ChunavAyog se Savdhan2

प्रेसिडेंट, प्रधानमंत्री और राज्यपाल सोनिया द्वारा मनोनीत मातहत व उपकरण है. लुटेरे संविधान का अनुच्छेद ३९(ग) व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार ही नहीं देता. भारतीय संविधान को कोई भ्रष्टाचारी नहीं मानता. 

जज व नागरिक दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं १९६ व १९७ के अधीन, सोनिया के मनोनीत, राज्यपालों द्वारा शासित हैं.

किसी गैर मुसलमान को जीने का अधिकार न मुसलमान देता है और न किसी उस व्यक्ति को जीने का अधिकार ईसाई  देता है, जो ईसा को अपना राजा नहीं मानता. फिर स्वतंत्रता’ कैसे मिली यह पूछते ही या तो आप ईश निंदा में कत्ल हो जायेंगे या भारतीय दंड संहिता की धारा १५३ अथवा २९५ में जेल में होंगे. जज तो राज्यपाल का बंधुआ मजदूर है. अपराधी वह है, जिसे सोनिया का मातहत राज्यपाल अपराधी माने.

भारतीय संविधान नागरिकों की सम्पत्ति को लूटने के लिए संकलित किया गया है.

सबको दास बनाना और स्वयं दास बनना ईसाइयत (बाइबल, उत्पत्ति २:१७) और इस्लाम (कुरान २:३५) के मूर्ख अनुयायियों की फितरत है. एकेश्वरवाद के अनुसंधान का यही कारण है. मूसा एकेश्वरवाद का जनक है. मसीह ईसा और मुहम्मद तो नकलची हैं. जेहोवा और अल्लाह से क्रमशः मूसा और मुहम्मद ही मिल सकते हैं. इस प्रकार धूर्त पैगम्बरों ने मानव मात्र को दास बनाने की अनूठी विधि ढूंढ रखी है. यहूदी मूसा का दास है और मुसलमान मुहम्मद का. जो दास नहीं बनता उसे पैगम्बर लूट और नारी बलात्कार का लोभ देकर कत्ल कराते हैं. इस प्रकार ईसाइयत और इस्लाम मानव मात्र को दास बनाने का अमोघ अस्त्र है, पैगम्बर तो रहे नहीं-उत्तराधिकार शासकों (सोनिया को) और पुरोहितों को सौँप गए हैं.

दासता को पुष्ट करने के लिए नागरिक के सम्पत्ति को छीना जाना आवश्यक है. अतएव संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन कर ईसाइयत और इस्लाम को अपने लूट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण की संस्कृति को बनाये रखने का मौलिक अधिकार दिया गया है. इसके अतिरिक्त राज्यपालों और प्रेसिडेंट को भारतीय संविधान के संरक्षण, संवर्धन व पोषण का अनुच्छेदों १५९ व ६० के अंतर्गत भार सौंपा गया है. लोकसेवकों को संरक्षण देने के लिए भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९७ बनाई गई है. जो भी लूट का विरोध करे उसे उत्पीड़ित करने की भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अंतर्गत व्यवस्था की गई है.

राज्य के स्थापना का उद्देश्य प्रजा के जान-माल की रक्षा करना है. इस अनुच्छेद के अधीन राज्य प्रजा को स्वयं लूटता है. भारतीय संविधान के उद्देशिका में समाजवादी शब्द ३-१-१९७७ को जोड़ा गया और १९९२ में बिना संशोधन के अपना टनों सोना बिकने के बाद मुद्रा का २३% अवमूल्यन करके देश बाजारी व्यवस्था पर उतर आया. फिर भी यह अनुच्छेद ज्यों का त्यों बना हुआ है. इस अनुच्छेद के अनुसार व्यक्ति की स्थिति किसान के पशु से अधिक नहीं है. जिसकी सम्पत्ति चाहती है, सोनिया लूट लेती है.

कार्ल मार्क्स ने सम्पत्ति का समाजीकरण किया था. वह भी विफल हो गया.

उपरोक्त कानूनों से मै स्वयं पिछले २४ वर्षों से पीड़ित हूँ. देखें नीचे उद्धृत लिंक पर:-

http://www.aryavrt.com/nl-petition-transfered

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