15 Aug 2017txt

इंडिया स्वतंत्र नहीं, स्वतंत्र उपनिवेश है। उपनिवेश (कालोनी) किसी राज्य के बाहर की उस दूरस्थ बस्ती को कहते हैं, जहाँ उस राज्य की प्रजा निवास करती है।
‌इंडिया और पाकिस्तान दोनों ही स्वतंत्र उपनिवेश हैं। गांधी मानव द्रोही था। पाकिस्तान गांधी की लाश पर बनना था। पाकिस्तानी हिदुओं के नरसंहार, नारियों के बलात्कार और विस्थापन के गांधी व माउंटबेटन जघन्य अपराधी हैं।  उपनिवेशवासी गांधी के महिमामंडन के पापी हैं। 
मेरा सवाल है कि आक्रांता जार्ज को भारत को  इंडिया और पाकिस्तान में बांटने का अधिकार कहाँ है? उपनिवेश बनाने व राष्ट्रकुल (Commonwealth) के अधीन करने का अधिकार कैसे है? उपनिवेशवासी ब्रिटिश शासन काल के कानूनों से क्यों शासित हैं? उपनिवेशवासियों के नरसंहार, लूट, नारी बलात्कार के लिए ब्रिटेन को दंडित किया जाना लम्बित है।
राज्यपाल एलिजाबेथ के मनोनीत प्रतिनिधि होते हैं। भादंसं की धारा १२१ मे उपनिवेश विरोधी को फांसी, दंप्रसं की धारा १९६ मे केवल वे या राष्ट्रपति ही दिला सकते हैं। इसके लिये राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद १५९ के अधीन शपथ लिए बिना राज्यपाल नहीं बन सकते। 
महामहिम लोग सन १९४७ से आजतक उपनिवेश का विरोध नहीं कर सके. इनका मनोनयन, जो इनको उपनिवेश से मुक्त कराने का प्रयत्न करे, उसे भारतीय दंड संहिता की धारा १२१ के अधीन फांसी दिलाने के लिए किया गया है. क्या महामहिम अब भी उपनिवेश से मुक्ति ले सकते हैं?
३० जून, २०१७ तक भारतीय संविधान में १२२ संशोधन हो चुके हैं. इंडियन इंडिपेंडेंस ऐक्ट, १९४७ मे से डोमिनियन शब्द क्यों नहीं हटाया गया? २०वीं सदी के मीरजाफर सदाबहार झूठे, पाकपिता - राष्ट्रहंता बैरिस्टर मोहनदास करमचन्द गांधी ने कोई आजादी नहीं दिलाई. हमारे पूर्वजों के ९० वर्षों के बलिदानों की परिणति है, उपनिवेश के पूर्व शब्द ‘स्वतंत्र’ का जोड़ा जाना. इंडियन उपनिवेशवासियों के पूर्वजों के ९० वर्षों के स्वातन्त्रय युद्ध का गांधी ने देश के बैरिस्टरों से मिल कर अपहरण कर लिया.
अपने ही कानूनों को नहीं मानती एलिजाबेथ। 
यह कि भारत सोने की चिड़िया था. यहाँ सोना गिना नहीं, तौला जाता था. सन १९१७ तक एक ₹ =१३$ था. १९४७ में घट कर १$ हुआ. ८ नवम्बर २०१६ तक एक $ का मूल्य ₹ ६७ हुआ. नमो ने ८ नवम्बर, २०१७ को ₹ शून्य कर दिया।
यह कि इंडियन उपनिवेशवासी जिसे ₹ कहते हैं, वह ₹ देने का प्रतिज्ञा पत्र है. धारक का ₹ रिजर्वबैंक के पास रहता है, जिसे धारक को देने के लिए गवर्नर प्रतिज्ञा बद्ध है. इतना ही नहीं, केन्द्रीय सरकार द्वारा ₹ का प्रतिज्ञापत्र प्रत्याभूत भी है.रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की धारा ३३(२) के अनुसार १५ अक्टूबर, १९९० तक १ ₹ का मूल्य ०.११८४८९ ग्राम शुद्ध सोना था, १९९० के बाद से ₹ की कोई कीमत नहीं.
यह कि, यद्यपि  इस ठगी से विश्व का हर व्यक्ति  पीड़ित है, तथापि दिल्ली  उच्च न्यायालय  तक मेरी अपील निरस्त होती रही. अंत में कानून में १९९० के प्रभाव से संशोधन हो गया. संशोधन के फल स्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार नहीं की. एलिजाबेथ अपने ही वचन से मुकर गई. जब कि इस धोखाधड़ी से जज सहित हर उपनिवेश वासी भी पीड़ित था और आज भी है! क्या यही जज की स्वतंत्रता है? क्या महामहिम या कोई जज इस ठगी का विरोध कर सकता है?
यह कि सरकार जान माल की रक्षा के लिए है, जान लेने और लूटने के लिए नहीं|
यह कि संविधान के अनुच्छेद ३१ से प्राप्त सम्पत्ति के जिस मौलिक अधिकार को अँगरेज़ और संविधान सभा के लोग न छीन पाए, उसे भ्रष्ट सांसदों और जजों ने मिल कर ईसाई व मुसलमान सहित सभी उपनिवेशवासियों से प्रथम संविधान संशोधन द्वारा लूट लिया और अब तो इस अनुच्छेद को भारतीय संविधान से ही २०/०६/१९७९ से मिटा दिया गया है| (ए आई आर १९५१ एस सी ४५८).
यह कि उपज के छठे भाग से अधिक कर लेना लूट है। उत्पादक शेष सम्पत्ति का स्वामी है। लुटेरे संविधान का अनुच्छेद ३९(ग) उपनिवेशवासी को सम्पत्ति और उत्पादन का साधन रखने का अधिकार नहीं देता. यानी कि स्वयं काले धन की जड़ है.
यह कि राजा अपने राज्य और प्रिवीपर्स नहीं बचा सके. मेरे पितामह अपनी जमींदारी नहीं बचा सके. बैंकर अपने बैंक नहीं बचा सके. खानों के मालिक अपनी खानें नहीं बचा सके. मैं अपनी २ अरब की सम्पत्ति व हुतात्मा रामप्रसाद बिस्मिल का ४ अरब का स्मारक न बचा सका और न लोकसेवक होते हुए पेंशन ही प्राप्त कर सका. और तो और सहारा श्री सुब्रत राय लम्बे अरसे से जेल में हैं. वह भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) से प्राप्त संरक्षण, पोषण व संवर्धन में! आप अपना पूजास्थल, भावी पीढी, नारियाँ, जीवन, सम्पत्ति और पूँजी कैसे बचायेंगे?क्या आप को लज्जा नहीं आती? क्या विरोध कर सकते हैं?
यह कि मैकाले को इंडिया में सन १८३५ तक एक भी चोर या भिखारी न मिला. १९४७ तक देश के खजाने में १५५ करोड़ रु० था. कोई विदेशी कर्ज न था. आज प्रति व्यक्ति ८२५६०/- रु० कर्जदार (मार्च २०१६ तक; ७० रु० प्रति डालर की दर से) है| और यह कर्ज तब है, जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३९(ग) के अधिकार से लोक लूट तंत्र ने उपनिवेशवासियों की जमीनें और जमींदारी लूटी|सोना लूटा| बैंक लूटे| पूँजी और उत्पादन के साधन लूटे| जिस सर्वसाधारण के हित हेतु उपनिवेशवासियों की सम्पत्ति और उत्पादन के साधन एलिजाबेथ ने लूटे, वे ही सबसे अधिक कर्ज के बोझ से दब गए. अभी भी एलिजाबेथ अपने लूट से बाज नहीं आ रही है.
क्या कोई उपनिवेशवासी उपनिवेश से मुक्ति लेने में मेरी सहायता कर सकता है।
बाइबल, कुरान व भारतीय संविधान किसी उपनिवेशवासी को जीवित रहने का अधिकार नहीं देते. जज बाइबल, कुरान और भारतीय संविधान के विरुद्ध सुनवाई नहीं कर सकता. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). महामहिम लोग उपनिवेश, बपतिस्मा, अज़ान, खुत्बे और खतने के विरोधी को नष्ट करने हेतु मनोनीत हुए हैं. विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-
http://www.aryavrt.com/muj16w46cy-sadhvi-jelmekyon
उपरोक्त लिंक के अनुसार राज्यपाल सहित प्रत्येक लोकसेवक से भारतीय संविधान का अनुच्छेद २५ अपेक्षा करता है कि उपनिवेशवासी मौत के फंदे और लुटेरों की इस भारतीय संविधान नामक संहिता का आदर करें!
अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान, जिसने राज्यपालों, जजों व लोकसेवकों की पद, प्रभुता और पेट को वैदिक सनातन धर्म के समूल नाश से जोड़ दिया है, का संकलन कर जिन अनुच्छेदों २९(१), ६० व १५९ और भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ द्वारा अब्रह्मी संस्कृतियों को उनकी हत्या, लूट और बलात्कार की संस्कृतियों को बनाये रखने का मौलिक अधिकार दे कर इंडिया में रोका है और विकल्पहीन व दया के पात्र जजों, सांसदों, विधायकों और लोक सेवकों ने जिस भारतीय संविधान में आस्था व निष्ठा की शपथ ली है उसके अनुच्छेद २९(१) ने अब्रह्मी संस्कृतियों को मानवजाति को मिटाने का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार दे रखा है.
ईसाइयत, बपतिस्मा, चर्च, न्यायिक जांच (Inquisition), इस्लाम, अज़ान, मस्जिद, जिहाद, हज अनुदान, मौलवियों व इमामों के वेतन का कोई जज या राज्यपाल विरोध नहीं कर सकता. क्योंकि अब्रह्मी संस्कृतियों का कोई आलोचक जीवित नहीं छोड़ा जाता.
२ सितम्बर, १९५३ के राज्य सभा के बहस में भारतीय संविधान के संकलनकर्ता अम्बेडकर ने राज्यपाल के अधिकारों पर जो कहा था, उसके विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-
http://www.aryavrt.com/ghatak-bhartiya-smvidhan
http://www.aryavrt.com/bhartiya-swatantrta-adhiniyam-1947
बाइबल, कुरान व भारतीय संविधान किसी उपनिवेशवासी को जीवित रहने का अधिकार नहीं देते. जज बाइबल,कुरान और भारतीय संविधान के विरुद्ध सुनवाई नहीं कर सकता. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). आप उपनिवेश, बपतिस्मा, अज़ान, खुत्बे और खतने के विरोधी को नष्ट करने हेतु मनोनीत हुए हैं. 
राज्यपाल सहित प्रत्येक लोकसेवक से भारतीय संविधान का अनुच्छेद २५ अपेक्षा करता है कि उपनिवेशवासी मौत के फंदे और लुटेरों की इस भारतीय संविधान नामक संहिता का आदर करें!
अंग्रेजों की कांग्रेस ने भारतीय संविधान, जिसने राज्यपालों, जजों व लोकसेवकों की पद, प्रभुता और पेट को वैदिक सनातन धर्म के समूल नाश से जोड़ दिया है, का संकलन कर जिन अनुच्छेदों २९(१), ६० व १५९ और भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ द्वारा अब्रह्मी संस्कृतियों को उनकी हत्या, लूट और बलात्कार की संस्कृतियों को बनाये रखने का मौलिक अधिकार दे कर इंडिया में रोका है और विकल्पहीन व दया के पात्र जजों, सांसदों, विधायकों और लोक सेवकों ने जिस भारतीय संविधान में आस्था व निष्ठा की शपथ ली है उसके अनुच्छेद २९(१) ने अब्रह्मी संस्कृतियों को मानवजाति को मिटाने का असीमित मौलिक मजहबी अधिकार दे रखा है.
ईसाइयत, बपतिस्मा, चर्च, न्यायिक जांच (Inquisition), इस्लाम, अज़ान, मस्जिद, जिहाद, हज अनुदान, मौलवियों व इमामों के वेतन का कोई जज या राज्यपाल विरोध नहीं कर सकता. क्योंकि अब्रह्मी संस्कृतियों का कोई आलोचक जीवित नहीं छोड़ा जाता.
http://society-politics.blurtit.com/23976/how-did-galileo-die-
http://www.aryavrt.com/asama-binta-maravana
भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीन किये गए अपराध राज्य के विरुद्ध अपराध हैं, जिनका नियंत्रण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के अधीन राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास है. राज्यपाल का मनोनयन मनुष्य के पुत्रका मांस खाने व लहू पीने वाली डायन (बाइबल, यूहन्ना६:५३) एलिजाबेथ के मातहत और उपकरण करते हैं. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ का संकलन हर उस व्यक्ति को कत्ल कराने, उसका मांस खाने और लहू पीने का डायन एलिजाबेथ को सुगम मार्ग प्रशस्त करता है, जो ईसा को राजा नहीं स्वीकार करता. भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) के साथ पठित (बाइबल, लूका १९:२७). सन १८६० में उपरोक्त २ धाराएँ लागू हुई थीं, लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ के प्रभाव के कारण आज तक बपतिस्मा, चर्च,अज़ान और मस्जिद पर लागू नहीं की गईं.
उल्टे काफिरों के कर के धन से अज़ान द्वारा काफिरों के ईश्वर का अपमान करने और काफिरों को कत्ल करने के खुत्बे देने के बदले मुअज्जिन/ईमाम वेतन पाते हैं. (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६). कोई जज बाइबल और कुरान के विरुद्ध सुनवाई ही नहीं कर सकता. (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४).
OFFENCES RELATING TO RELIGION IN PAKISTAN
 108[295-C.Use of derogatory remarks, etc., in respect of the Holy Prophet:
‌Whoever by words, either spoken or written, or by visible representation or by any imputation, innuendo, or insinuation, directly or indirectly, defiles the sacred name of the Holy Prophet Muhammad (peace be upon him) shall be punished with death, or imprisonment for life, and shall also be liable to fine.
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