Muj12W08 BandKaro Azaan

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बंद करो अजान

काबा हमारा ज्योतिर्लिंग है, अजान ईश्वरनिन्दा है, मस्जिद सेनावास हैं और कुरान सारी दुनिया में फुंक रही है. हम इस्लाम और मस्जिद नहीं रहने देंगे|

आधुनिक दुर्गा साध्वी पूर्ण चेतनानंद की ललकार| भायखला, मुंबई कारागार से!

हरी-हर निंदा सुनहि जो काना|होहि पाप गोघात समाना|

अजान ईशनिंदा है| इसे सुनते हुए आप को लज्जा क्यों नहीं आती? अजान और मस्जिद के खुतबों के लिए कृपा कर मेरी वेबसाइट http://www.aryavrt.com/muj11w40-islam-mitayen देखें|

मस्जिदों से ईमाम और मौलवी मुसलमानों को बताते हैं कि गैर-मुसलमानों को कत्ल कर दो| इतना ही नहीं, मस्जिद से इस्लामी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए पाकिस्तानी मौलिक धर्मतंत्री सैयद अबुल आला मौदूदी घोषित करता है कि इस्लाम विश्व की पूरी धरती चाहता है – उसका कोई भूभाग नहीं, बल्कि पूरा ग्रह – इसलिए नहीं कि ग्रह पर इस्लाम की सार्वभौमिकता के लिए तमाम देशों को आक्रमण कर छीन लिया जाये बल्कि इसलिए कि मानव जाति को इस्लाम से, जो कि मानव मात्र के सुख-समृद्धि(?) का कार्यक्रम है, लाभ हो|

मौदूदी जोर दे कर कहता है कि यद्यपि गैर-मुसलमान झूठे मानव निर्मित मजहबों को मानने के लिए स्वतन्त्र हैं, तथापि उनके पास अल्लाह के  धरती के किसी भाग पर अपनी मनुष्य निर्मित गलत धारणा की हुकूमत चलाने का कोई अधिकार नहीं| यदि वे (काफ़िर) ऐसा करते हैं, तो मुसलमानों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे काफिरों की राजनैतिक शक्ति छीन लें और उनको (काफिरों को) इस्लामी तौर तरीके से जीने के लिए विवश करें|

एकेश्वरवाद - दास बनाने की अनूठी विधि

सबको दास बनाना और स्वयं दास बनना ईसाइयत (बाइबल, उत्पत्ति २:१७) और इस्लाम (कुरान २:३५) के मूर्ख अनुयायियों की फितरत है. एकेश्वरवाद के अनुसंधान का यही कारण है. मूसा एकेश्वरवाद का जनक है. मसीह ईसा और मुहम्मद तो नकलची हैं. जेहोवा और अल्लाह से क्रमशः मूसा और मुहम्मद ही मिल सकते हैं. इस प्रकार धूर्त पैगम्बरों ने मानव मात्र को दास बनाने की अनूठी विधि ढूंढ रखी है. यहूदी मूसा का दास है और मुसलमान मुहम्मद का. जो दास नहीं बनता उसे पैगम्बर लूट और नारी बलात्कार का लोभ देकर कत्ल कराते हैं. इस प्रकार ईसाइयत और इस्लाम मानव मात्र को दास बनाने का अमोघ अस्त्र है, पैगम्बर तो रहे नहीं-उत्तराधिकार शासकों (सोनिया को) और पुरोहितों को सौँप गए हैं.

दासता को पुष्ट करने के लिए नागरिक के सम्पत्ति को छीना जाना आवश्यक है. अतएव संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन कर ईसाइयत और इस्लाम को अपने लूट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण की संस्कृति को बनाये रखने का मौलिक अधिकार दिया गया है. इसके अतिरिक्त राज्यपालों और प्रेसिडेंट को भारतीय संविधान के संरक्षण, संवर्धन व पोषण का अनुच्छेदों १५९ व ६० के अंतर्गत भार सौंपा गया है. लोकसेवकों को संरक्षण देने के लिए भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ बनाई गई है. जो भी लूट का विरोध करे उसे उत्पीड़ित करने की भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत व्यवस्था की गई है.

इसलिए धरती पर अजान होना और मस्जिद रहना गैर-मुसलमान के गले पर रखी हुई तलवार है|

मस्जिदों से ईमाम और मौलवी मुसलमानों को बताते हैं कि गैर-मुसलमानों को कत्ल कर दो| इतना ही नहीं, मस्जिद से इस्लामी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए पाकिस्तानी मौलिक धर्मतंत्री सैयद अबुल आला मौदूदी घोषित करता है कि इस्लाम विश्व की पूरी धरती चाहता है – उसका कोई भूभाग नहीं, बल्कि पूरा ग्रह – इसलिए नहीं कि ग्रह पर इस्लाम की सार्वभौमिकता के लिए तमाम देशों को आक्रमण कर छीन लिया जाये बल्कि इसलिए कि मानव जाति को इस्लाम से, जो कि मानव मात्र के सुख-समृद्धि(?) का कार्यक्रम है, लाभ हो|

मौदूदी जोर दे कर कहता है कि यद्यपि गैर-मुसलमान झूठे मानव निर्मित मजहबों को मानने के लिए स्वतन्त्र हैं, तथापि उनके पास अल्लाह के  धरती के किसी भाग पर अपनी मनुष्य निर्मित गलत धारणा की हुकूमत चलाने का कोई अधिकार नहीं| यदि वे (काफ़िर) ऐसा करते हैं, तो मुसलमानों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे काफिरों की राजनैतिक शक्ति छीन लें और उनको (काफिरों को) इस्लामी तौर तरीके से जीने के लिए विवश करें|

कुरान के बनी इस्राएल अध्याय (कुरान १७:८१) के आयत में लिखा है, कह दो: सत्य आ गया और असत्य मिट गया; असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है| इसकी टिप्पणी में कहा गया है कि यह आयत अली द्वारा काबा परिसर की ३५९ मूर्तियों को तोड़ने के बाद उतरी थी|

काबा के मंदिर होने का प्रमाण

तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल के मकतब-ए-सुल्तानिया पुस्तकालय में एक सोने की तस्तरी रखी हुई है| इसमें निम्न लिखित लेख खुदे हुए हैं| यह तश्तरी काबा के गर्भ गृह से ला कर यहाँ सुरक्षित रखी हुई है|

लेख अरबी में है| इसका अनुवाद निम्न लिखित है:-

वे भाग्शाली थे, जो महाराज विक्रमादित्य के शासन काल में पैदा हुए और जिए|वे एक सज्जन, उदार और कर्तव्य निष्ठ शासक थे; वे अपनी प्रजा के सुख-समृधि के लिये समर्पित थे| लेकिन उस समय हम भुलक्कड़ अरब वासी, वासना के आनंद में खोये हुए थे| चारो ओर उत्पीडन और षडयंत्र जारी था| अरब के लोगों को अज्ञान ने रात्रि के प्रारम्भिक चाँद की भांति घेर रखा था| लेकिन वर्तमान सूर्योदय के प्रकाश सदृश शिक्षा, महाराज विक्रमादित्य की उदारता देखरेख ने हम जैसे विदेशियों की अनदेखी नहीं की| महाराज ने अपने पवित्र धर्म को हम लोगों के बीच फैलाया और ऐसे मूर्धन्य विद्वानों को भेजा जिन्होंने अपने देश के ज्ञान का प्रकाश हमारे देश तक पहुँचाया|इन विद्वानों और गुरुओं की शिक्षा, जिनकी उदारता के कारण, हमें पुनः ईश्वर के पवित्र अस्तित्व का ज्ञान हुआ और अरब सच्चाई के मार्ग पर अग्रसर हुए|

उपरोक्त खुदे हुए लेख से हम निम्न लिखित निर्णय पर पहुँचते हैं:-

महाराज विक्रमादित्य के काल में भारत का साम्राज्य अरब में था|

अरबों का जो भी मूल धर्म रहा हो, वहाँ ज्ञान, विज्ञानं और वैदिक सनातन धर्म का प्रचार प्रसार महाराज विक्रमादित्य के कारण ही हुआ|

पृष्ठ ३१५- सायर-उल-ओकुल और इसका मतलब होता है याद रखने वाले शब्द|

अतः हमारा उत्तरदायित्व है कि हम मस्जिद समाप्त करें| अजान पर प्रतिबन्ध लगाएं|

कुरान तो अमेरिका में जल ही रही है|

सम्पादक.

 

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AyodhyaP Tripathi,
Mar 4, 2012, 9:49 AM
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AyodhyaP Tripathi,
Mar 4, 2012, 9:50 AM
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