Maikale Vs Gurukul



मुजहना MUJAHANA weekly

77, Khera Khurd, Delhi-110082 (BHARAT)

R.N.I. REGISTRATION No.68496/97

Price this issue: Rs. 2/- Yearly Rs. 100/-. Life member Rs. 1000/-.

 


Mujahana• Bilingual-Weekly• Volume 21 Year 21 ISSUE 43,  Oct 21-27, Published every Thursday for Manav Raksha Sangh, Registered Trust No 35091 by Ayodhya Prasad Tripathi, at 77, Khera Khurd, Delhi – 110082. ``Phone +91-9868324025.; +(91) 9152579041 . Printed by Ayodhya Prasad Tripathi at 77 Khera Khurd, Delhi-110082. Editor: Ayodhya Prasad Tripathi. Processed on Desk Top Publishing & CYCLOSTYLED by Ayodhya Prasad Tripathi.  Email: aryavrt39@gmail.com Web site: http://aaryavrt.blogspot.com andhttp://www.aryavrt.com Maikale Vs Gurukul

||श्री गणेशायेनमः||

प्रेसनोट

मैकाले के ईसाकुल बनाम गुरुकुल.

सेवा में,

महामहिम श्री बान की मून महोदय!

http://bastarkiabhivyakti.blogspot.in/2011/04/blog-post.html

" किसी अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक टांड़  ( LoFT  ) ही भारत और अरब देशों के समग्र देशी साहित्य के बराबर मूल्यवान है. .......मुझे लगता है कि पूर्व के लेखक साहित्य के जिस क्षेत्र में सर्वोच्च हैं, वह क्षेत्र काव्य का है. पर मुझे अभी तक ऐसा एक भी पूर्वी विद्वान नहीं मिला है जो यह कह सके कि महान यूरोपीय राष्ट्रों की कविता के साथ अरबी और संस्कृत काव्य की तुलना की जा सकती है. ............मेरा तो यह मानना है कि संस्कृत में लिखे गए समग्र साहित्य में संकलित ज्ञान का ब्रिटेन की प्राथमिक शालाओं में प्रयुक्त छोटे से लेखों से भी कम मूल्य है. "

मैकाले

"........यदि सरकार भारत की वर्त्तमान शिक्षा पद्यतियों को ज्यों का त्यों बनाए रखने के पक्ष में है तो मुझे समिति के अध्यक्ष पद से निवृत्त होने की अनुमति दें. मुझे लगता है कि भारतीय शिक्षा पद्यति भ्रामक है, इसलिए हमें अपनी ही मान्यताओं पर दृढ रहना चाहिए .  ..........वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें सार्वजनिक शिक्षा मंडल जैसा प्रतिष्ठापूर्ण नाम धारण करने का कोई अधिकार नहीं है ."

मैकाले  

परन्तु मैकाले की साम्राज्यवादी शोषक बुद्धि में तो कुछ और ही गणित चल रहा था, उसने भारत के प्रति आग उगलते हुए और तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के प्रति रोष प्रकट करते हुए अपना वक्तव्य दिया - "........हास्यास्पद इतिहास (पुराणेतिहास ), मूर्खतापूर्ण आध्यात्म शास्त्र, विवेक बुद्धि के लिए अग्राह्य धर्मशास्त्र के बोझ से लदी हुयी, शिक्षण काल में अन्य लोगों पर निर्भर और इस शिक्षा को प्राप्त करने के पश्चात या तो भूखों मरने या जीवन भर दूसरों के सहारे जीने की विवशता वाले ...और इस प्रकार विवश बना देने वाले निर्मूल्य विद्वानों की श्रेणियां तैयार करने वाले शिक्षण में धन का दुर्व्यय ही किया जा रहा है .............यदि अपनी समग्र कार्य पद्यति बदली नहीं जाती तो मैं संस्था के लिए सर्वथा निरुपयोगी ही नहीं अपितु अवरोध बन जाऊंगा. अतः मैं इस संस्था के सभी उत्तरदायित्वों से मुक्त होना चाहता हूँ."

शिक्षा नीति बदल दी गई. युवक वीर्यहीन हो रहे हैं और युवतियां UNO के UDHR के अनुच्छेद २५(२) के प्रोत्साहन एवं संरक्षण में वेश्याएँ बन रही हैं.

मैकाले  

  थोमस मुनरो (Thomas Munro) ने मद्रास रेजीडेंसी में साक्षरता जानने के लिए १८२३ में सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ शत% साक्षरता थी.

उस युग में समाज को शिक्षित करने का दायित्व ब्राह्मणों पर ही था. जो दलित और पिछड़ा समाज शिक्षक ब्राह्मणों का भिक्षा देकर भरण पोषण करता था और बदले में जो ब्राह्मण तथाकथित दलित समाज की संतति को सम्प्रभु बनाता था, आज वही दलित और पिछड़ा समाज ब्राह्मणों का शत्रु बन गया है. लेकिन जिस एलिजाबेथ ने उनके सम्प्रभु बनाने वाले गुरुकुलों को नष्ट कर, उनकी सकल सम्पदा लूट कर और प्रताड़ित कर उन्हें बलिपशु बना लिया है, उसके विरुद्ध वे कुछ नहीं बोल सकते! क्या ब्राह्मणों को नष्ट कर दलित व पिछड़ा समाज अपना अस्तित्व बचा पायेगा?

मैकाले के इस ईर्ष्यापूर्ण प्रलाप में प्रच्छन्न रूप से यूरोपीय समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं तथा पारिवारिक संघटन की स्पष्ट झलक मिल जाती है. उसने शिक्षा को ज्ञान का नहीं अपितु बड़े गर्व से धनोपार्जन का माध्यम स्वीकार किया है. भारत में परिवार के उत्तरदायित्व यूरोपीय परिवारों से अलग हैं. बल्कि वहाँ तो परिवार की अवधारणा ही भारत से बिलकुल भिन्न है. यहाँ विद्यार्थी को परिवार या समाज पर बोझ नहीं माना जाता बल्कि उत्तरदायित्व समझ कर प्रसन्नता पूर्वक उसका पालन किया जाता है. तभी तो प्राचीन भारत में विश्व के पाँच-पाँच विश्व विख्यात विश्वविद्यालयों का संचालन बड़ी सफलतापूर्वक किया जाता रहा. इन सारी परम्पराओं को यूरोपीय परिवार या वहाँ के समाज के ढाँचे में रहकर समझ पाना संभव नहीं है. जहाँ तक इतिहास की बात है तो भारतीय पुराणेतिहास से ब्रिटेन के लोगों का क्या लेना-देना ? परन्तु हमारे लिए तो वह गौरवपूर्ण एवं प्रेरणास्पद होने से अत्यंत महत्वपूर्ण है. धर्म और आध्यात्म के प्रति मैकाले के नकारात्मक विचार उसके अपने हैं और नितांत व्यक्तिगत हैं जिन्हें उसने पूरे यूरोपीय समाज पर थोपने का असफल प्रयास किया. उस समय मैकाले भले ही अपनी धूर्तता में सफल रहा पर भारतीय ज्ञान-विज्ञान, कला, संस्कृति, धर्म और आध्यात्म के प्रति यूरोप के आकर्षण को आज तक समाप्त नहीं कर सका.

इस सम्पूर्ण काल में गुरुकुल प्रणाली के समाप्त होने के पश्चात भारतीय समाज ने अपनी ओर से शिक्षा के स्वरूप पर कभी कोई चिंता प्रकट नहीं की. वह पूरी तरह शासन पर ही निर्भर रहा है. जब जैसा मिल गया तब वैसा स्वीकार कर लिया. भारतीयों की यह आत्मघाती प्रवृत्ति है जिसके दुष्परिणाम भी उसे ही भोगने पड़ रहे हैं. भारतीय समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसे कैसी शिक्षा चाहिए  ...किसमें उसका कल्याण निहित है ...शोषण मूलक शिक्षा या सर्व कल्याणकारी शिक्षा यदि उसे अपनी प्राचीन गौरवशाली परम्परा के साथ कल्याणकारी श्रेयस्कर जीवन की चाह है तो शासन का मुंह देखे बिना स्वयं उसे ही आगे आना होगा ...एक सर्व कल्याणकारी शैक्षणिक क्रान्ति के लिए .

सुधीजन यदि इच्छुक हों तो वे धर्मपाल की लिखी पुस्तक - "१८ वीं शताब्दी के भारत में विज्ञान एवं तंत्र-ज्ञान  " का अवलोकन कर सकते हैं. इस लेख के लिए उसी पुस्तक से जानकारी ली गयी है.            


+++

ADDED 17530

गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ?

 

भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ? कॉन्वेंट स्कूलों ने किया बर्बाद | 1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोलेने की थी। लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा था Thomas Munro ! दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। Litnar, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है |

 

मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्थाको पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्थालानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे | मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है : कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया | जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी | फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया | उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा- पीटा, जेल में डाला।

 

1850 तक इस देश में ’7 लाख 32 हजारगुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे ’7 लाख 50 हजार’ | मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में ‘Higher Learning Institute’ हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलके चलाते थे न कि राजा, महाराजा | इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया | उस समय इसे फ्री स्कूलकहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं |

 

मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि: इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा | इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी | समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। संयुक्तराष्टसंघजो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है।

जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी।

        

  

Comments