कत्ल करना व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलना मुसलमानों का मजहबी अधिकार है| जिसके विरुद्ध कोई जज सुनवाई नहीं कर सकता| मस्जिदों से ईमाम मुसलमानों को उपदेश देते हैं कि जो अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना करता है, वह काफ़िर है| काफ़िर या तो अपनी उपासना पद्धति त्याग दे और मुसलमानों की भांति खतना कराकर शासक (सोनिया) का दास बने – अन्यथा मुसलमान उसे कत्ल कर दें| मस्जिदों से ऐसा कथन ई० सन० ६३२ से ही बलवे का कारण बन रहा है और काफिरों के उपासना की आजादी का भी अतिक्रमण है – बलवे के लिये उत्प्रेरित करने वाले के विरुद्ध भारतीय  दंड संहिता की धारा १५३  के अधीन अभियोग चलाने की अनुमति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत राष्ट्रपति या राज्यपाल अथवा जिलाधीश ही दे सकते हैं| अपमान काफिरों का होता है – लेकिन काफ़िर शिकायत भी नहीं कर सकते| इतना ही नहीं - जो काफ़िर नागरिकों के गरिमा का हनन करते हैं, उन ईमामों के गरिमा और जीविका की रक्षा के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद २७ का उल्लंघन कर वेतन देने का न्यायपालिका ने आदेश पारित किया है| (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६). न्यायपालिका ने भारतीय संविधान, कुरान और बाइबल को संरक्षण (एआईआर, कलकत्ता, १९८५,  प१०४) भी दिया है| हज अनुदान को भी सर्वोच्च न्यायलय कानूनी मान्यता दे चुकी है| (प्रफुल्ल गोरोडिया बनाम संघ सरकार, http://indiankanoon.org/doc/709044/) यानी मानवता को मिटाने के लिए अज़ान, धर्मान्तरण, मस्जिद और चर्च संघ सरकार द्वारा प्रायोजित व संरक्षित है|


अज़ान हमारे ईश्वर का अपमान है और मस्जिद से ईमाम काफिरों को कत्ल करने का उपदेश देता है| भारतीय  दंड संहिता की धारा १०२ के अधिकार से अभिनव भारत और आर्यावर्त सरकार के ९ अधिकारी मस्जिद और अज़ान का विरोध करने के कारण २००८ से जेलों में बंद हैं? संदेश अत्यंत स्पष्ट है| वैदिक सनातन धर्म के किसी अनुयायी को न सोनिया जीवित छोड़ेगी और न हामिद अंसारी|  


क्या नमो मस्जिद, चर्च, अज़ान और खुत्बों को बंद करा पाएंगे? क्या नमो बलवे के लिये उत्प्रेरित करने वाले ईमामों और मौलवियों के विरुद्ध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत अभियोग चलाने की अनुमति दे पाएंगे?


अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी, फोन ९१५२५७९०४१


Registration Number is:MINHA/E/2013/02586


http://pgportal.gov.in  Monday, December 30, 2013Y


यह सार्वजनिक अभिलेख है| कोई भी व्यक्ति इस पर हुई कार्यवाही का उपरोक्त न० द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है|







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