IPC Hindi

भारतीय दण्ड संहिता, 1860

(1860 का अधिनियम संख्यांक 45)1

[6 अक्तूबर, 1860]

प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विय में

96. प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई बातें--कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की जाती है ।

97. शरीर तथा संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार--धारा 99 में अंतर्विष्ट निर्बन्धनों के अध्यधीन, हर व्यक्ति को अधिकार है कि, वह--

पहला--मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे ;

दूसरा--किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है, अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम, चाहे स्थावर संपत्ति की प्रतिरक्षा करे ।

 () रात्रि में एक ऐसे गॄह में प्रवेश करता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है । , सद््भावपूर्वक को गॄह-भेदक समझकर, पर आक्रमण करता है । यहां इस भ्रम के अधीन पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं करता किंतु क, के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह तब रखता, जब उस भ्रम के अधीन कार्य न करता ।

99. कार्य, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है--यदि कोई कार्य, जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद््भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह कार्य विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।

यदि कोई कार्य, जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद््भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निदेश से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह निदेश विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।

उन दशाओं में, जिनमें संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है ।

इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार--किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं हैं, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है ।

स्पष्टीकरण 1--कोई व्यक्ति किसी लोक सेवा द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित, कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है ।

स्पष्टीकरण 2--ोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के निदेश से किए गए, या किए जाने के लिए प्रयतित, किसी कार्य के वरिद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है, जब तक कि वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है, तो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे ।

102. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बना रहना--शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारंभ हो जाता है, जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अपराध न किया गया हो, और वह तब तक बना रहता है जब तक शरीर के संकट की ऐसी आशंका बनी रहती है ।

103. कब संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मॄत्यु कारित करने तक का होता है--संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन दोकर्ता की मॄत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित भारतीय दंड संहिता, 1860 17

करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए जाने के, या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपश्चात्् प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात््:--

पहला--लूट ;

दूसरा--रात्रौ गॄह-भेदन ;

तीसरा--अग्नि द्वारा रिष्टि, जो किसी ऐसे निर्माण, तंबू या जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में या संपत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग में लाया जाता है ;

चौथा--चोरी, रिष्टि या गॄह-अतिचार, जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया है, जिनसे युक्तियुक्ति रूप से यह आशंका कारित हो कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मॄत्यु या घोर उपहति होगा ।

104. ऐसे अधिकार का विस्तार मॄत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का कब होता है--यदि वह अपराध, जिसके किए जाने या किए जाने के प्रयत्न से प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, ऐसी चोरी, रिष्टि या आपराधिक अतिचार है, जो पूर्वगामी अंतिम धारा में प्रगणित भांतियों में से किसी भांति का न हो, तो उस अधिकार का विस्तार स्वेच्छया मॄत्यु कारित करने तक का नहीं होता किन्तु उसका विस्तार धारा 99 में वर्णित निर्बंधनों के अध्यधीन दोकर्ता की मॄत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है ।

105. सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बना रहना--सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार तब प्रारंभ होता है, जब सम्पत्ति के संकट की युक्तियुक्त आशंका प्रारंभ होती है ।

संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार, चोरी के विरुद्ध अपराधी के संपत्ति सहित पहुंच से बाहर हो जाने तक अथवा या तो लोक प्राधिकारियों की सहायता अभिप्राप्त कर लेने या संपत्ति प्रत्युद्धॄत हो जाने तक बना रहता है ।

संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार लूट के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी किसी व्यक्ति की मॄत्यु या उपहाति, या सदो अवरोध कारित करता रहता या कारित करने का प्रयत्न करता रहता है, अथवा जब तक तत्काल मॄत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल वैयक्तिक अवरोध का, भय बना रहता है ।

संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार आपराधिक अतिचार या रिष्टि के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी आपराधिक अतिचार या रिष्टि करता रहता है ।

संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार रात्रौ गॄह-भेदन के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक ऐसे गॄहभेदन से आरंभ हुआ गॄह-अतिचार होता रहता है ।

106. घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जब कि निर्दो व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है--जिस हमले से मॄत्यु की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित होती है उसके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने में यदि प्रतिरक्षक ऐसी स्थिति में हो कि निर्दो व्यक्ति की अपहानि की जोखिम के बिना वह उस अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से न कर सकता हो तो उसके प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार वह जोखिम उठाने तक का है ।

दृष्टांत

पर एक भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है, जो उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है । वह उस भीड़ पर गोली चलाए बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से नहीं कर सकता, और वह भीड़ में मिले हुए छोटे-छोटे शिशुओं की अपहानि करने की जोखिम उठाए बिना गोली नहीं चला सकता । यदि वह इस प्रकार गोली चलाने से उन शिशुओं में से किसी शिशु को अपहानि करे तो कोई अपराध नहीं करता ।

अध्याय 5

दुष्प्रेरण के विय में

107. किसी बात का दुष्प्रेरण--वह व्यक्ति किसी बात के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, जो--

पहला--उस बात को करने के लिए किसी व्यक्ति को उकसाता है ; अथवा

दूसरा--उस बात को करने के लिए किसी ड््यंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मिलित होता है, यदि उस ड््यंत्र के अनुसरण में, और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई कार्य या अवैध लोप घटित हो जाए ; अथवा

तीसरा--उस बात के किए जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करता है । भारतीय दंड संहिता, 1860 18

स्पष्टीकरण 1--जो कोई व्यक्ति जानबूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा, या तात्विक तथ्य, जिसे प्रकट करने के लिए वह आबद्ध है, जानबूझकर छिपाने द्वारा, स्वेच्छया कसी बात का किया जाना कारित या उपाप्त करता है अथवा कारित या उपाप्त करने का प्रयत्न करता है, वह उस बात का किया जाना उकसाता है, यह कहा जाता है ।

दृष्टांत

, एक लोक आफिसर, न्यायालय के वारन्ट द्वारा को पकड़ने के लिए प्राधिकॄत है । उस तथ्य को जानते हुए और यह भी जानते हुए कि , , नहीं है, को जानबूझकर यह व्यपदिष्ट करता है कि , है, और एतद््द्वारा साशय से को पकड़वाता है । यहां , के पकड़े जाने का उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण करता है ।

स्पष्टीकरण 2--जो कोई या तो किसी कार्य के किए जाने से पूर्व या किए जाने के समय, उस कार्य के किए जाने को सुकर बनाने के लिए कोई बात करता है और तद््द्वारा उसके किए जाने को सुकर बनाता है, वह उस कार्य के करने में सहायता करता है, यह कहा जाता है ।

108. दुष्प्रेरक--वह व्यक्ति अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है या ऐसे कार्य के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, जो अपराध होता, यदि वह कार्य अपराध करने के लिए विधि अनुसार समर्थ व्यक्ति द्वारा उसी आशय या ज्ञान से, जो दुष्प्रेरक का है, किया जाता ।

स्पष्टीकरण 1--किसी कार्य के अवैध लोप का दुष्प्रेरण अपराध की कोटि में आ सकेगा, चाहे दुष्प्रेरक उस कार्य को करने के लिए स्वयं आबद्ध न हो ।

स्पष्टीकरण 2--दुष्प्रेरण का अपराध गठित होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित कार्य किया जाए या अपराध गठित करने के लिए अपेक्षित प्रभाव कारित हो ।

दृष्टांत

() की हत्या करने के लिए को उकसाता है । वैसा करने से इन्कार कर देता है । हत्या करने के लिए के दुष्प्रेरण का दोी है ।

() की हत्या करने के लिए को उकसाता है । ऐसी उकसाहट के अनुसरण में को विद्ध करता है । का घाव अच्छा हो जाता है । हत्या करने के लिए को उकसाने का दोी है ।

स्पष्टीकरण 3--यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ हो, या उसका वही दूषित आशय या ज्ञान हो, जो दुष्प्रेरक का है, या कोई भी दूषित आशय या ज्ञान हो ।

दृष्टांत

() दूषित आशय से एक शिशु या पागल को वह कार्य करने के लिए दुष्प्रेरित करता है, जो अपराध होगा, यदि वह ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए जो कोई अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ है और वही आशय रखता है जो कि का है । यहां, चाहे वह कार्य किया जाए या न किया जाए क अपराध के दुष्प्रेरण का दोी है ।

() की हत्या करने के आशय से ख को, जो सात वर्ष से कम आयु का शिशु है, वह कार्य करने के लिए क उकसाता है जिससे य की मॄत्यु कारित हो जाती है । ख दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप वह कार्य क की अनुपस्थिति में करता है और उससे य की मॄत्यु कारित करता है । यहां यद्यपि वह अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ नहीं था, तथापि उसी प्रकार से दण्डनीय है, मानो वह अपराध करने के लिए विधि-अनुसार समर्थ हो और उसने हत्या की हो, और इसलिय मॄत्यु दण्ड से दण्डनीय है ।

() को एक निवासगॄह में आग लगाने के लिए क उकसाता है । अपनी चित्तविकॄति के परिणामस्वरूप उस कार्य की प्रकॄति या यह कि वह जो कुछ कर रहा है वह दोपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है जानने में असमर्थ हाने के कारण क के उकसाने के परिणामस्वरूप उस गॄह में आग लगा देता है । ने कोई अपराध नहीं किया है, किन्तु एक निवासगॄह में आग लगाने के अपराध के दुष्प्रेरण का दोी है, और उस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है ।

() चोरी कराने के आशय से य के क्ब्जे में से य की सम्पत्ति लेने के लिए ख को उकसाता है । को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है कि वह सम्पत्ति क की है । उस सम्पत्ति का इस विश्वास से कि वह क की सम्पत्ति है, य के कब्जे में से सद्भावपूर्वक ले लेता है । इस भ्रम के अधीन कार्य करते हुए, उसे बेईमानी से नहीं लेता, और इसलिए चोरी नहीं करता ; किन्तु चोरी के दुष्प्रेरण का दोी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, मानो ने चोरी की हो ।

स्पष्टीकरण 4--अपराध का दुष्प्रेरण अपराध होने के कारण ऐसे दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी अपराध है ।

दृष्टांत

को की हत्या करने को उकसाने के लिए ख को क उकसाता है । तदनुकूल की हत्या करने के लिए ख को उकसाता है और ख के उकसाने के परिणामस्वरूप ग उस अपराध को करता है । अपने अपराध के लिए हत्या के दण्ड से दण्डनीय है, और ने उस अपराध को करने के लिए ख को उकसाया, इसलिए क भी उसी दण्ड से दण्डनीय है ।

स्पष्टीकरण 5--ड््यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक उस अपराध को करने वाले व्यक्ति के साथ मिलकर उस अपराध की योजना बनाए । यह पर्याप्त है कि उस ड््यंत्र में सम्मिलित हो जिसके अनुसरण में वह अपराध किया जाता है ।

दृष्टांत

को वि देने के लिए क एक योजना ख से मिलकर बनाता है । यह सहमति हो जाती है कि क वि देगा । तब यह वर्णित करते हुए को वह योजना समझा देता है कि कोई तीसरा व्यक्ति वि देगा, किन्तु का नाम नहीं लेता । ग वि उपाप्त करने के लिए सहमत हो जाता है, और उसे उपाप्त करके समझाए गए प्रकार से प्रयोग में लाने के लिए ख को परिदत्त करता है । वि देता है, परिणामस्वरूप की मॄत्यु हो जाती है । यहां, यद्यपि और ने मिलकर डयंत्र नहीं रचा है, तो भी ग उस डयंत्र में सम्मिलित रहा है, जिसके अनुसरण में की हत्या की गई है । इसलिए ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है और हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है ।

1[108. भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण--वह व्यक्ति इस संहिता के अर्थ के अन्तर्गत अपराध का दुष्प्रेरण करता है, जो 2[भारत] से बाहर और उससे परे किसी ऐसे कार्य के किए जाने का 2[भारत] में दुष्प्रेरण करता है जो अपराध होगा, यदि 2[भारत] में किया जाए ।

दृष्टांत

2[भारत] में को, जो गोवा में विदेशीय है, गोवा में हत्या करने के लिए उकसाता है । हत्या के दुष्प्रेरण का दोी है ।

109. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहां कि उसके दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है--जो कोई किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, तो वह उस दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है ।

स्पष्टीकरण--कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाता है, जब वह उस उकसाहट के परिणामस्वरूप या उस डयंत्र के अनुसरण में या उस सहायता से किया जाता है, जिससे दुष्प्रेरण गठित होता है ।

दृष्टांत

() को, जो एक लोक सेवक है, के पदीय कॄत्यों के प्रयोग में क पर कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में क रिश्वत की प्रस्थापना करता है । ख वह रिश्वत प्रतिगॄहीत कर लेता है । क ने धारा 161 में परिभाषित अपराध का दुष्प्रेरण किया है ।

() को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए उकसाता है । उस उकसाहट के परिणामस्वरूप, वह अपराध करता है । क उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है जिससे ख है ।

() को वि देने का डयंत्र और ख रचते हैं । उस डयंत्र के अनुसरण में वि उपाप्त करता है और उसे ख को इसलिए परिदत्त् करता है कि वह उसे को दे । उस डयंत्र के अनुसरण में वह वि क की अनुपस्थिति में को दे देता है और उसके द्वारा य की मॄत्यु कारित कर देता है । यहां, हत्या का दोी है । डयंत्र द्वारा उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोी है, और वह हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है ।

110. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है--जो कोई किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न् आशय या ज्ञान से वह कार्य किया हो, तो वह उसी दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, जो किया जाता यदि वह कार्य दुष्प्रेरक के ही आशय या ज्ञान से, न कि किसी अन्य आशय या ज्ञान से, किया जाता ।

111. दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है--जब कि किसी एक कार्य का दुष्प्रेरण किया जाता है, और कोई भिन्न कार्य किया जाता है, तब दुष्प्रेरक उस किए गए कार्य के लिए उसी प्रकार से और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने सीधे उसी कार्य का दुष्प्रेरण किया हो :

परन्तुक--परन्तु यह तब जब कि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था और उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता से या उस डयंत्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वह दुष्प्रेरण गठित होता है ।

दृष्टांत

1 1889 के अधिनियम सं0 4 की धारा 3 द्वारा जोड़ा गया ।

2 ब्रिटिश भारत शब्द अनुक्रमशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं0 3 को धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए हैं ।

 () एक शिशु को य के भोजन में वि डालने के लिए क उकसाता है, और उस प्रयोजन से उसे वि परिदत्त करता है । वह शिशु उस उकसाहट के परिणामस्वरूप भूल से म के भोजन में, जो य के भोजन के पास रखा हुआ है, वि डाल देता है । यहां, यदि वह शिशु क के उकसाने के असर के अधीन उस कार्य को कर रहा था, और किया गया कार्य उन परिस्थितियों में उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम है, तो क उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने उस शिशु को म के भोजन में वि डालने के लिए उकसाया हो ।

() को का गॄह जलाने के लिए उकसाता है । उस गॄह को आग लगा देता है और उसी समय वहां सम्पत्ति की चोरी करता है । यद्यपि गॄह को जलाने के दुष्प्रेरण का दोी है, किन्तु चोरी के दुष्प्रेरण का दोी नहीं है ; क्योंकि वह चोरी एक अलग कार्य थी और उस गॄह जलाने का अधिसम्भाव्य परिणाम नहीं थी ।

() और को बसे हुए गॄह में अर्धरात्रि में लूट के प्रयोजन से भेदन करने के लिए उकसाता है, और उनको उस प्रयोजन के लिए आयुध देता है । और वह गॄह-भेदन करते हैं, और य द्वारा जो निवासियों में से एक है, प्रतिरोध किए जाने पर, की हत्या कर देते हैं । यहां, यदि वह हत्या उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम थी, तो हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है ।

112. दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिए और किए गए कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय ह--यदि वह कार्य, जिसके लिए दुष्प्रेरक अन्तिम पूर्वगामी धारा के अनुसार दायित्व के अधीन है, दुष्प्रेरित कार्य के अतिरिक्त किया जाता है और वह कोई सुभिन्न अपराध गठित करता है, तो दुष्प्रेरक उन अपराधों में से हर एक के लिए दण्डनीय नहीं है ।

दृष्टांत

को एक लोक सेवक द्वारा किए गए करस्थम् का बलपूर्वक प्रतिरोध करने के लिए उकसाता है । परिणमस्वरूप उस करस्थम् का प्रतिरोध करता है । प्रतिरोध करने में करस्थम् का निष्पादन करने वाले आफिसर को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है । ने करस्थम् का प्रतिरोध करने और स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के दो अपराध किए हैं । इसलिए दोनों अपराधों के लिए दण्डनीय है, और यदि यह सम्भाव्य जानता था कि उस करस्थम् का प्रतिरोध करने में स्वेच्छया घोर उपहति कारित करेगा, तो भी उनमें से हर एक अपराध के लिए दण्डनीय होगा ।

113. दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक द्वारा आशयित से भिन्न हो--जब कि कार्य का दुष्प्रेरण दुष्प्रेरक द्वारा किसी विशिष्ट प्रभाव को कारित करने के आशय से किया जाता है और दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप जिस कार्य के लिए दुष्प्रेरक दायित्व के अधीन है, वह कार्य दुष्प्रेरक के द्वारा आशयित प्रभाव से भिन्न प्रभाव कारित करता है तब दुष्प्ररेक कारित प्रभाव के लिए उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने उस कार्य का दुष्प्रेरण उसी प्रभाव को कारित करने के आशय से किया हो परन्तु यह तब जब कि वह यह जानता था कि दुष्प्रेरित कार्य से वह प्रभाव कारित होना सम्भाव्य है ।

दृष्टांत

को घोर उपहति करने के लिए को क उकसाता है । उस उकसाहट के परिणामस्वरूप को घोर उपहति कारित करता है । परिणामतः की मॄत्यु हो जाती है । यहां यदि यह जानता था कि दुष्प्रेरित घोर उपहति से मॄत्यु कारित होना सम्भाव्य है, तो हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है ।

114. अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति--जब कभी कोई व्यक्ति जो अनुपस्थित होने पर दुष्प्रेरक के नाते दण्डनीय होता, उस समय उपस्थित हो जब वह कार्य या अपराध किया जाए जिसके लिए वह दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दण्डनीय होता, तब यह समझा जाएगा कि उसने ऐसा कार्य या अपराध किया है ।

115. मॄत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण--यदि अपराध नहीं किया जाता--जो कोई मॄत्यु या 1[आजीवन कारावास] से दण्डनीय अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ;

यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है--और यदि ऐसा कोई कार्य कर दिया जाए, जिसके लिए दुष्प्रेरक उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दायित्व के अधीन हो और जिससे किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो, तो दुष्प्रेरक दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

दृष्टांत

को की हत्या के लिए क उकसाता है । वह अपराध नहीं किया जाता है । यदि की हत्या कर देता है, तो वह मॄत्यु या 1[आजीवन कारावास] के दण्ड से दण्डनीय होता । इसलिए, कारावास से, जिसका अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है और जुर्माने से भी दण्डनीय है ; और यदि दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप को कोई उपहति हो जाती है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

1 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा आजीवन निर्वासनके स्थानपर प्रतिस्थपित भारतीय दंड संहिता, 1860

116. कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण--यदि अपराध न किया जाए--जो कोई कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण करेगा यदि वह अपराध का दुष्प्रेरण करेगा यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह उस अपराध के लिए उपबन्धित किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित दीर्घतम अवधि के एक चौथाई भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ;

यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो--और यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक हो, जिसका कर्तव्य ऐसे अपराध के लिए किए जाने को निवारित करना हो, तो वह दुष्प्रेरक उस अपराध के लिए उपबंधित किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि के आधे भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधित है, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

दृष्टांत

() को, जो एक लोक सेवक है, के पदीय कॄत्यों के प्रयोग में अपने प्रति कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में रिश्वत की प्रस्थापना करता है । उस रिश्वत को प्रतिगॄहीत करने से इन्कार कर देता है । इस धारा के अधीन दण्डनीय है ।

() मिथ्या साक्ष्य देने के लिए को उकसाता है । यहां, यदि मिथ्या साक्ष्य न दे, तो भी ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है, और वह तद्नुसार दण्डनीय है ।

() , एक पुलिस आफिसर, जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करना है, लूट किए जाने का दुष्प्रेरण करना है । यहां, यद्यपि वह लूट नहीं की जाती, उस अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से, और जुर्माने से भी, दण्डनीय है ।

() द्वारा, जो एक पुलिस आफिसर है, और जिसका कर्तव्य लूट को निवारित करता है, उस अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, यहां यद्यपि वह लूट ने की जाए, लूट के अपराध के लिए उपबन्धित कारावास की दीर्घतम अवधि के आधे से, और जुर्माने से भी, दण्डनीय है ।

117. लोक साधारण द्वारा या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण--जो कोई लोक साधारण द्वारा, या दस से अधिक व्यक्तियों की किसी भी संख्या या वर्ग द्वारा किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।

दृष्टांत

, एक लोक स्थान में एक प्लेकार्ड चिपकाता है, जिसमें एक पंथ को जिसमें दस से अधिक सदस्य हैं, एक विरोधी पंथ के सदस्यों पर, जब कि वे जुलूस निकालने में लगे हुए हों, आक्रमण करने के प्रयोजन से, किसी निश्चित समय और स्थान पर मिलने के लिए उकसाया गया है । ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है ।

118. मॄत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना--जो कोई मॄत्यु या 1[आजीवन कारावास] से दंडनीय अपराध का किया जाना सुकर बनाने के आशय से या संभाव्यतः तद््द्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए,

ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी, कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है,

यदि अपराध कर दिया जाए--यदि अपराध नहीं किया जाए--यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, अथवा यदि अपराध न किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और दोनों दशाओं में से हर एक में जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

दृष्टांत

, यह जानते हुए कि स्थान पर डकैती पड़ने वाली है, मजिस्ट्रेट को यह मिथ्या इत्तिला देता है कि डकैती स्थान पर, जो विपरीत दिशा में है, पड़ने वाली है और इस आशय से कि तद््द्वारा उस अपराध का किया जाना सुकर बनाए मजिस्ट्रेट को भुलावा देता है । डकैती परिकल्पना के अनुसरण में स्थान पर पड़ती है । इस धारा के अधीन दंडनीय है ।

119. किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक द्वारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है--जो कोई लोक सेवक होते हुए उस अपराध का किया जाना, जिसका निवारण करना ऐसे लोक सेवक के नाते उसका कर्तव्य है, सुकर बनाने के आशय से या संभाव्यतः तद््द्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए,

ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है,

1 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा आजीवन निर्वासनके स्थान पर प्रतिस्थापित । भारतीय दंड संहिता, 1860 22

यदि अपराध कर दिया जाए--यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि के आधी तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधित है, या दोनों से,

यदि अपराध मॄत्यु आदि से दंडनीय है--अथवा यदि वह अपराध मॄत्यु या 1[आजीवन कारावास] से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी,

यदि अपराध नहीं किया जाए--अथवा यदि वह अपराध नहीं किया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधित है, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

दृष्टांत

, एक पुलिस आफिसर, लूट किए जाने से संबंधित सब परिकल्पनाओं की, जो उसको ज्ञात हो जाए, इत्तिला देने के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए और यह जानते हुए कि लूट करने की परिकल्पना बना रहा है, उस अपराध के किए जाने को सुकर बनाने के आशय से ऐसी इत्तिला देने का लोप करता है । यहां ने की परिकल्पना के अस्तित्व को एक अवैध लोप द्वारा छिपाया है, और वह इस धारा के उपबंध के अनुसार दंडनीय है ।

120. कारावास से दंडनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना--जो कोई उस अपराध का किया जाना, जो कारावास से दंडनीय है, सुकर बनाने के आशय से या संभाव्यतः तद््द्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए,

ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा, जिसका मिथ्या होना वह जानता है,

यदि अपराध कर दिया जाए--यदि अपराध नहीं किया जाए--यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी, और यदि वह अपराध नहीं किया जाए, तो वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की दीर्घतम अवधि के आठवें भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुर्माने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधित है, या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

1[अध्याय 5

आपराधिक ड््यंत्र

120. आपराधिक ड््यंत्र की परिभा--जब कि दो या अधिक व्यक्ति--

(1) कोई अवैध कार्य, अथवा

(2) कोई ऐसा कार्य, जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने को सहमत होते हैं, तब ऐसी सहमति आपराधिक ड््यंत्र कहलाती है :

परंतु किसी अपराध को करने की सहमति के सिवाय कोई सहमति आपराधिक ड््यंत्र तब तक न होगी, जब तक कि सहमति के अलावा कोई कार्य उसके अनुसरण में उस सहमति के एक या अधिक पक्षकारों द्वारा नहीं कर दिया जाता ।

स्पष्टीकरण--यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुंगिक मात्र है ।

120. आपराधिक ड््यंत्र का दंड--(1) जो कोई मॄत्यु, 2[आजीवन कारावास] या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय अपराध करने के आपराधिक ड््यंत्र में शरीक होगा, यदि ऐसे ड््यंत्र के दंड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दंडित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था ।

(2) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दंडनीय अपराध को करने के आपराधिक ड््यंत्र से भिन्न किसी आपराधिक ड््यंत्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।]

अध्याय 6

राज्यों के विरुद्ध अपराधों के विय में

121. भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना--जो कोई 1[भारत सरकार] के विरुद्ध युद्ध करेगा, या ऐसा युद्ध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा युद्ध करने का दुष्प्रेरण करेगा, वह मॄत्यु या 2[आजीवन कारावास] से दंडित किया जाएगा 3[और जुर्माने से भी दंडनीय होगा]

1 1913 के अधिनियम सं0 8 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।

2 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा (1-1-1956 से) निर्वासनके स्थान पर प्रतिस्थापित । भारतीय दंड संहिता, 1860 23

4[दृष्टांत]

5।।। 3[भारत सरकार] के विरुद्ध विप्लव में सम्मिलित होता है । ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है ।

6। । । । ।

7[121. धारा 121 द्वारा दंडनीय अपराधों को करने का ड््यंत्र--जो कोई धारा 121 द्वारा दंडनीय अपराधों में से कोई अपराध करने के लिए 8[भारत] के भीतर 9।।। या बाहर ड््यंत्र करेगा, या 10[केंद्रीय सरकार को या किसी 11[राज्य] की सरकार को 12।।।ट आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करने का ड््यंत्र करेगा, वह 13[आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा 14[और जुर्माने से भी दंडनीय होगा]

स्पष्टीकरण--इस धारा के अधीन ड््यंत्र गठित होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसके अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप गठित हुआ हो ।]

122. भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना--जो कोई 15[भारत सरकार] के विरुद्ध या तो युद्ध करने, या युद्ध करने की तैयारी करने के आशय से पुरु, आयुध या गोलाबारूद संग्रह करेगा, या अन्यथा युद्ध करने की तैयारी करेगा, वह 16[आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से अधिक की नहीं होगी, दंडित किया जाएगा 17[और जुर्माने से भी दंडनीय होगा]

123. युद्ध करने की परिकल्पना को सुकर बनाने के आशय से छिपाना--जो कोई 9[भारत सरकार] के विरुद्ध युद्ध करने की परिकल्पना के अस्तित्वों को किसी कार्य द्वारा, या किसी अवैध लोप द्वारा, इस आशय से कि इस प्रकार छिपाने के द्वारा ऐसे युद्ध करने को सुकर बनाए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि इस प्रकार छिपाने के द्वारा ऐसे युद्ध करने को सुकर बनाएगा, छिपाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा ।

124. किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोधित करने के आशय से राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना--जो कोई भारत के 18[राष्ट्रपति] या किसी राज्य 19।।। 20।।। 21।।। के 22[राज्यपाल 23।।।] को ऐसे 1[राष्ट्रपति या 16[राज्यपाल 17।।।]] की विधिपूर्ण शक्तियों में से किसी शक्ति का किसी प्रकार प्रयोग करने के लिए या प्रयोग करने से विरत रहने के लिए उत्प्रेरित करने या विवश करने के आशय से,

1 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा क्वीनके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

2 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा (1-1-1956 से) आजीवन निर्वासनके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

3 1921 के अधिनियम सं0 16 की धारा 2 द्वारा और उसकी समस्त संपत्ति समपहृत कर लेगाके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

4 1957 के अधिनियम सं0 36 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा दृष्टांतके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

5 1957 के अधिनियम सं0 36 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा ()कोष्ठकों और अक्षर का लोप किया गया ।

6 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा दृष्टांत () का लोप किया गया ।

7 1870 के अधिनियम सं0 27 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।

8 विधि अनुकूलन आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं0 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ब्रिटिश भारतके स्थान पर संशोधित हो कर उपरोक्त रूप में आया ।

9 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा या क्वीन की प्रांतों या उनके किसी भाग की प्रभुता से वंचित करनाशब्दों का लोप किया गया ।

10 भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा भारत सरकार या किसी स्थानीय सरकारके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

11 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा प्रांतीयके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

12 विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा या बर्मा सरकारशब्दों का लोप किया गया ।

13 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा आजीवन या उससे किसी लघुतर अवधि के लिए निर्वासनके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

14 1921 के अधिनियम सं0 16 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।

15 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा क्वीनके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

16 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा आजीवन निर्वासनके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

17 1921 के अधिनियम सं0 16 की धारा 2 द्वारा और उसकी समस्त संपत्ति समपहृत कर ली जाएगीके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

18 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा गवर्नर जनरलके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

19 भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा या लेपिDटनेन्ट गवर्नरशब्दों का लोप किया गया ।

20 विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा या भारत के गवर्नर जनरल की परिद्् के किसी सदस्यशब्दों का लोप किया गया ।

21 भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा या किसी प्रेसिडेन्सी की परिद्् केशब्दों का लोप किया गया ।

22 1951 के अधिनियम सं0 3 द्वारा गवर्नरके स्थान पर प्रतिस्थापित ।

23 विधि अनुकूलन (सं0 2) आदेश, 1956 द्वारा या राजप्रमुखशब्दों का लोप किया गया ।

भारतीय दंड संहिता, 1860 24 ऐसे 18[राष्ट्रपति या 15[राज्यपाल 16।।।]] पर हमला करेगा या उसका सदो अवरोध करेगा, या सदो अवरोध करने का प्रयत्न करेगा या उसे आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करेगा या ऐसे आतंकित करने का प्रयत्न करेगा,

वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा ।

2[124. राजद्रोह--जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा 3।।। 4[भारत] 5।।। में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह 6[आजीवन कारावास] से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण 1--अप्रीतिपद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं ।

स्पष्टीकरण 2--घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उनको परिवर्तित कराने की दृष्टि से अननुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं ।

स्पष्टीकरण 3--घॄणा, अवमान या अप्रीति को प्रदीप्त किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना, सरकार की प्रशासनिक या अन्य व्रिEया के प्रति अनुमोदन प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियां इस धारा के अधीन अपराध गठित नहीं करती ।]

 

अध्याय 8

लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों के विय में

153. बल्वा कराने के आशय से स्वैरिता से प्रकोपन देना--जो कोई अवैध बात के करने द्वारा किसी व्यक्ति को परिद्वे से या स्वैरिता से प्रकोपित इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा कि ऐसे प्रकोपन के परिणामस्वरूप बल्वे का अपराध किया जाएगा ; यदि बल्वा किया जाए--यदि ऐसे प्रकोपन के परिणामस्वरूप बल्वे का अपराध किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, और यदि बल्वा न किया जाए--यदि बल्वे का अपराध न किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

1[153. धर्म, मूलवंश, भा, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना--जो कोई--

() बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय या भाायी या प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच असौहार्द्र अथवा शत्रुता, घॄणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, भा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयत्न करेगा, अथवा

() कोई ऐसा कार्य करेगा, जो विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और जो लोकप्रशान्ति में विघ्न डालता है या जिससे उसमें विघ्न पड़ना सम्भाव्य हो, 2[अथवा]

2[() कोई ऐसा अभ्यास, आन्दोलन, कवायद या अन्य वैसा ही क्रियाकलाप इस आशय से संचालित करेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे या यह सम्भाव्य जानते हुए संचालित करेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे अथवा ऐसे

1 1969 के अधिनियम सं0 35 की धारा 2 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

2 1972 के अधिनियम सं0 31 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित । भारतीय दंड संहिता, 1860 29

क्रियाकलाप में इस आशय से भाग लेगा कि किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए भाग लेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे और ऐसे क्रियाकलाप से ऐसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्यों के बीच, चाहे किसी भी कारण से, भय या संत्रास या असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है या उत्पन्न होनी सम्भाव्य है,]

वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

(2) पूजा के स्थान आदि में किया गया अपराध--जो कोई उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, करेगा, वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।]

1[153. राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान--(1) जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा,--

() ऐसा कोई लांछन लगाएगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्ति इस कारण से कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा नहीं रख सकते या भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा नहीं बनाए रख सकते, अथवा

() यह प्राख्यान करेगा, परामर्श देगा, सलाह देगा, प्रचार करेगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्तियों को इस कारण कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, भारत के नागरिक के रूप में उनके अधिकार न दिए जाएं या उन्हें उनसे वंचित किया जाए, अथवा

() किसी वर्ग के व्यक्तियों की, बाध्यता के संबंध में इस कारण कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, कोई प्राख्यान करेगा, परामर्श देगा, अभिवाक्् करेगा या अपील करेगा अथवा प्रकाशित करेगा, और ऐसे प्राख्यान, परामर्श, अभिवाक्् या अपील से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के बीच असामंजस्य, अथवा शत्रुता या घॄणा या वैमनस्य की भावनाएं उत्पन्न होती हैं या उत्पन्न होनी संभाव्य हैं,

वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

(2) जो कोई उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कोई अपराध किसी उपासना स्थल में या धार्मिक उपासना अथवा धार्मिक कर्म करने में लगे हुए किसी जमाव में करेगा वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।]

506. आपराधिक अभित्रास के लिए दण्ड--जो कोई आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।

यदि धमकी मॄत्यु या घोर उपहति इत्यादि कारित करने की हो--तथा यदि धमकी मॄत्यु या घोर उपहति कारित करने की, या अग्नि द्वारा किसी सम्पत्ति का नाश कारित करने की या मॄत्यु दण्ड से या 9[आजीवन कारावास] से, या सात वर्ष की अवधि तक के कारावास से दण्डनीय अपराध कारित करने की, या किसी स्त्री पर असतित्व का लांछन लगाने की हो ; तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित जाएगा ।

9 1955 के अधिनियम सं0 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा (1-1-1956 से) निवार्सिनके स्थान पर प्रतिस्थापित । भारतीय दंड संहिता, 1860 97 

Comments