Gau Hatyara Gandhi

गौ हत्यारा गाँधी

२०वीं सदी का मीरजाफर पाकपिता राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी मुसलमानोंको इंडियामें रोकनेका अपराधी.

मैं पाठकों के सामने गांधी की दिल्ली डायरी – भाग ३ दिनांक २७ सितम्बर, १९४७ का अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ.

“इसके बाद गांधी ने एक आर्य समाजी दोस्त के खत का जिक्र किया, जिसमे कहा गया था कि कांग्रेस पहले ही तीन बड़ी बड़ी गलतियाँ कर चुकी है. अब वह सबसे बड़ी चौथी गलती कर रही है. यह गलती कांग्रेस की इस इच्छा में है कि हिंदुओं और सिक्खों के साथ मुसलमानों को भी देश में बसाया जाये. गांधी ने कहा, हालांकि मैं कांग्रेस की तरफ से नहीं बोल रहा हूँ, फिर भी खत में जिस गलती का जिक्र किया गया है, उसे करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ.”

“धमकियों से डर कर घर न छोड़ो

“मेरे पास बराबर इस बात की शिकायतें आ रही हैं कि यूनियन के मुसलमानों को अपने बाप दादों के मकान छोड़ने और पाकिस्तान जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. यह कहा जाता है कि उनको तरह-तरह की तरकीबों से अपने घर छुड़वा कर कैम्पों में रहने पर मजबूर जा रहा है, जहां से उन्हें रेल द्वारा अथवा पैदल भेज दिया जाय. मुझे विश्वास है कि मन्त्रिमन्डल की यह नीति नहीं है. ... इस जगह हम खास तौर पर यह जांच रहे हैं कि केन्द्रीय सरकार की हालत क्या है? उसे किसी हालत में भी कमजोर नहीं बनना चाहिए. इसलिए अगर इसमें कुछ भी सच्चाई है कि कर्मचारी पूरी तरह सरकारी हुक्म (या गांधी के षड्यंत्र) का पालन नहीं करते, तो ऐसे कर्मचारियों को तुरंत निकल जाना चाहिए या मिलिटरी या सम्बन्धित मंत्री को त्यागपत्र देकर ऐसी ताकत को जगह देनी चाहिए जो कामयाबी के साथ कर्मचारियों की नाफर्मबरदारी को दूर कर सके. (ताकि हत्यारे अल्लाह के अनुयायी मुसलमान इंडिया में ही रहें और आर्यों को समूल नष्ट करने में कामयाबी हासिल की जा सके.) जब कि मैं उन शिकायतों को, जो मेरे पास आती रहती हैं, संकोच के साथ आप को सुनाता हूँ. ...” गांधी की दिल्ली डायरी भाग ३, २७ अक्टूबर, १९४७.

इस्लाम ने मानव जाति को दो हिस्सों मोमिन और काफ़िर में बाँट रखा हैधरती को भी दो हिस्सों दार उल हर्ब और दार उल इस्लाम में बाँट रखा है| (कुरान ८:३९). काफ़िर को कत्ल करना व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलना मुसलमानों का जिहाद यानी काफिरों की हत्या करने का असीमित संवैधानिक मौलिक मजहबी अधिकार है| (भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१)). आगे दिए गए विवरण से स्पष्ट हो जायेगा कि २०वीं सदी का मीरजाफर पाकपिता - राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी ईसाईयों और मुसलमानों को इंडिया में रखने का अपराधी है.

गांधी का भयादोहन.

२०वीं सदी के मीरजाफर पाकपिता - राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी की कमजोरी औरत थी. आतंक की साया में जीता था. जैसा कि आज हो रहा है, संत और जज सहित सारे उपनिवेशवासी यौन शोषण के अपराध में जेल जाने से आतंकित हैं. आशाराम बापू और नित्यानंद की फर्जी सीडी की भांति तथाकथित मनु, आभा, नायडू ... सूची लम्बी है आदि के साथ ... ब्रह्मचर्य के प्रयोग में गांधी भी जेल चला जाता. जेल जाने से बचने के लिए गांधी वही करता था, जो अँगरेज़ चाहते थे.

सत्ता के हस्तानान्तरण की पहली शर्त ही इस्लाम का दोहन है. इंडिया में ईसाइयों की संख्या नगण्य ही रही| इसी कारण वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों से ईसाई स्वयं नहीं लड़ सकते| इसलिए ईसाई अपने ही शत्रु मुसलमानों व उनके इस्लाम का शोषण करके वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों को मिटा रहे हैं| हिंदू मरे या मुसलमान - अंततः ईसा का शत्रु मारा जा रहा है|

इस्लामी शासन काल में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध था. 

गौ हत्या के विरुद्ध दिए गए संविधान पीठ के २००५ के निर्णय से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में गौ हत्या ब्रिटिश शासन काल में, जिसके आप दास हैं, लैंसडाउन नामक अँगरेज़ से शुरू कराई. 

http://www.aryavrt.com/judgment-gohatya-2005

2 अक्तूबर 2014

वेद, गुरुकुल, गंगा और गो वैदिक सनातन धर्म की चार आधार शिलाएं हैं|

इंडियन उपनिवेश की मल्लिका एलिजाबेथ का षड्यंत्र स्पष्ट है. अमेरिकी माया संस्कृति की भांति वैदिक सनातन संस्कृति को नष्ट करना है. क्यों कि जहां अब्रह्मी संस्कृतियों के अनुयायियों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) द्वारा ईशनिंदा का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार दिया गया है, वहीँ एलिजाबेथ के दासों द्वारा गो हत्या विरोधियों को गोलियों से भूना गया, जेलों में बंद किया जा रहा है. संत गोपाल दास नमो राज्य में आज भी जेल में हैं. अन्यों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ को लागू कर, प्रताड़ित किया जा रहा है. 

फिर भी आप धरती की सभी नारियों के बलात्कारी जेहोवा और अल्लाह को अपराधी कहते ही जेल चले जायेंगे. विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/kautumbik-vyabhichar

ईसाई व मुसलमान गोमांस भक्षी और वैदिक सनातन संस्कृति के शत्रु हैं| गाँधी जीवन भर दोनों का संरक्षण करता रहा|

पाकपिता गाँधी का सत्य?

पाकपिता गाँधी जीवन भर झूठ बोलता रहा| पाकिस्तान उसकी लाश पर बनना था, लेकिन पाकिस्तान भी बनवाया और अनशन कर कश्मीर पर आक्रमण से प्रसन्न हो कर पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपये ईनाम भी दिलवाया|

पाकपिता गाँधी की अहिंसा?

३५ लाख हिन्दुओं को कत्ल करवाया| लगभग ४ करोड़ लोग अपनी मातृभूमि से विस्थापित हुए| नारियों को नंगा कर जुलूस निकाला गया और बलात्कारित की गईं| पाकपिता गाँधी के अहिंसा का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?

पाकपिता गाँधी का इस्लाम प्रेम?

पाकपिता गाँधी इस्लाम से इतना प्रेम करते थे कि मुसलमानों को पाकिस्तान भी दिलवाया और भारत भी! काफिरों का जीवन, नारियां, सम्पत्ति और धरती सभी कुछ मुस्लिम पर्सनल ला देकर मुसलमानों को सौंप दिया| मस्जिदों से अजान द्वारा काफिरों के इष्ट देवों का अपमान करने और काफिरों को कत्ल करने की शिक्षा देने का अधिकार भी दे डाला!

पाकपिता गाँधी का सद्भाव

गो हत्या का सद्भाव

http://vishwajeetsingh1008|blogspot|in/2011/04/blog-post_2050.html

15 अगस्त 1947 को इंडिया के सत्ता हस्तानान्तरण के बाद देश के कोने - कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गांधी जी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो गया हैं अतः गौहत्या को बन्द करा दो । तब पाकपिता गांधी ने कहा, "राजेन्द्र बाबू ने मुझको बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हजार पोस्ट कार्ड , 25 - 30 हजार पत्र और कई हजार तार आ गये हैं। हिन्दुस्तान में गौ - हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं , उनके साथ जबरदस्ती करना होगा| जो आदमी अपने आप गौकुशी नहीं रोकना चाहते , उनके साथ मैं कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें।


इसलिए मैं तो यह कहूँगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बन्द होना चाहिये इतना पैसा इन पर फैंक देना मुनासिब नहीं हैं । मैं तो अपनी मार्फत सारे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बन्द कर दें । भारतीय यूनियन कांग्रेस में मुसलमान , ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं । अतः मैं तो यही सलाह दूँगा कि विधान - परिषद् पर इसके लिये जोर न डाला जाये । ( पुस्तक - ' धर्मपालन ' भाग - दो , प्रकाशक - सस्ता साहित्य मंडल , नई दिल्ली , पृष्ठ - 135 )

गौहत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध को अनुचित बताते हुए इसी आशय के विचार गांधी जी ने प्रार्थना सभा में दिये -

" हिन्दुस्तान में गौ-हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा । " - ' प्रार्थना सभा ' ( 25 जुलाई 1947 )

हिन्दुस्तान ( 26 जुलाई 1947 ) , हरिजन एवं हरिजन सेवक ( 26 जुलाई 1947 )

अपनी 4 नवम्बर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने फिर कहा कि -

" भारत कोई हिन्दू धार्मिक राज्य नहीं हैं , इसलिए हिन्दुओं के धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता । मैं गौ सेवा में पूरा विश्वास रखता हूँ , परन्तु उसे कानून द्वारा बन्द नहीं किया जा सकता । "

( दिल्ली डायरी , पृष्ठ 134 से 140 तक )

इससे स्पष्ट हैं कि गांधी जी की गौरक्षा के प्रति कोई आस्था नहीं थी । वह केवल हिन्दुओं की भावनाओं का शौषण करने के लिए बनावटी तौर पर ही गौरक्षा की बात किया करते थे , इसलिए उपयुक्त समय आने पर देश की सनातन आस्थाओं के साथ विश्वासघात कर गये ।

7 नवम्बर 1966 को गोपाष्टमी के दिन गौरक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं ने संयुक्त रूप से संसद भवन के सामने एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया जिसमें तत्कालीन सरकार से गौहत्या बन्दी का कानून बनाने की मांग की गई । इस प्रदर्शन में भारत के प्रत्येक राज्य से करीब 10 - 12 लाख गौभक्त नर - नारी , साधु - संत और छोटे - छोटे बालक - बालिकाएं भी गौमाता की हत्या बन्द कराने इस धर्मयुद्ध में आये थे ।

उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर थी और गुलजारिलाल नन्दा गृहमंत्री थे । श्री नन्दा जी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परामर्श दिया कि इतनी बडी संख्या में देशभर के सर्व विचारों के जनता की मांग गौहत्या बन्दी का कानून स्वीकार करें । तब इंदिरा गांधी ने कठोरता से कहा " गौहत्या बन्दी का कानून बनाने से मुसलमान और ईसाई समाज कांग्रेस से नाराज हो जायेंगे । गौहत्या बन्दी का कानून नहीं बन सकता । " इंदिरा के न मानने पर गुलजारिलाल नन्दा ने अपने गृहमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और गौभक्त भारतीयों के इतिहास में अमर हो गये ।

उधर इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए निहत्थे अहिंसक गौभक्त प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिसमें अनेकों साधुओं व गौभक्तों की हत्याएँ हुई । इंदिरा गांधी ने यह नृशंश हत्याकाण्ड गौपाष्टमी के पर्व पर कराया था अतः विधि का विधान देखिये कि - इंदिरा गांधी की हत्या भी गौपाष्टमी को हुई थी , संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु भी अष्टमी को हुई , राजीव गांधी की हत्या भी अष्टमी को हुई , गौहत्या के महापाप से गांधी - नेहरू परिवार का नाश हो गया ।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के इतने दिन बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर गौहत्या बन्दी का कानून न बन पाना भारतीयों के लिए बडे ही दुःख और अपमान की बात हैं । हे परमात्मा , नेहरू के वंशजों और गांधी के अनुयायी इन राजनेताओं को सद्बुद्धि दो । भारत की प्राणाधार गौमाता की हत्या बन्दी का कानून सम्प्रदायवाद की भावना से उठकर शीघ्र बने यहीं प्रार्थना हैं ।

- विश्वजीतसिंह

एक नजर इधर भी...

१. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

२. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

३. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

४.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दु मारे गए व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

५.१९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

६.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

७.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

८. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि से विभूषित किया।

८. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (१९३१)ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

९. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

१०. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

११. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

१२. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

१३. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

१४. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी के आदेश पर उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

१५. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी। उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक युवक ने गान्धी का वध कर दिया। न्य़यालय में चले अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायाधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-"नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।" तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गान्धी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी?

२ अक्तूबर (गान्धी जयन्ती) पर यह विषय विशेष रूप से विचारणीय है, जिससे कि हम भारत के भविष्य का मार्ग निर्धारित कर सकें।

sabhaar........  डॉ. जय प्रकाश गुप्त, अम्बाला छावनी।

९३१५५१०४२५


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