Azaan bnd kariye

||श्री गणेशायेनमः||

प्रेषकः अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी,  (सूचना सचिव) ,

मंगल आश्रम, मुनि की रेती, टिहरी गढ़वाल, ऋषिकेश, 249137, उखं

  फोनः 9868324025 - 7017886116

Email aryavrt39@gmail.com

पत्रांकः CMYOGI 18318y   दिनांक, 18.03.2018

विषय: भादंसं की धारा १२१, १५३ व २९५ के अंतर्गत अभियोग चलाने की दंप्रसं की धारा १९६ के अंतर्गत संस्तुति न देने के संबंध मे.

महामहिम राज्यपाल महोदय,

आप सर्वदा नियमानुसार कार्रवाई किए जाने का आदेश दिया करते हैं. लेकिन नियम की धज्जियाँ उड़ाते हैं. मस्जिदों से मुसलमान ईशनिंदा करते हैं और काफिरोँ को कत्ल करने के खुत्बे देते हैं.

भारतीय दंड संहिता की धारा ९९ के अधीन मैं सरकारों से अपने प्राणरक्षा की सदैव मांग करता रहा हूँ. जिसके कारण मेरे विरुद्ध अबतक ५० अभियोग चले, ३ आज भी लम्बित हैं.

मोहम्मद पर टिप्पणी करने के कारण कमलेश तिवारी पर रासुका लगा है. कानूनविद राज्यपाल केसरी के मालदा में उनको फांसी देने की मांग को लेकर हुए उपद्रव और आगजनी में २.५ लाख से अधिक सहिष्णु और सर्व धर्म समभाव वादी मुसलमान शामिल हुए. थाना फूंका गया. पुलिस की पिटाई हुई. ईमामों ने कमलेश तिवारी का सर कलम कर लाने वाले को अब तक ४१ करोड़ रु० से अधिक राशि देने के फतवे जारी किये. किसी मुसलमान पर रासुका या मकोका क्यों नहीं लगा?

भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ का संकलन इसलिए किया गया है कि ज्यों ही किसी उपनिवेशवासी का स्वाभिमान जग जाए और वह विरोध कर बैठे, जैसा कि मैं १९९१ से करता आ रहा हूँ, जेल में सन १९९९ से बंद दारा सिंह ने, २००८ से बंद मेरे ९ मालेगांव बम कांड के सहयोगियों और अब कमलेश तिवारी ने किया है, त्यों ही उसको कुचल दिया जाये - ताकि लोग भयवश आतताई अब्रह्मी संस्कृतियों का विरोध न कर सकें और वैदिक सनातन संस्कृति को सहजता से समाप्त कर दिया जाये. यही कारण है कि किसी वाइसराय, राष्ट्रपति या राज्यपाल अथवा जिलाधीश ने, ई०स० १८६० से आज तक कभी भी किसी ईमाम पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अभियोग चलवाने का साहस नहीं किया जब कि यह अपमान स्वयं तब के वाइसराय, जो अब राष्ट्रपति कहे जाते हैं, राज्यपाल और जिलाधीश का भी होता रहा है.

आप मुसलमानों के विरुद्ध अभियोग क्यों नहीं चलाते?

एलिजाबेथ के स्वतंत्र उपनिवेश का विरोध भादंसं की धारा १२१ के अंतर्गत मृत्युदंड का अपराध है और इसका नियंत्रण दंप्रसं की धारा १९६ के अंतर्गत एलिजाबेथ के प्रतिनिधि राज्यपालों यानी आप के पास है. मैं स्वतंत्र उपनिवेश का विरोधी हूँ. आप मुझे नियमानुसार अभियुक्त बनाने की संस्तुति क्यों नहीं दे रहे हैं?

मोहम्मद पर टिप्पणी करने के कारण कमलेश तिवारी पर रासुका लगा है. अज़ान लगाने वालों पर रासुका कब लगेगा?

मस्जिदों में विष्फोट अपराध कैसे है?

स्वतंत्र उपनिवेश सरकार ने आर्यावर्त सरकार के मुख्यालय के पश्चिमी गली पर भूमाफिया का कब्जा करा रखा है. सभी गलियों और राजमार्ग पर अतिक्रमण करा रखा है। बलिवैश्वदेव ही मेरी जीविका का साधन है। अब मुझे मंगल आश्रम से भी निकालने के लिए रणनीति तैयार कर ली गई है। मेरा पानी बंद कर दिया गया है.

हर हाल में एलिजाबेथ को, आप के संरक्षण में, अपना उपनिवेश बचाना है। मैं ही नहीं, ईसाई व मुसलमान सहित हर वह व्यक्ति नष्ट होगा, जो ईसा का दास नहीं है।

मैं संस्कृतियों का युद्ध लड़ रहा हूँ। उपनिवेश मिटा कर ही सनातन धर्म बचाया जा सकता है। लेकिन लोगों को पता ही नहीं कि वे एलिजाबेथ के दास हैं।

आप नियमानुसार दंप्रसं की धारा१९६ के अंतर्गत संस्तुति देकर भादंसं की धारा १२१ के अंतर्गत मेरे विरुद्ध अभियोग चलवाइए। शेष ईश्वर पर छौड़िएः

क्या आप के पास साहस है?

इंडिया एलिजाबेथ का स्वतंत्र उपनिवेश है इस तथ्य को छिपाए रखने हेतु सन १९४७ से ही हत्याएँ और लूट जारी हैं सन २०१० मे राजीव दीक्षित के बाद आप मेरी हत्या कराने के लिए विवश हैं.

साहस हो तो नियमानुसार किसी ईमाम पर अभियोग चला कर दिखाएं.

क्या बताएंगे कि किस अधिकार से और किस नियम के अनुसार सत्ता के हस्तांतरण के संधि के पूर्व ही उपनिवेशवासियों के पूर्वजों के ९० वर्ष के बलिदानों के बदले मे १८ जुलाई, १९४७ को आक्रांता जारज षष्टम् ने शब्द उपनिवेश  (Dominion) के पूर्व शब्द स्वतंत्र (independent) जोड़ कर भारतीय (स्वतंत्र) उपनिवेश अधिनियम १९४७ बनाया?

उपनिवेश (कालोनी) किसी राज्य के बाहर की उस दूरस्थ बस्ती को कहते हैं, जहाँ उस राज्य की प्रजा निवास करती है

आप से फिर आग्रह करता हूँ कि उपनिवेशवासियों को स्वतंत्र उपनिवेश का अर्थ बताएं.

सन १७५७ के प्लासी युद्ध में मीरजाफर ने मात्र एक बार १८००० सैनिकों से हथियार डलवाया था, गांधी ने आप, ईसाइयों और मुसलमानों सहित इंडिया और पाकिस्तान के सभी निवासियों का १९४७ से आज तक आत्मसमर्पण करा रखा है इतना ही नहीं स्वतंत्र उपनिवेश का विरोध भादंसं की धारा १२१ के अंतर्गत मृत्युदंड का अपराध है.

आप स्वयं बताएँ कि बड़ा महात्मा, सत्यवादी, अहिंसा का पुजारी और ब्रह्मचारी मीरजाफर था या गांधी?

संविधान के अनुच्छेद ३९ग से प्राप्त अधिकार से आप ने राजस्व अभिलेखों मे हेराफेरी कराकर मेरी सारी संपत्ति

जनसुनवाई 40018817010024 और जनसुनवाई सं० 40018817015237 व हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल का स्मारक लूट लिया. जनसुनवाई 40018817010025.

१८ वर्षों से पेंशन नहीं दे रहे हैं. जनसुनवाई:40018818005089.

अब आप ने अपना पैंतरा बदल लिया है. मेरे पैतृक गांव मुजहना तप्पा पड़खोरी परगना हवेली तहसील कप्तानगंज जिला कुशीनगर उत्तर प्रदेश में मेरे पास खेती की भूमि है गांव की कृषि भूमि और पैत्रिक निवास के बीच रेलवे का फाटक है इसे रेलवे से मिल कर आप ने बंद करवा दिया है. मैं ही नहीं कई गांव के लोग मेरे उपनिवेश विरोधी होने का दंड भुगत रहे हैं.

कृपा करके मेरे अपराध का दंड गरीब और असहाय जनता को मत दीजिये. अपराध का दंड मुझे दीजिये.

मैं आप से अपने विरुद्ध अभियोग चलवाने की मांग कर चुका हूँ.

राजीव दीक्षित की भाँति मुझे गुमनामी मे न मारिए. अपनी संस्कृति और भावी पीढ़ी को बचा लीजिए.

सच्चाई कुछ और है! जिसे मीडिया छिपा रही है|

क्या महामहिम प्रणब दा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ मस्जिद और अज़ान के विरुद्ध लागू करेंगे?

देश की सत्ता से शिखर पर कैथोलिक ईसाई एलिज़ाबेथ भी है और मुसलमान हामिद भी! दोनों के भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) से पोषित और प्रोत्साहित हठधर्मी सिद्धांत हैं, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूं, यहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबल, लूका १९:२७) और "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना)  बाकी रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये|" (कुरान, सूरह  अल अनफाल :३९). वैदिक सनातन धर्म मिटाना दोनों का घोषित कार्यक्रम है|

राज्यपालों ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन अनुमति देकर भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ २९५ के अधीन मेरे विरुद्ध अब तक ५० अभियोग चलवाए हैं| आइये देखते हैं कि क्या कहती हैं धाराएँ?

1[153. धर्म, मूलवंश, भाषा, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना--जो कोई--

() बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय या भाषायी या प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच असौहार्द्र अथवा शत्रुता, घॄणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयत्न करेगा, अथवा

() कोई ऐसा कार्य करेगा, जो विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और जो लोकप्रशान्ति में विघ्न डालता है या जिससे उसमें विघ्न पड़ना सम्भाव्य हो, 2[अथवा]

2[() कोई ऐसा अभ्यास, आन्दोलन, कवायद या अन्य वैसा ही क्रियाकलाप इस आशय से संचालित करेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे या यह सम्भाव्य जानते हुए संचालित करेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे अथवा ऐसे

1 1969 के अधिनियम सं0 35 की धारा 2 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित

2 1972 के अधिनियम सं0 31 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित । भारतीय दंड संहिता, 1860 29

क्रियाकलाप में इस आशय से भाग लेगा कि किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए भाग लेगा कि ऐसे क्रियाकलाप में भाग लेने वाले व्यक्ति किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किए जाएंगे और ऐसे क्रियाकलाप से ऐसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्यों के बीच, चाहे किसी भी कारण से, भय या संत्रास या असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है या उत्पन्न होनी सम्भाव्य है,]

वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

(2) पूजा के स्थान आदि में किया गया अपराध--जो कोई उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, करेगा, वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।]

1[153. राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान--(1) जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा,--

() ऐसा कोई लांछन लगाएगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्ति इस कारण से कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा नहीं रख सकते या भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा नहीं बनाए रख सकते, अथवा

() यह प्राख्यान करेगा, परामर्श देगा, सलाह देगा, प्रचार करेगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्तियों को इस कारण कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, भारत के नागरिक के रूप में उनके अधिकार न दिए जाएं या उन्हें उनसे वंचित किया जाए, अथवा

() किसी वर्ग के व्यक्तियों की, बाध्यता के संबंध में इस कारण कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, कोई प्राख्यान करेगा, परामर्श देगा, अभिवाक्् करेगा या अपील करेगा अथवा प्रकाशित करेगा, और ऐसे प्राख्यान, परामर्श, अभिवाक्् या अपील से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के बीच असामंजस्य, अथवा शत्रुता या घॄणा या वैमनस्य की भावनाएं उत्पन्न होती हैं या उत्पन्न होनी संभाव्य हैं,

वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

(2) जो कोई उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कोई अपराध किसी उपासना स्थल में या धार्मिक उपासना अथवा धार्मिक कर्म करने में लगे हुए किसी जमाव में करेगा वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।]

5[295. विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हों--जो कोई 6[भारत के नागरिकों के] किसी वर्ग की धार्मिक भावनओं को आहत

3 1925 के अधिनियम सं0 8 की धारा 2 द्वारा मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित

4 1895 के अधिनियम सं0 3 की धारा द्वारा मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित

1 1870 के अधिनियम सं0 27 की धारा 10 द्वारा अंतःस्थापित

2 भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारासरकार द्वारा अप्राधिकॄतके स्थान पर प्रतिस्थापित

3 1951 के अधिनियम सं0 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वाराकेन्दीय सरकार या भाग राज्य या भाग ख् राज्य की सरकार द्वारा चालू की गई लाटरीके स्थान पर प्रतिस्थापित

4 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वाराप्रादेशिकके स्थान पर प्रतिस्थापित

5 1927 के अधिनियम सं0 25 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित भारतीय दंड संहिता, 1860 56

करने के विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान 7[उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा] करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 8[तीन वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा ]

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६

धारा १९६- राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसे अपराध करने के लिए आपराधिक षडयंत्र के लिए अभियोजन – () कोई न्यायालय, - 

भारतीय दंड संहिता (१८६० का ४५) के अध्याय के अधीन या धारा १५३(), धारा २९५() या धारा ५०५ की उपधारा () के अधीन दंडनीय किसी अपराध का; अथवा

ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षडयंत्र का; अथवा          

भारतीय दंड संहिता (१८६० का ४५) की धारा १०८() में यथावर्णित किसी दुष्प्रेरण का, संज्ञान केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से ही किया जायेगा, अन्यथा नहीं| ...|

उपरोक्त शर्त के अनुसार बिना राज्य या केंद्र सरकार की संस्तुति के काफिरों और सैतानों के विरुद्ध वल्बा करने अथवा उनके आस्था का अपमान करने वाले के विरुद्ध अभियोग सरकारें ही चला सकती हैं|

स्पष्टतः अंग्रेजों की कांग्रेस द्वारा संकलित भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ की असाधारण सामरिक योजना ने वैदिक सनातन संस्कृति के समूल नाश में अभूतपूर्व बड़ी सफलता प्राप्त की है| जहाँ भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) ईसाइत और इस्लाम के सभी मिशन और जिहाद को, वैदिक सनातन संस्कृति के विरुद्ध आक्रमण को संरक्षणपोषण व संवर्धन देता है, वहीं राष्ट्रपति और राज्यपाल की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेदों ६० व १५९ के अधीन भारतीय संविधान और कानूनों के संरक्षणपोषण व संवर्धन के शपथ लेने के बाद होती है| राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं है| या तो अपने ही सर्वनाश की शपथ लें, अन्यथा पद न लें| दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६, जिसका नियंत्रण राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास सुरक्षित है, वैदिक सनातन संस्कृति के रक्षार्थ किये गये किसी भी विरोध को बड़ी चतुराई से निष्क्रिय कर देती है| ईसाई और मुसलमान को तो उनके मजहब ही वीर्यहीन कर शासक के वश में कर चुके हैं, हम वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों को शासक एन केन प्रकारेण वीर्यहीन कर वश में कर रहे हैं|

कौन है एलिज़ाबेथ?

एलिज़ाबेथ का ईसा कहता है, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूंयहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|" (बाइबललूका १९:२७)

ईसा ने दस करोड से अधिक अमेरिका के लाल भारतीयों और उनकी माया संस्कृति को निगल लिया और अब विश्व के सभी धर्मों को नष्ट कर केवल अपनी पूजा कराएगा!

http://en.wikipedia.org/wiki/Armageddon

इसके अतिरिक्त देश की छाती पर सवार जेसुइट एलिज़ाबेथ ने निम्नलिखित शपथ ली हुई है:-

मै यह भी प्रतिज्ञा करती हूँ कि जब भी अवसर आएगा, मै खुले रूप में पंथद्रोहियों से, फिर वे प्रोटेस्टैंट हों या उदारवादी, पोप के आदेश के अनुसार, युद्ध करूंगी और विश्व से उनका सफाया करूंगी और इस मामले में मै उनकी आयु का विचार करूंगी, लिंग का, परिस्थिति का| मै उन्हें फांसी पर लटकाऊंगी, उन्हें बर्बाद करूंगी, उबालूंगी, तलूंगी और (उनका) गला घोटूंगी| इन दुष्ट पंथ द्रोहियों को जिन्दा गाडून्गी| उनकी स्त्रियों के पेट और गर्भाशय चीर कर उनके बच्चों के सिर दीवार पर टकराऊँगी, जिससे इन अभिशप्त लोगों की जाति का समूलोच्छेद हो जाये| और जब खुले रूप से ऐसा करना सम्भव हो तो मै गुप्त रूप से विष के प्याले, गला घोटने की रस्सी, कटार या सीसे की गोलियों का प्रयोग कर इन लोगों को नष्ट करूंगी| ऐसा करते समय मै सम्बन्धित व्यक्ति या व्यक्तियों के पद, प्रतिष्ठा, अधिकार या निजी या सार्वजनिक स्थिति का कोई विचार नहीं करूंगी| पोप, उसके एजेंट या जीसस में विश्वास करने वाली बिरादरी के किसी वरिष्ठ का जब भी, जैसा भी निर्देश होगा, उसका मै पालन करूंगी|”

http://www|reformation|org/jesuit_oath_in_action|html

सोनिया, उसके बेटा, बेटी और दामाद सभी कैथोलिक ईसाई हैं| इंडिया के उन नागरिकों, जिन्होंने वोट देकर एलिज़ाबेथ व राहुल को संसद में भेजा है, को एलिज़ाबेथ और राहुल इंडिया के मुसलमानों सहित अपने मतदाताओं के आँखों के सामने मतदाताओं के घर लूट कर, उनके बच्चों को पटक कर मरवा कर और उनकी नारियों का बलात्कार करा कर धन्यवाद देंगे| (बाइबल, याशयाह १३:१६)

इंडिया के उपराष्ट्रपति हामिद का अल्लाह कहता है, "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना)  बाकी न रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये|" (कुरानसूरह  अल अनफाल ८:३९). (कुरान, बनी इस्राएल १७:८१ व कुरानसूरह अल-अम्बिया २१:५८). 

३:१९ दीन तो अल्लाह की दृष्टि में केवल इस्लाम ही है| ... (कुरान ३:१९)

३:८५ जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) तलब करेगा वह स्वीकार नहीं किया जायेगा| ... (कुरान ३:८५)

मस्जिदों से ईमाम और मौलवी मुसलमानों को शिक्षा देते हैं कि गैर-मुसलमानों को कत्ल कर दो| इतना ही नहींमस्जिद से इस्लामी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए पाकिस्तानी मौलिक धर्मतंत्री सैयद अबुल आला मौदूदी घोषित करता है कि इस्लाम विश्व की पूरी धरती चाहता है उसका कोई भूभाग नहीं, बल्कि पूरा ग्रह इसलिए नहीं कि ग्रह पर इस्लाम की सार्वभौमिकता के लिए तमाम देशों को आक्रमण कर छीन लिया जाये बल्कि इसलिए कि मानव जाति को इस्लाम से, जो कि मानव मात्र के सुख-समृद्धि(?) का कार्यक्रम है, लाभ हो|

मौदूदी जोर दे कर कहता है कि यद्यपि गैर-मुसलमान झूठे मानव निर्मित मजहबों को मानने के लिए स्वतन्त्र हैं, तथापि उनके पास अल्लाह के  धरती के किसी भाग पर अपनी मनुष्य निर्मित गलत धारणा की हुकूमत चलाने का कोई अधिकार नहीं| यदि वे (काफ़िर) ऐसा करते हैं, तो मुसलमानों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे काफिरों की राजनैतिक शक्ति छीन लें और उनको (काफिरों को) इस्लामी तौर तरीके से जीने के लिए विवश करें|

राज्यपाल सहित कोई भी नागरिक खूनी, लुटेरे और बलात्कारी अल्लाह के विरुद्ध शिकायत भी नहीं कर सकता| यहाँ तक कि जज, पुलिस, सांसद और विधायक भी शिकायत नहीं कर सकते| दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन विवश राज्यपाल मस्जिदों से अज़ान और अल्लाह के कुरान के अनुसार मुसलमानों को काफिरों को कत्ल करने की शिक्षा देने वाले ईमाम के विरुद्ध भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अंतर्गत सन १८६० से आज तक कार्यवाही नहीं कर सके| लेकिन जो भी चर्च, मस्जिद, अज़ान, नमाज़ का विरोध करता है, उसे भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अंतर्गत दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन राज्यपाल या राष्ट्रपति की संस्तुति पर प्रताड़ित और जजों द्वारा तबाह कर दिया जाता है| मस्जिद, अज़ान, कुरान और नमाज़ का विरोध करने के कारण मैं स्वयं ४२ बार हवालात काट चुका हूँ| इस्लाम की अधिक जानकारी के लिए नीचे की लिंक देखें,

http://www.aryavrt.com/fatwa

प्रार्थना

तत्काल कार्रवाई कर मुझ को न्यायालय में पेश करें ताकि जज अविलंब डाक्टर से मेरा मानसिक परीक्षण करा सके

भवदीय

अप्रति

१८.०३.२०१५

 

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