Article 29 19131

भासं का अनुच्छेद २९(१).


लल्लनटाप ने भासं के सहारे इंडिया के स्वतंत्र होने के समर्थन में पाठकों को समझाने का प्रयत्न किया है कि देश उपनिवेश नहीं है. अतः नीचे मैं मात्र भासं के अनुच्छेद २९(१) की चर्चा कर रहा हूँ.
आज के दिन सन १९५० को ब्रिटिश सरकार ने हम पर भासं थोपा.भासं मे विधायक व सांसद आस्था व निष्ठा की, राष्ट्रपति व राज्यपाल संरक्षण, पोषण व संवर्धन की और जज बनाए रखने की शपथ लेते हैं. उपनिवेश का विरोध भादंसं की धारा १२१ के अंतर्गत फांसी का अपराध पहले से ही था. ईसाइयों व मुसलमानों के विरुद्ध दंप्रसं की धारा १९६ के अंतर्गत अभियोग चलाने का नियंत्रण अनुच्छेद ६० व १५९ के अंतर्गत मात्र राष्ट्रपति या राज्यपाल को दिया. भासं का अनुच्छेद २९(१) ईसाइयों और मुसलमानों को अपनी लूट, बलात्कार, धर्मांतरण और हत्या की संस्कृति को बनाए रखने का मौलिक अधिकार देता है. अन्य कोई यहाँ तक की जज भी शिकायत भी नहीं कर सकते. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). चुनाव द्वारा भी इनमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं| फलस्वरूप हम सनातनी अजान से भादंसं की धारा ९९ के अंतर्गत अपने धर्म के रक्षा की मांग करने पर दंप्रसं की धारा १९६ की संस्तुति पर रासुका मे जेल जा रहे हैं. नीचे की लिंक पढ़ें,
http://www.aryavrt.com/judgment-on-azaan-eng
लेकिन १८६० से आजतक अजान व खुतबे के प्रसारक भादंसं की धारा १५३ व २९५ के अपराधी जेल नहीं गए. क्योंकि सनातनियों को कत्ल करना भासं के अनुच्छेद २९(१) के अंतर्गत दोनों का संवैधानिक अधिकार है. हम सनातनी बहुसंख्यक नहीं होते. कत्ल होते हैं. अतः हम सनातनी खूनी और परभक्षी संविधान का बहिष्कार करते हैं. इसका अधिकार मुझे भादंसं की धारा १०२ से प्राप्त है.
मेरे गुरु जी ने समस्या का निम्नलिखित निराकरण किया. मैं इसे लल्लनटाप के विद्वान पाठकों से साझा कर रहा हूँ. गुरु जी के विचार आप लोगों को अच्छे लगें तो अपनाइएगा. अन्यथा मुझे फांसी अवश्य दिलवाइएगा.
सनातन धर्म नष्ट करने का संवैधानिक अधिकार
कोर्ट ने कहा कि साध्वी प्रज्ञा सिंह इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि धमाकों के लिए इस्तेमाल बाइक से उनका संबन्ध है। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान के मुताबिक भोपाल में हुई मीटिंग में साध्वी मौजूद थीं। उस मीटिंग में औरंगाबाद और मालेगांव में बढ़ रही जिहादी गतिविधियों और उन्हें रोकने पर चर्चा हुई। यहाँ तक कि मीटिंग में मौजूद सभी लोगों ने देश में तत्कालीन सरकार को गिराकर अपनी स्वतन्त्र सरकार बनाने की बात भी की थी।” मैं जिहाद विरोधी हूँ और मैंने आर्यावर्त सरकार का गठन किया है. अतः मुझे मृत्यु पर्यंत फांसी पर लटकाया जाना न्याय हित में है.
भासं का अनुच्छेद २९(१) ईसाइयों व मुसलमानों को अपनी संस्कृति को बनाए रखने का मौलिक अधिकार देता है और मौलिक अधिकार में सर्वोच्च न्यायालय सहित किसी को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है. यह केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं स्वीकार भी किया है. अपनी लूट, बलात्कार. धर्मांतरण और हत्या के संस्कृति को बनाए रखने का मौलिक अधिकार यानी जो ईसा को राजा न माने उसका घात करने का और अजान व खुतबे के प्रसारण का अधिकार ईसाई और मुसलमान को भासं के अनुच्छेद २९(१) से प्राप्त है.
गुरु जी का कहना है कि यही कारण है कि १९४७ से लेकर आज तक कोई उपनिवेश का विरोध न कर सका और न १८६० से आज तक अजान बंद हो सकी. जब कि अजान से अपनी रक्षा की मांग करने के कारण मुझ पर ५० अभियोग चले. ३ आज भी लंबित हैं.
भासं मे सनातन धर्म को बनाए रखने का अधिकार हो तो मुझे सूचित करें. मैं आभारी रहूंगा. मेरा आरोप है कि भासं सनातन धर्म को नष्ट करने के लिए संकलित किया गया है.
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि भासं का अनुच्छेद २९(१) ईसाइयों और मुसलमानों को सनातनियों के हत्या का मौलिक अधिकार देता है. क्योंकि सनातनी जारज (जिसके बाप का पता न हो) ईसा को राजा स्वीकार नहीं करते और लुटेरे, बलात्कारी, धर्मांतरक और हत्यारे अल्लाह की पूजा नहीं करते. भादंसं की धारा १०२ हम सनातनियों को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार देती है. शर्त भादंसं के ९९ की है. नमो का यह कानूनी उत्तरदायित्व है कि वे अजान और खुतबे बंद कराएं, ताकि हमें धारा १०२ का प्रयोग न करना पड़े.
अप्रति
या३०.१.१९
http://www.aryavrt.com/article-29-19131

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