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अ० मु० मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्री विनोद कुमार गौतम, तीसहजारी, दिल्ली के न्यायालय से सम्बन्धित पत्र

 

विषय: आप द्वारा मानव मात्र के प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का दमन|

संदर्भ: आप द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन चलाए गए २ अभियोग प्राथमिकी संख्याएँ ४४०/१९९६; ४८४/१९९६ थाना रूप नगर, उत्तरी दिल्ली|

आप को भेजा गया स्पीडपोस्ट No. EV242730125IN SP SWARGASHRAM (249304) dtd 17/07/2012.

महामहिम श्री नजीब जंग जी,

संस्कृतियों का युद्ध

मैं यह घोषणा करता हूँ कि मैंने १५३क के अधीन कोई अपराध नहीं किया है| चूंकि ईसाइयत इस्लाम और  भारतीय संविधान कुटरचित अभिलेख हैं, जो मानव मात्र को दास बनाने अन्यथा हत्या करने के लिए निर्मित किये गए हैं; अतः भारतीय दंड संहिता की धाराओं ९७, १०२ व १०५ से प्राप्त प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधीन मुझे अपने व मानव जाति के प्राण रक्षा का अधिकार है| अतएव इन संस्कृतियों को धरती पर रहने का अधिकार नहीं है|

मैं मानव मात्र से निवेदन करता हूँ कि ईसाइयों और मुसलमानों सहित जिसे भी सम्पत्ति व पूँजी का अधिकार, दासता से मुक्ति, अपनी नारियों का सम्मान, अपने पूर्वजों की संस्कृति आदि चाहिए, इस धर्म युद्ध मे मेरा साथ दें|

आज आप को मैंने ३ शपथपत्र भेजे हैं, जिनको विद्वान सुश्री स्मिता गर्ग ने पत्रावली पर लेने से इंकार कर दिया है| मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है| मैंने बाबरी ढांचा गिरवाया था| मैंने स्वीकारोक्ति के ६ शपथपत्र दिए थे, जिनमे से कोई पत्रावली पर उपलब्ध नहीं हैं| आशा करता हूँ कि आप प्राप्ति की सूचना देने की कृपा करेंगे|

(एक वर्ष पूरे होने वाले हैं| लेकिन मुझे अपने पत्र की पावती भी नहीं मिली है|)

शपथपत्रों को आप के पास भेजने का कारण यह है कि मेरे विरुद्ध अभियोग दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन आप के संस्तुति से चल रहे हैं| अतएव पिछले १६ वर्षों से मेरे उत्पीड़न के अपराधी आप ही हैं| न्यायालय के अधिकार मेरे मामले में शून्य हैं| अगर न्यायालय ने मुझे सजा नहीं दिया, तो पीठासीन अधिकारी नौकरी नहीं कर पायेगा| अपने शपथ पत्र में मैंने प्रमाण सहित इसका विवरण दिया है|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) के अधीन इंडिया के नागरिक सोनिया के रोम राज्य के अपराधी हैं| (बाइबल, लूका १९:२७). अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान का संकलन कर जिन विश्व की सर्वाधिक आबादी ईसाइयत और दूसरी सर्वाधिक आबादी इस्लाम को, अल्पसंख्यक घोषित कर, वैदिक सनातन धर्म को मिटाने के लिए इंडिया में रोका है, उन्होंने जहां भी आक्रमण या घुसपैठ की, वहाँ की मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया. लक्ष्य प्राप्ति में भले ही शताब्दियाँ लग जाएँ, ईसाइयत और इस्लाम आज तक विफल नहीं हुए| भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से अधिकार प्राप्त कर ईसाइयत व इस्लाम मिशन व जिहाद की हठधर्मिता के बल पर वैदिक संस्कृति को मिटा रहे हैं| मस्जिद से अजान द्वारा ईशनिंदा कर रहे हैं, हमें कत्ल करने की शिक्षाएं दे रहे हैं और मंदिर तोड़ रहे हैं| चढ़ावों को लूट रहे हैं| वे हठधर्मी सिद्धांत हैं, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूंयहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो." (बाइबललूका १९:२७) और "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना)  बाकी न रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये." (कुरानसूरह अल अनफाल ८:३९). (कुरान, बनी इस्राएल १७:८१ व कुरानसूरह अल-अम्बिया २१:५८). (बाइबलव्यवस्था विवरण १२:१-३). स्पष्टतः वैदिक सनातन धर्म मिटाना दोनों का घोषित कार्यक्रम है.

आप दया के पात्र हैं| भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३१ व ३९(ग) के अधीन आप ने जीविका, पद और प्रभुता हेतु अपनी सम्पत्ति व पूँजी रखने का अधिकार स्वेच्छा से त्याग दिया है| अपने जीवन का अधिकार खो दिया है| [बाइबल, लूका, १९:२७ और कुरान २:१९१, भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) के साथ पठित|] अपनी नारियां ईसाइयत और इस्लाम को सौँप दी हैं| (बाइबल, याशयाह १३:१६) और (कुरान २३:६). इसके बदले में आप के पास बेटी (बाइबल , कोरिन्थिंस ७:३६) से विवाह व पुत्रवधू (कुरान, ३३:३७-३८) से निकाह करने का अधिकार है| जहां ईसाइयत और इस्लाम को अपनी संस्कृतियों को बनाये रखने का असीमित मौलिक अधिकार है, वहीँ आप को वैदिक सनातन धर्म को बनाये रखने का कोई अधिकार नहीं है|

आप यह युद्ध नहीं लड़ सकते| आप आत्मघाती और वैदिक सनातन धर्म के द्रोही हैं| मैं संस्कृतियों का युद्ध लड़ रहा हूँ| ईसाइयत और इस्लाम आतताई और दास बनाने वाली संस्कृतियां हैं. भारतीय संविधान, ईसाइयत और इस्लाम है तो मानव जाति बच नहीं सकती| इस सत्य को छिपाने के लिए दंप्रसं की धारा १९६ का संकलन किया गया है| जो भी सच लिखेगा उसको मिटाने के लिए आप ने शपथ ली है| क्यों कि आप ने भारतीय संविधान और कानूनों के रक्षा की शपथ ली है| (भारतीय संविधान का अनुच्छेद १५९).

प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में

96. प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई बातें--कोई बात अपराध नहीं हैजो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की जाती है

97. शरीर तथा संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार--धारा 99 में अंतर्विष्ट निर्बन्धनों के अध्यधीनहर व्यक्ति को अधिकार है किवह--

पहला--मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे ;

आर्यावर्त सरकार मानव मात्र के प्राणों की रक्षा करना चाहती है और आप हत्या कराने के लिए शपथ लेकर सोनिया द्वारा उप राज्यपाल मनोनीत किये गए हैं| आप को जीवित रहने का अधिकार नहीं है|

वीर्यहीन करने वाले मजहब|


भवदीय,

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी (सूचना सचिव)

फोन; ९१५२५७९०४१

मंगल आश्रम, टिहरी मोड, मुनि की रेती, ऋषिकेश, टिहरी गढ़वाल, उ०ख०, २४९१३७.

 दिनांक; रविवार, १४ जुलाई २०१३.

 

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