35 A


केवल संविधान के अनुच्छेद ३५ए पर हंगामा क्यों?
२०वीं सदी के मीरजाफर, सदाबहार झूठे, पाकपिता - राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी ने कोई आजादी नहीं दिलाई. हमारे पूर्वजों के ९० वर्षों के बलिदानों की परिणति है, उपनिवेश के पूर्व शब्द ‘स्वतंत्र’ का जोड़ा जाना.  चुनाव द्वारा स्थितियों में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं| आज़ादी धोखा है. क्योंकि
स्वतंत्र उपनिवेश नहीं हो सकता. क्योंकि स्वतंत्र का अर्थ स्वयं का (मेरा अपना) तंत्र है और उपनिवेश स्वतंत्र नहीं हो सकता क्योंकि उपनिवेश का अर्थ ही किसी और की बस्ती है. तो स्वतंत्र उपनिवेश कोई शब्द ही नहीं है, धोखा है।
इंडिया आज भी ब्रिटिश कानूनों से शासित उपनिवेश और ब्रिटिश राष्ट्र कुल का भाग है.
२०१४ मे ३५ए का मामला जजों ने संज्ञान में लिया. स्वतंत्र उपनिवेश तो १८ जुलाई, १९४७ को ब्रिटिश संसद में बना. जजों ने संज्ञान में क्यों नहीं लिया?
उपनिवेश का विरोध फांसी योग्य अपराध है. (भादंसं १२१) मेरे बारम्बार आग्रह के बाद भी मुझे फांसी क्यों नहीं देते. जेल मे जहर क्यों दिया?
संविधान के अनुच्छेद २५ को ध्यान से पढ़िए जो केवल सनातनियों का धर्मांतरण कराता है. ईसाई व मुसलमान धर्मांतरण करे तो मृत्यु दंड है.
http://www.aryavrt.com/dharmantarana-dhokha-hai
संविधान के अनुच्छेद २९(१) को ध्यान से पढ़िए. ईसाइयत और इस्लाम क्रमशः विश्व की सबसे बड़ी और दूसरी बड़ी संख्या हैं. फिर अल्पसंख्यक कैसे? इंडिया के ८ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गया. सरकार ने घोषणा क्यों नहीं की?
इससे भी खतरनाक स्थिति यह है कि संविधान का अनुच्छेद २९(१) ईसाई और मुसलमान दोनों को अपने लूट, बलात्कार और हत्या की संस्कृति को बनाए रखने का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार देता है.
यानी संविधान का संकलन ही सनातन धर्म को नष्ट करने के लिए हुआ है।
अपने निम्नलिखित पत्र द्वारा सरकार ने स्थिति स्पष्ट कर दी है. ईसाई व मुसलमान सनातनियों को लूटेंगे, नारियों का बलात्कार करेंगे और कत्ल करेंगे और सनातनी संविधान की पवित्रता बनाए रखेंगे.
http://www.aryavrt.com/azaan-uoi
यानी सनातनी के जीवित बचने का कोई मार्ग नहीं.
इंडिया दैट वाज़ भारत, एलिजाबेथ का उपनिवेश है। आप लोगों सहित मैं भी उसी डायन का बलिपशु हूँ, जिसके जारज (जारज उसे कहते हैं, जिसके बाप का पता नहीं होता, यानी जो वैश्या की संतान होता है) ईसा के बाइबिल लूका नियम १९:२७ का हठधर्म है, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूं, यहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो|"
‌व
‌बाइबिल, यूहन्ना ६:५३ के अनुसार यीशु ने उन से (ईसाइयों से) कहा "`मैं तुम से सच सच कहता हूं जब तक मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ, और उसका लोहू न पीओ, तुम में जीवन नहीं।"
और
पंथनिरपेक्ष, सहिष्णु और साम्प्रदायिक सद्भाववादी इस्लाम के कुरान ने मानव जाति को दो हिस्सों मोमिन और काफ़िर में बाँट रखा है. धरती को भी दो हिस्सों दार उल हर्ब और दार उल इस्लाम में बाँट रखा है. (कुरान ८:३९) काफ़िर को कत्ल करना व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलना मुसलमान का मजहबी और संवैधानिक अधिकार है. अनुच्छेद २९(१). काफ़िर को कत्ल करने व दार उल हर्ब धरती को दार उल इस्लाम में बदलने के लिए मुसलमान को, भारतीय संविधान के अनुच्छेदों ६०, १५९ व २९(१) के अधीन, राष्ट्रपति, राज्यपाल व जज, असीमित मौलिक मजहबी अधिकार स्वीकार करने के लिए विवश हैं|
जज  बाइबिल और कुरान के हठधर्मी आदेशों के विरुद्ध सुनवाई नहीं कर सकते. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). चुनाव द्वारा भी इनमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं| मुसलमान काफिरों की हत्या करने से स्वर्ग पाएंगे|
राज्यपाल बपतिस्मा व अजान के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं करते? भादंसं की धारा ३७७ को अधिकारों की असमानता के आधार पर निरस्त करनेवाले जज अजान के विरुद्ध, दंप्रसं की धारा १९६ से प्राप्त संरक्षण के कारण, बोल भी नहीं सकते.
क्या आपको नहीं लगता कि आप स्वयं अपने सर्वनाश के लिए विवश कर दिए गए हैं?
मिजोरम के रियांगों की संपत्ति और नारियों पर सरकार ने ईसाईयों का कब्जा स्वीकार क्यों किया? कश्मीरियों का शोर बहुत है. रियांगों को तो कोई जानता भी नहीं.
पुलिस के संरक्षण में अजान यानी ईशनिन्दा सुनना व सुनवाना राज्यपाल की विवशता है. गोरक्षकों को आप ने जघन्य अपराधी घोषित कर दिया है. आप उपनिवेश शासन में गौहत्या कराने के लिए विवश हैं.
आशाराम को जेल, सहारा श्री सुब्रत राय को जेल, कर्णन को जेल आने वाले भविष्य का ट्रेलर है. या तो सनातन संस्कृति रहेगी अथवा ईसाइयत और इस्लाम.
प्राथमिकता तय कर लीजिए.
आप चाहें तो स्वयं को सुरक्षित कर के भी मेरी सहायता कर सकते हैं.
आप के पास कोई अधिकार नहीं है. सनातन धर्म की आधार शिलाएं गौ, गुरुकुल, गायत्री और गंगा नष्ट हो चुकी है.
इस्लाम और अजान काफिर को कत्ल करने के शिक्षा केंद्र हैं. भारतीय दंड संहिता की धारा १०२ उपनिवेश वासी को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार देती है. भारतीय दंड संहिता की धारा ९६ के अनुसार प्राइवेट प्रतिरक्षा के लिए किया गया कोई कार्य अपराध नहीं है. सन १८६० से आज तक इस कानून में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जब परिवर्तन नहीं हुआ तो फिर अपराध कहाँ हुआ?  जमानत किसलिए? क्यों बंद किया है हमारे अधिकारियों को? सीधे क्यों नहीं कहते कि एलिजाबेथ को वैदिक सनातन संस्कृति और उसके अनुयायियों को मिटाना है.
http://www.aryavrt.com/Home/aryavrt-in-news
  अमेरिकी रेड इंडियन और माया संस्कृति की भांति आप भी मिट जाएंगे. जो भी वैदिक संस्कृति और उसके अनुयायियों को बचा सकता है, उसका वध करा कर एलिजाबेथ उसका मांस खा रही और लहू पी रही है। जब तक उपनिवेश रहेगा, ऐसे नरसंहार होते रहेंगे।
मैं भादंसं की धारा १०२ से प्राप्त अधिकार से उपनिवेश के विरुद्ध लड़ने में सक्षम हूँ, यदि उपनिवेश वासी सहयोग करें तो.
कोई भी कानूनविद बताए कि बपतिस्मा व अजान का प्रसारण सर्वधर्म समभाव और सेकुलर कैसे है? विश्व की सबसे बड़ी आबादी ईसाई व दूसरी बड़ी आबादी मुसलमान अल्पसंख्यक कैसे हैं?
हम सनातनी बाइबल और कुरान के हठधर्मिता के बीच पिस रहे हैं. भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) दोनों बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक स्वीकार कर उनको अपनी हत्या और लूट की संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार दे चुका है.
माउन्टबेटन ने मानवमात्र से उन की अपनी ही धरती छीन कर ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया| मजहब के आधार पर पुनः दो भाग कर इंडिया और पाकिस्तान बना दिया| (भारतीय स्वतंत्रता (उपनिवेश) अधिनियम, १९४७). माउन्टबेटन को इससे भी संतुष्टि नहीं हुई| उसने मौत के फंदे व परभक्षी भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन करा कर, मानवमात्र को कत्ल होने के लिए, सदा सदा के लिए मानवमात्र की धरती छीन कर संयुक्त रूप से मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप दिया|
सनातनियों की रक्षा का राज्यपालों पर दंप्रसं की धाराओं १९६ व १९७ के अंतर्गत दायित्व है, लेकिन वे बाइबिल, कुरान, संविधान, बपतिस्मा, अजान और खुत्बे को संरक्षण देने के अपराधी हैं. १८६० से आज तक अजान देने वाला एक भी अभियुक्त नहीं बना.
ईसाइयत और इस्लाम अपने अपने हठधर्मिता के अनुसार मानवमात्र को जीने का अधिकार नहीं देते. भादंसं की धाराओं १०२ व १०५ के अधीन प्रत्येक काफ़िर, मुझे, साध्वी प्रज्ञा व उनके अन्य सह अभियुक्तों को मस्जिद और उसमे एकत्र जिहादियों को नष्ट करने का कानूनी अधिकार है. दोनों धाराएँ इंडियन उपनिवेश में सन १८६० से आज तक लागू हैं. इन धाराओं में, मस्जिद में विष्फोट की तिथि तक, कोई परिवर्तन हुआ हो, तो एलिजाबेथ और उसके जज बताएं. मैंने भादंसं की धारा ९९ के अंतर्गत सदा ही प्राइवेट प्रतिरक्षा की मांग की है, जिसे देने मे एलिजाबेथ सरकार सदा विफल रही है।
चुनाव द्वारा बाइबिल, कुरान और भारतीय संविधान में कोई परिवर्तन संभव नहीं है. जब तक इनका महिमामंडन होगा, सनातन धर्म मिटता रहेगा.
उपनिवेश वासियों को सन १९४७ मे अपहृत स्वतंत्रता युद्ध को लड़ना पड़ेगा, अन्यथा अमेरिकी रेड इंडियन और माया संस्कृति की भांति मिट जाएंगे.
अप्रति

Comments