Veerya

वीर्य

किसान को सांड़ को वीर्य हीन कर दास (बैल) बनाने के लिए उसका बन्ध्याकरण करना पड़ता है| (अ)ब्राह्मी संस्कृतियां खतना और इन्द्र की भांति मेनकाओं का प्रयोग कर मानवमात्र को दास बनाती हैं| अब्रह्मी संस्कृतियों के अनुयायी स्वेच्छा से खतना करा कर और / या यौनसुख के लोभ, (बाइबल, याशयाह १३:१६) व (कुरान २३:६), में दास बनते हैं. नबियों ने अपने अनुयायियों को अधीन करने के लिए इंद्र की भांति धरती की सभी नारियां मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप रखी हैं|. इतना ही नहीं ईसा ने बेटी (बाइबल, , कोरिन्थिंस ७:३६) से विवाह की छूट दी है| अल्लाह ने मुहम्मद का निकाह उसकी पुत्रवधू जैनब (कुरान, ३३:३७-३८) से किया और ५२ वर्ष के आयु में ६ वर्ष की आयशा से उसका निकाह किया| संयुक्त राष्ट्रसंघ भी पीछे नहीं है| आप की कन्या को बिना विवाह बच्चे पैदा करने के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र संघ कानून पहले ही बना चुका है| [मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा|[UDHR अनु२५()]. विवाह या बिना विवाह सभी जच्चे-बच्चे को समान सामाजिक सुरक्षा प्रदान होगी|”]. 

'अहम् ब्रह्म अस्मि' का तात्पर्य

आतताई अब्रह्मी संस्कृतियां खतना, कामुक सुख, समलैंगिक सम्बन्ध, सहजीवन, कौटुम्बिक व्यभिचार आदि द्वारा व्यक्ति के इसी वीर्य को नष्ट कर उसे दास बना चुकी हैं| ईसाइयों ने कुमारी माओं को महिमामंडित कर और वैश्यावृति को सम्मानित कर मानवमात्र को वीर्यहीन कर दिया है| इन मजहबों ने संप्रभु मनुष्य को दास व रुग्ण बना दिया हैप्रत्येक मनुष्य ब्रह्म है| उसको जन्म के साथ ही प्राप्त वीर्य का सूक्ष्म अंश ब्रह्म सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व-व्याप्त, वह शक्ति है जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं। मल ही बल है और वीर्य ही जीवन

चरित्रदैवी शक्तियाँपरमानन्द और निरोग जीवन चाहिए तो गुरुकुलों को पुनर्जीवित करियेवीर्य अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का दाता, स्वतंत्रता, परमानन्द, आरोग्य, ओज, तेज और स्मृति का जनक है| जो कोई वीर्यक्षरण करता या कराता है, स्वयं का ही नहीं - मानवजाति का भयानक शत्रु  है| वीर्यहीन व्यक्ति अपनी इन्द्रियों और शक्तिवान का दास ही बन सकता है, स्वतन्त्र नहीं रह सकता| वीर्यहीन व्यक्ति का मानवाधिकार नहीं होता| वीर्य हीन मनुष्य रोगग्रसित चलता फिरता मुर्दा और दास है| भारतीय संविधान मानव मात्र को दास बनाने अथवा कत्ल करने की संहिता है| भारतीय संविधान, कुरान और बाइबल से मानव जाति के, डायनासोर की भांति, अस्तित्व को खतरा है

अहम् ब्रह्मास्मि का सरल हिन्दी अनुवाद है कि मैं ब्रह्म हूँ । साधारण व्यक्ति दिग्भ्रमित हैं। इसका कारण यह है लोग - जड़ बुद्धि व्याख्याकारों के कहे को अपनाते है। किसी भी अभिकथन के अभिप्राय को जानने के लिए आवश्यक है कि उसके पूर्वपक्ष को समझा जाय। हम वैदिक पंथी उपनिषदों के एक मात्र प्रमाणिक भाष्यकार आदिशंकराचार्य के कथन को प्रमाण मानते हैं, जो किसी व्यक्ति-मन में किसीभी तरह का अंध-विश्वास अथवा विभ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहते थे।

इस अभिकथन के दो स्पष्ट पूर्व-पक्ष हैं-

१) वह धारणा जो व्यक्ति को अधीन करने के लिए धर्म का आश्रित बनाती है। जैसे, एक मनुष्य क्या कर सकता है, करने वाला तो कोई और ही है। मीमांसा दर्शन का कर्मकांड-वादी समझ, जिसके अनुसार फल देवता देते हैं, कर्मकांड की प्राविधि ही सब कुछ है । वह दर्शन व्यक्ति सत्ता को तुच्छ और गौण करता है- देवता, मन्त्र और धर्म को श्रेष्ठ बताता है। एक व्यक्ति के पास पराश्रित और हताश होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। धर्म में पैगंबर/पौरोहित्य के वर्चस्व तथा कर्मकांड की 'अर्थ-हीन' दुरुहता को (अहम् ब्रह्मास्मि) का अभिकथन चुनौती देता है।

२) सांख्य-दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति (जीव) स्वयं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी करती है - प्रकृति करती है। बंधन में भी पुरूष को प्रकृति डालती है तो मुक्त भी पुरूष को प्रकृति करती है। यानी पुरूष सिर्फ़ प्रकृति के इशारे पर नाचता है। इस विचारधारा के अनुसार तो व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व है ही नहीं।

इन दो मानव-सत्ता विरोधी धारणाओं का खंडन और निषेध करते हुए शंकराचार्य मानव-व्यक्तित्व की गरिमा की स्थापना करते हैं। आइये, समझे कि अहम् ब्रह्मास्मि का वास्तविक तात्पर्य क्या है?

अहम् यानी मैं स्वयं ब्रह्म अस्मि यानी हूँ और यही सच है और यह उतना ही सच है जितना कि दो और दो का चार होना|

अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निर्देशित करता है कि मानव यानी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों! आप चाहे मुसलमान हो या ईसाई, अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। कोई ईश्वर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्ति को अनावश्यक महत्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो - उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो, उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ। जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा - उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।

चीन के युद्ध विशेषज्ञ ­­सन चू ने कहा है शत्रु की रणनीति जानो, तुम पराजित नहीं हो सकते और बिना युद्ध लड़े ही शत्रु को शक्तिहीन और पराजित कर वश में कर लेना सर्वोत्तम है| ब्रिटिश उपनिवेश इंडिया का हर लोकसेवक बिना लड़े ही वीर्यहीन, पराजित व दास हो कर अपने ही सर्वनाश का उपकरण बन गया है| लोकसेवक अपनी ही सन्ततियों और वैदिक सनातन संस्कृति को मिटाने के लिए नियुक्त किये गए हैं| पराधीन लोकसेवक बेबस हैं|

एलिजाबेथ ने, निर्विरोध, पूरे मानव जाति को वीर्यहीन कर, सबके प्राणों को संकट में डाल कर, अपने अधीन कर रखा है| किसी के पास एलिजाबेथ के विरोध का साहस नहीं! इंडिया आज भी ब्रिटिश उपनिवेश व नागरिक अधिकारहीन दास है| विकल्प मात्र उपनिवेश से मुक्ति के लिए युद्ध है| साध्वी प्रज्ञा ने स्वतंत्रता के उस युद्धको प्रारम्भ कर दिया है, जिसे १५ अगस्त, १९४७ से छल से रोका गया है| {भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, १९४७, अनुच्छेद ६ (ब)(।।) भारतीय संविधान व राष्ट्कुल की सदस्यता} क्या शासक उपनिवेश से मुक्ति दिला कर भावी पीढ़ी को सम्प्रभु बनाने वाले ब्रह्मचर्य के निःशुल्क शिक्षाकेंद्र गुरुकुलों को पुनर्जीवित करने के लिए हमें सहयोग देंगे?

मनुष्य को दास बनाने का सर्वोत्तम मार्ग है, उसको वीर्यहीन करना यानी उसकी ब्रह्म शक्ति को छीन लेना| खतने पर अपने शोध के पश्चात १८९१ में प्रकाशित अपने ऐतिहासिक पुस्तक में चिकित्सक पीटर चार्ल्स रेमोंदिनो ने लिखा है कि पराजित शत्रु को जीवन भर पुंसत्वहीन कर (वीर्यहीन कर) दास के रूप में उपयोग करने के लिए शिश्न के अन्गोच्छेदन या अंडकोष निकाल कर बधिया करने (जैसा कि किसान सांड़ के साथ करता है) से खतना करना कम घातक है| पीटर महोदय यह बताना भूल गए कि दास बनाने के लिए खतने से भी कम घातक वेश्यावृत्ति और समलैंगिक सम्बन्ध को संरक्षण देना है| मूसा से लेकर एलिजाबेथ तक मानवमात्र को वीर्यहीन कर दास के रूप में उपयोग कर रहे हैं| पूरा विवरण देखें:-

http://en.wikipedia.org/wiki/Peter_Charles_Remondino

(अ)ब्राह्मी संस्कृतियां खतना और इन्द्र की भांति मेनकाओं के प्रयोग द्वारा मानवमात्र को वीर्यहीन कर दास बनाती हैंसैतानों मूसा और मुहम्मद नेकिसान के सांड़ की भांतियहूदियों को दास बनाने लिए खतना को मजहब से जोड़ दिया हैकिसान को सांड़ को दास बना कर खेती के योग्य बैल बनाने के लिए सांड़ का बंध्याकरण करना पड़ता है,लेकिन लूट और यौनाचार के लोभ में यहूदी और मुसलमान मजहब की आड़ में स्वेच्छा से गाजे बाजे के साथ वीर्यहीन बनने के लिए खतना कराते हैं और स्वेच्छा से अपने ब्रह्मतेज को गवां देते हैंजीवन भर रोगीअशक्त और दास बन कर जीते हैंफिर भी वीर्यहीन कर दास बनाने वाले और कयामत तक कब्र में सड़ाने वाले मूसा या मुहम्मद को यहूदी या मुसलमान अपना शत्रु नहीं मानतेक्यों कि मूसा और मुहम्मद ने लूटहत्या और नारी बलात्कार को जन्नत प्राप्ति का सुगम उपाय घोषित कर रखा हैयद्यपि बाइबल में खतना करने की स्पष्ट आज्ञा है, जिसको नीचे उद्धृत किया जा रहा है,

और तुम अपने चमड़ी का मांस खतना करेगा, और यह वाचा मेरे और तुम्हारे betwixt की निशानी होगी.बाइबल, उत्पत्ति १७:११

http://2nobib.com/index.php?title=Genesis_17/hi

तथापि इस्लाम में खतना वीर्यहीन करने की विधि है| इस्लाम में, खतना एक सुन्नाह (रिवाज) है, जिसका कुरान में ज़िक्र नहीं किया गया है. मुख्य बात यह है कि इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है और यह इस्लाम में प्रवेश करने की शर्त भी नहीं है. अतः मुसलमानों सहित मानवमात्र को मेरी नेक सलाह है कि वे खतना का विरोध करें| खतना करा कर अपने अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के दाता, स्वतंत्रता, परमानंद, आरोग्य, ओज, तेज और स्मृति के जनक वीर्य को नष्ट न करें| क्योंकि जो कोई वीर्यक्षरण करता या कराता है, स्वयं का ही नहीं - मानवजाति का भयानक शत्रु है|

यहाँ विश्वामित्र और मेनका का प्रसंग प्रासंगिक है| इंद्र ने वीर्यवान विश्वामित्र को पराजित करने के लिए मेनका का उपयोग किया| अप्राकृतिक मैथुन बाइबल, कुरान और न्यायपालिका से पोषित और संरक्षित हैमूसा (बाइबल, याशयाह १३:१६) व मुहम्मद (कुरान २३:६) ने तो इंद्र की भांति धरती की सभी नारियां मुसलमानों और ईसाइयों को सौंप रखी हैं| इतना ही नहीं ईसा ने बेटी (बाइबल, , कोरिन्थिंस ७:३६) से विवाह की छूट दी है| अल्लाह ने मुहम्मद का निकाह उसकी पुत्रवधू जैनब (कुरान, ३३:३७-३८) से किया और ५२ वर्ष के आयु में ६ वर्ष की आयशा से उसका निकाह किया| ईसाइयों के ईसा के बाप का पता नहीं है| ईसा को जेहोवा के एक मात्र पुत्र होने का सम्मान प्राप्त है| कुमारी माताओं को स्वयं संयुक्त राष्ट्र सम्मानित कर चुका है| जहाँ कुमारी माएं ईसाइयत में सम्माननीय है - वहीँ आप की कन्या को बिना विवाह बच्चे पैदा करने के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र संघ कानून पहले ही बना चुका है| [मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा| अनुच्छेद २५(२)]. विवाह या बिना विवाह सभी जच्चे-बच्चे को समान सामाजिक सुरक्षा प्रदान होगी|”], वहीँ सती का महिमा मंडन दंडनीय अपराध है| (सती प्रथा निवारण कानून, १९८७). दास बनाने के लिए ईसाईयों ने मरियम के जारज और प्रेत ईसा के वैश्यावृत्ति को मजहब से जोड़ लिया हैईसाइयों का ईसा स्वयं जारज है और उस ने प्रत्येक ईसाई परिवार को वैश्यालय बना दिया हैकुमारी माताएं प्रायः प्रत्येक ईसाई घरों में मिलती हैंइंद्र की भांति एलिजाबेथ दास बनाने के लिए व्यभिचार को राज्यपालों व जजों द्वारा संरक्षण दिला रही हैबिना प्रमाण उपनिवेश का जज भी फैसला नहीं देता| पैगम्बरों के आतताई ईश्वरों पर आप विश्वास क्यों करते हैं?

एलिजाबेथ की परेशानी

एलिजाबेथ को परेशानी यह है कि हमारा ईश्वर जारज और प्रेत नहीं हैहम वैदिक सनातन धर्म के अनुयायी व भगवा आतंकवादी कुमारी माताओं को संरक्षण और सम्मान नहीं देते| हमारा ईश्वर जारज(जार्ज) और प्रेत नहीं है| ईसाइयों का ईसा स्वयं जारज(जार्ज) है और उस ने प्रत्येक ईसाई परिवार को वैश्यालय बना दिया है| कुमारी माताएं प्रायः प्रत्येक ईसाई घरों में मिलती हैं| जारज(जार्ज) हमारे लिए अपमानजनक सम्बोधन हो सकता है, लेकिन अंग्रेजों का शासक परिवार सम्मानित जारज(जार्ज) है| उपनिवेशों के नागरिक इन्हीं जारजों की प्रजा हैंइतना ही नहीं ईसाइयों का मुक्तिदाता ईसा ही जारज(जार्ज) व पवित्र? प्रेत है| हमारे इंडिया में ईसाई घरों में भी कुमारी माताएं नहीं मिलतीं| हमारी कन्याएं १३ वर्ष से भी कम आयु में बिना विवाह गर्भवती नहीं होतीं| हमारे यहाँ विद्यालयों में गर्भ निरोधक गोलियाँ नहीं बांटी जाती| इससे वीर्यहीनता के प्रसार और भेंड़ बनाने में एलिजाबेथ को कठिनाई हो रही है|

जो उपलब्धि इस्लाम ई० स० ७१२ से ई० स० १८३५ तक अर्जित न कर सका, गुरुकुल मिटाकर, उससे अधिक ईसाइयत ने मात्र ई० स० १८५७ से ई० स० १९०५ के बीच अर्जित कर लिया| सोनिया वैदिक सनातन संस्कृति को मिटाने की दौड़ में सबसे आगे है| मात्र ३ वर्षों की अवधि में सोनिया ने वैदिक सनातन संस्कृति की जड़ें ही नष्ट कर दी हैं|

जजों ने लव जेहाद, बेटी व पुत्रवधू से विवाह, समलैंगिक मैथुन, सहजीवन (बिना विवाह यौन सम्बन्ध) और सगोत्रीय विवाह (भाई-बहन यौन सम्बन्ध) को कानूनी मान्यता दे दी है| बारमें दारूपीने वाली बालाओं का सम्मान हो रहा है! विवाह सम्बन्ध अब बेमानी हो चुके हैं| सोनिया के सत्ता में आने के बाद सन २००५ से तीन प्रदेशों केरल, गुजरात और राजस्थान में स्कूलों में यौन शिक्षा लागू हो गई है| शीघ्र ही अमेरिका की भांति इंडिया के विद्यालयों में गर्भ निरोधक गोलियां बांटी जाएँगी| जजों की कृपा से आप की कन्याएं मदिरालयों में दारू पीने और नाच घरों में नाचने के लिए स्वतन्त्र हैं| उज्ज्वला - नारायण दत्त तिवारी और आरुषि - हेमराज में जजों के फैसलों ने आने वाले समाज की दिशा निर्धारित कर दी है| आप वैश्यावृत्ति से अपनी नारियों को बचा न पाएंगे|

अब सोनिया टाटा, बिड़ला, अम्बानी आदि को लूटने के लिए एफडीआई लागूकर चुकी है|

वीर्य ईश्वरीय उर्जा का अनंत स्रोतस्वतंत्रतापरमानंदओजतेज और स्मृति का जनक हैवीर्यवान को पराजित या अधीन नहीं किया जा सकता हैमनुष्य की छोड़ियेवीर्यवान सांड़ को भी अधीन नहीं किया जा सकतान बांधा ही जा सकता हैदास (बैल) बनाने के लिए किसान सांड़को वीर्यहीन कर देता हैवीर्यहीन होते ही वह बैल बन कर किसान के लिए अन्न पैदा करता हैजिसे किसान स्वयं खा जाता है और बैल को भूसा खिलाता हैक्यों कि वीर्य स्वतंत्रता, परमानंद, ओज, तेज और स्मृति का जनक है|

मानव जाति को वीर्यहीन कर पराजित व दास बनाने का षड्यंत्र तो मूसा ने खतना द्वारा लगभग ३२०० वर्षों पूर्व ही प्रारम्भ कर दिया था| मैकाले ने गुरुकुलों को मिटा कर उसे आगे बढ़ायायह संस्कृतियों का युद्ध है और इसे ईसाइयत और इस्लाम को संरक्षण देकर नहीं लड़ा जा सकता| या तो ईसाइयत और इस्लाम रहेगा अथवा वैदिक सनातन संस्कृति|

पैगम्बरों के आदेश और अब्रह्मी संस्कृतियों के विश्वास के अनुसार दास विश्वासियों द्वारा अविश्वासियों को कत्ल कर देना ही अविश्वासियों पर दया करना और स्वर्गजहाँ विलासिता की सभी वस्तुएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैंप्राप्ति का पक्का उपाय है|

यहूदी या मुसलमान किसको पसंद करेंगे?

महामूर्ख यहूदी (बाइबल, उत्पत्ति २:१७) या मुसलमान (कुरान २:३५) किसको पसंद करेंगे? ईश्वर को, जो उस के रग रग में सदा उस के साथ है, या जेहोवा अथवा अल्लाह को, जो सातवें आसमान पर बैठा है और अपने अनुयायियों से मिल ही नहीं सकता? ईश्वर को, जो उस को आरोग्य, ओज, तेज, ८ सिद्धि, ९ निधि और स्मृति का स्वामी बनाता है या जेहोवा अथवा अल्लाह को, जो उनका खतना करा कर दास व अपराधी बनाते हैं? ईश्वर को, जो उन को किसी भी देवता के उपासना की स्वतंत्रता देता है (गीता ७:२१) अथवा जेहोवा अथवा अल्लाह को, जो मानवमात्र के उपासना की स्वतंत्रता छीनते और दास बनाते हैं?

एक ओर ब्रह्मिक वैदिक सनातन संस्कृति है और दूसरी ओर (अ)ब्रह्मिक संस्कृति| ब्रह्मिक वैदिक सनातन संस्कृति वीर्यरक्षा यानी मानव के ओज, तेज, स्मृति और परमानंद की प्राप्ति के लिये निःशुल्क गुरुकुल चलाती थी और (अ)ब्रह्मिक संस्कृति महँगी शिक्षा व्यवस्था लाद कर खतना और यौनशिक्षा द्वारा मानवमात्र को वीर्यहीन कर (किसान की भांति सांड़ से बैल बना कर) मानवमात्र को दास बना रही हैंजिस प्रकार किसान सांड को वीर्यहीन कर दास बना लेता है, उसी प्रकार मैकाले ने गुरुकुल शिक्षा को मिटा कर मानव मात्र को वीर्यहीन बना कर दास बना लिया है|

हर मुसलमान व ईसाई यह याद रखे कि उसको दास बनाया गया हैवस्तुतः मूसा और मुहम्मद नामक पैगम्बरों ने उसको दास बनाने के लिए उसका खतना करा कर उसके ब्रह्म को उससे छीनने का घृणित और अक्षम्य अपराध किया हैवे तो मर गए लेकिन अपनी वरासत शासकों और पुरोहितों को सौंप गए हैंअगर उन्होंने अब भी पैगम्बरों द्वारा गढे गए जेहोवा और अल्लाह का परित्याग नहीं किया तो मानव जाति बचेगी नहीं| अधिक विवरण के लिए नीचे की लिंक क्लिक करें:-

http://www.aryavrt.com/hmara-kathan-11404

जड़ (निर्जीव) और चेतन परमाणु उर्जा

जिसे आज के वैज्ञानिक परमाणु कहते हैंउसे हमारे ही नहीं – ईसाइयों व मुसलमानों के  पूर्वज भी ब्रह्म कहते थे| आज का परमाणु उर्जा विज्ञान जड़ (निर्जीव) परमाणुओं के भेदन पर आश्रित परमाणु ऊर्जा विज्ञान हैसर्व विदित है कि ऊर्जा निर्जीव ईंधन के आधे भार को प्रकाश की गति के वर्ग से गुणा करने के बराबर हैजब कि हमारे पूर्वजों का विज्ञान जैविक परमाणुओं के भेदन पर आधारित हैचेतन परमाणु में जड़ परमाणु से भी अधिक ऊर्जा हैयह शोध का कार्य गुरुकुलों में होता थाहमारा ज्ञान और विज्ञान आज के जड़ परमाणु उर्जा के ज्ञान से अत्यधिक विकसित हैइसी परमाणु भेदन को कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है| महाभारत काल में अश्वस्थामा के ब्रह्मास्त्र के संधान और लक्ष्य भेदन के प्रकरण से स्पष्ट होता है कि ब्रह्मास्त्र स्वचालित नहीं थेएक बार छोड़ देने के बाद भी उनकी दिशा और लक्ष्य भेदन को नियंत्रित किया जा सकता थाइतना ही नहीं लक्ष्य पर वार कर ब्रह्मास्त्र छोड़ने वाले के पास वापस भी आ जाते थेउनके मलबों को ठिकाने लगाने की समस्या नहीं थीविकिरण से जीवन को होने वाली हानि की समस्या नहीं थीउनके निर्माण में इतना व्यय नहीं होता थाब्रह्म ज्ञान की शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थीगुरुकुलों को मैकाले ने मिटा दियाइन आसुरी संस्कृतियों को मानवता के हित में मिटाने में और गुरुकुलों और गौ संवर्धन को पुनर्स्थापित करने में क्या आप हमारी सहायता करेंगे?

मुसलमान  ईसाई विचार करें:

जेहोवा और अल्लाह का कोई अस्तित्व नहीं है| मूसा और मुहम्मद ने मनुष्य को दास बनाने के लिए इनको गढ़ा है| इनके आड़ में ये मनुष्य को वीर्यहीन बनाते रहे| स्वयं चले गए और अपने उत्तराधिकार शासकों और पुरोहितों को सौंप गये हैं| स्वतंत्रता हम वैदिक पंथियों का ही नहीं, मुसलमानों और ईसाइयों का भी जन्म सिद्ध अधिकार है| लूट और यौन सुख के लोभ में आप लोग स्वयं वीर्यहीन बनकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं|

ब्रह्मचर्य का तत्व ज्ञान

वैदिक सनातन धर्म वीर्य को साक्षात ईश्वर का पर्याय मानता हैइसके किसी भी तरह क्षरण को घृणित पाप मानता हैवैदिक सनातन धर्म की मान्यता है कि विद्या मात्र ब्रह्मविद्या है और ज्ञान मात्र ब्रह्मज्ञानवीर्यरक्षा के बिना ब्रह्मज्ञान सम्भव नहींवीर्यरक्षा की शिक्षा गुरुकुलों में निःशुल्क दी जाती थीजिसे मानवमात्र को भेंड़ बनाने के लिए मैकाले ने मिटा दियाईश्वर ने मनुष्य को वीर्य के रुप में अपनी सारी शक्ति दी है। जेहोवा और अल्लाह मूसा और मुहम्मद के बिचौलिये और मनुष्य को दास बना कर लूटने के लिए मुखौटे हैंइनका अस्तित्व ही नहीं हैमनुष्य के वीर्य की शक्ति को मिटाने का प्रथम प्रयास मूसा ने कियामुहम्मद ने मूसा का नकल किया|

परमात्मा द्वारा अपनी सारी शक्ति बीज रुप में मनुष्य को दी गई है। वह शक्ति कुण्डलिनी कहलाती है। आधुनिक परमाणु विज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी (अटॉमिक रिएक्टर) हैमूलाधार चक्र में कुण्डलिनी महाशक्ति अत्यन्त प्रचण्ड स्तर की क्षमताएँ दबाए बैठी है। पुराणों में इसे महाकाली के नाम से पुकारा गया है। कामशक्ति का अनुपयोग,सदुपयोगदुरुपयोग किस प्रकार मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करता हैउसे आध्यात्मिक काम विज्ञान कहना चाहिए। इस शक्ति का बहुत सूझ-बूझ के साथ प्रयोग किया जाना चाहिएयही ब्रह्मचर्य का तत्व ज्ञान है। बिजली की शक्ति से अगणित प्रयोजन पूरे किए जाते हैं और लाभ उठाए जाते हैंपर यह तभी होता है जब उसका ठीक तरह प्रयोग करना आएअन्यथा चूक करने वाले के लिए तो वही बिजली प्राणघातक सिद्ध होती है।

वीर्य ब्रह्म यानी चेतन परमाणु का मिश्रण है| प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है| वीर्य का क्षरण स्वेच्छा से स्व ब्रह्म की हत्या और अपने को ईश्वरीय शक्ति से दूर करना है|

वीर्य ईश्वरीय उर्जा का अनंत स्रोत है| विद्या मात्र ब्रह्मविद्या है और ज्ञान मात्र ब्रह्मज्ञान| वीर्यरक्षा के बिना ब्रह्मज्ञान सम्भव नहीं| वीर्य के रक्षा की शिक्षा गुरुकुलों में निःशुल्कदी जाती थी, जिसे मैकाले ने मिटा दिया| भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले वैदिक सनातन धर्म और मानव जाति की रक्षा नहीं कर सकते| दास अब्रह्मी संस्कृतियों को मिटाने में अभिनव भारत और आर्यावर्त सरकार को सहयोग दें|

शासक, समाजवाद, ईसाइयत और इस्लाम यहूदी और मुसलमान का खतना अथवा यौन शिक्षा अथवा मुक्त यौन सम्बन्ध की आजादी के बहाने आप को वीर्य हीन बना कर दास बना रहे हैं व ईसाई को भेंड़ बना रहे हैं| प्रजा तंत्र के ठग आप की नसबंदी कराते हैं|

विद्वानों द्वारा वीर्य का मूल्यांकन

ब्रह्मचर्य  से ही ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होते हैं। हे प्रभो ! निष्कामता प्रदान कर इस दास पर कृपा कीजिए।

महर्षि भारद्वाज

दुःख के मूल को नष्ट करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है।'

महात्मा बुद्ध

‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’ “दुःख के सर्वथा नाश के लिए ब्रह्मचर्य का आचरण करो। जो लोग ब्रह्मचर्यहीन हैउन्हें पग-पग पर दुःख उठाने पड़ते हैं। यदि एक ही कृत्य से सारे विश्व को वश में करना चाहो तो शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करो।

भक्त वामन

"अचिंत्य और अदभुत पराक्रमआवश्यक समग्र अनुपम मानसिक व शारीरिक शक्तिप्रशंसनीय सदगुण तथा दीर्घायुष्य केवल ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके विपरीत यदि तुम अपने जीवन की ब्रह्मचर्य रूपी नस काट डालोगे तो तुम्हारी शारीरिक-मानसिक शक्तियों की बरबादी होगी और तुम समस्त प्रकार के दुःखों एवं अधोगति के गर्त में गिर पड़ोगे।"

प्रो. कृष्णराव

"शरीर के रक्षण के लिए ब्रह्मचर्य सर्वाधिक आवश्यक है। जिसने उसका पालन नहीं कियाउसका जीवन धिक्कार के योग्य है।"

स्वामी आत्मानंदजी

"कहते हैं कि जिस प्रकार पवित्रता से आत्मा को कोई हानि नहीं होतीउसी प्रकार शरीर को ब्रह्मचर्य से कोई क्षति नहीं पहुँचती। इन्द्रिय-संयम सबसे उत्तम आचरण है।"

सर जेम्स मैगट

"नवयुवकों के लिए ब्रह्मचर्य शारीरिकमानसिक तथा नैतिक – तीनों दृष्टियों से उनकी रक्षा करता है।"

डॉ. पेरियर

"विषयसंबंधी सभी उत्तेजक बातों से बचे रहने से विषय-वासना धीरे-धीरे कम हो जाती है।"

मनोवैज्ञानिक कोरल

"ब्रह्मचर्य जीवन-वृक्ष का पुष्प है और प्रतिभापवित्रतावीरता आदि गुण उसके कतिपय फल हैं।"

महात्मा थोरो

"ब्रह्मचारी अपना प्रत्येक कार्य निरंतर करता रहता है। उसे प्रायः थकान नहीं लगती। वह कभी चिंतातुर नहीं होता। उसका शरीर सुदृढ़ होता है। उसका मुख तेजस्वी होता है। उसका स्वभाव आनंदी और उत्साही होता है।"

डॉ. एक्सन

"समाज में सुख-शांति की वृद्धि के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए। इससे मानव-जीवन का विकास होता है और समाज की भित्ति बलवान होती है।"

महात्मा टॉलस्टॉय

"मैं विद्यार्थियों और युवकों से यही कहता हूँ कि वे ब्रह्मचर्य और बल की उपासना करें।बिना शक्ति व बुद्धि के अधिकारों की रक्षा और प्राप्ति नहीं हो सकती। देश की स्वतंत्रता वीरों पर ही निर्भर है।"

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक

"वीर्ययुक्तता ही साधुता है और निर्वीयता ही पाप हैअतः बलवान और वीर्यवान बनने की चेष्टा करनी चाहिए।"

स्वामी विवेकानंदजी

"वीर्य मनुष्य को अमरत्व प्राप्त कराता हैअतः प्रत्येक स्त्री-पुरुष को ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए।"

स्वामी नित्यानंदजी

 ‘‘इंद्रिय संयम करोब्रह्मचर्य पालोइससे तुम बलवान और वीर्यवान बनोगे।’’

गुरुगोविन्द सिंह

‘‘संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है।’’ आयुर्वेदाचार्य वाग्भट्ट

 ‘‘एक तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्ययदि दोनों को तौला जाए तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश से पलड़े के बराबर रहता है।’’

छांदोग्योपनिषद्

 ‘‘तीनों लोक के साम्राज्य का त्याग करनास्वर्ग का अधिकार छोड़ देनाइससे भी कोई उत्तम वस्तु होउसको भी छोड़ देना परन्तु ब्रह्मचर्य को भंग न करना।’’

भीष्मपितामह

 ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता हैवैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।’’                          स्वामी रामतीर्थ

 ‘‘ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि व्याधिग्रस्त दिन कैसा होता है। उसकी पाचन शक्ति सदा नियमित रहती है। उसकी वृद्धावस्था में बाल्यावस्था जैसा ही आनन्द रहता है।’’  जीव शास्त्री डॉ० क्राउन एम.डी

‘‘ब्रह्मचारी की बुद्धि कुशाग्र और विशद होती हैउसकी वाणी मोहक होती हैउसकी स्मरण शक्ति तीव्र होती हैउसका स्वभाव आनन्दी और उत्साही होता है।’’

प्रो० रौवसन

 ‘‘ब्रह्मचर्य से परोपकार की वृत्ति जागृत होती है और परोपकार की वृत्ति के बिना किसी को मोक्ष मिलना सम्भव नहीं है।’’                 स्वामी विद्यानन्द -

लेकिन उपरोक्त विद्वानों ने वीर्य का सही मूल्यांकन सही नहीं किया है|

काम तत्व के ज्ञान-विज्ञान को भी समझा जाए-

नर और नारी के बीच पाए जाने वाले प्राण और रयि, अग्नि और सोम, स्वाहा और स्वधा तत्वों का महत्व सामान्य नहीं असामान्य है। सृजन और उद् भव कीउत्कर्ष और आह्लाद की असीम सम्भावनाएँ उसमे भरी पड़ी है। प्रजा उत्पादन तेा उस मिलन का बहुत ही सूक्ष्म सा स्थूल और अति तुच्छ परिणाम है। इस सृष्टि के मूल कारण और चेतनाके आदि स्रोत इन द्विधा संस्करण और संचरण का ठीक तरह मूल्यांकन किया जाना चाहिएऔर इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इनका सदुपयोग किस प्रकार विश्व कल्याण की सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक हो सकता है, और इनका दुरुपयोग मानव जाति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार क्षीण विकृत करके विनाश के गर्त में धकेलने के लिए दुर्दांत दैत्य की तरह सर्वग्राही संकट उत्पन्न कर सकता है।

अश्लील अवांछनीय और गोपनीय संयोग कर्म हो सकता है। विकारोत्तेजक शैली में उसका वर्णन अहितकर हो सकता है। पर सृष्टि संस्करण के आदि उद् गम प्रकृति पुरुष के संयोग से किस प्रकार यह द्विधा काम कर रही है यह जानना न तो अनुचित है और न ही अनावश्यक। सच तो यह है कि इस पञ्चाग्नि विद्या की अवहेलना-अवमानना से हमने अपना ही अहित किया है। नर-नारी के बीच प्रकृति प्रदत्त विद्युत् धारा किस सीमा तक किसी दिशा में कितनी और कैसे श्रेयष्कर प्रतिक्रिया उत्नन्न करती है और उनकी विकृति विनाश का निमित्त कैसे बनती हैइस जानकारी को आध्यात्मिक काम विज्ञान कह सकते हैं।

काम शक्ति को गोपनीय तो माना गया है जिस प्रकार धन कितना हैकहाँ हैआदि बातों को आमतौर से लोग गोपनीय रखते हैं। उसकी अनावश्यक चर्चा करने से अहित होने की आशंका रहती है। इसी प्रकार कामतत्व को गोपनीय ही रखा गया हैपर इसकी महत्तासत्ता और पवित्रता से कभी किसी ने इन्कार नहीं किया। यह घृणित नहीं पवित्रतम है। यह हेय नहीं अभिवन्दनीय है। भारतीय आध्यात्म शास्त्र के अन्तर्गत शिव और शक्ति का प्रत्यक्ष समन्वय जिस पूजा प्रतीक में प्रस्तुत किया गया है उसमें उस रहस्य का सहज ही रहस्योद्घाटन हो जाता है। शिव को पुरुष जननेन्द्रिय और पार्वती को नारी का जननेन्द्रिय का स्वरूप दिया गया है। उनका सम्मिलित विग्रह ही अपने देव मन्दिर मे स्थापित है। यह अश्लील नहीं है। तत्वत: यह सृष्टि में संचरण और उल्लास उत्पन्न करने वाले प्राण और रयिअग्नि और सोमके संयोग से उत्पन्न होने वालेमहानतम शक्ति प्रवाह की ओर संकेत है। इस तत्वज्ञान को समझना न तो अश्लील है और न घृणितवरन शक्ति के उद् भवविकास एवं विनियोग का उच्चस्तरीय वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारभूत एक दिव्य संकेत है।

कामशक्ति स्वयं घृणित नहीं है। घृणित तो वह विडम्बना हैजिसके द्वारा इतनी बहुमूल्य ज्योतिधारा को शरीर को जर्जर और मन को अध:पतित करने के लिए अविवेकपूर्ण प्रयुक्त किया जाता है। सावित्री का कुण्डलिनी का प्राण काम पतित कैसे हो सकता हैजो जितना उत्कृष्ट है विकृत होने पर वह उतना ही निकृष्ट बन जाता है यह एक तथ्य है। काम तत्व के बारे में भी यही सिद्धांत लागू होता है।

नारी को कामिनी और रमणी न बनाया जाए|

नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग के बिना सृष्टि का व्यवस्थाक्रम नहीं चल सकता। दोनों का मिलन कामतृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होतावरन घर बसाने से लेकर व्यक्तियों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवित्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही सम्भव होता है। यह घनिष्ठता जितनी प्रगाढ़ होगीविकास और उल्लास की प्रक्रिया उतनी ही सघन होती चली जाएगी।

अतिवाद का एक सिरा यह है कि नारी को कामिनीरमणीवेश्या आदि बनाकर उसे आकर्षण का केन्द्र बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा यह है कि उसे परदेघूंघट की कठोर जंजीरों में जकड़क़र अपंग सदृश्य बना दिया गया। उसे पददलित, पीड़ित, प्रबन्धित करने की नृशंसता अपनाई गई। यह दोनों अतिवादी सिरे ऐसे हैं जिनका समन्वय कर सकना कठिन है।

तीसरा एक और अतिवाद पनपा। अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों कीपाप-पतन की जड़ है। इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस सनक के प्रतिपादन में न जाने क्या-क्या गढ़न्त गढक़र खड़ी कर दी गई। लोग घर छोडक़र भागने मेंस्त्री बच्चे को बिलखता छोडक़र भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े। इन तीनों अतिवादों से बचकर मध्यम मार्ग अपनाते हुए हमें अपनी शक्तियों का सुनियोजन परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु करना चाहिए।

बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार हमारे पूर्वजों ने सारे विश्व में किया| लेकिन कोई उपासना स्थल नहीं तोड़ा| किसी को कत्ल नहीं किया| किसी नारी का बलात्कार नहीं किया| किसी नारी का आभूषण नहीं लूटा| किसी को दास नहीं बनाया| अब्रह्मी संस्कृतियों ने क्या किया?

एक प्रमुख अंतर यह भी है कि जहां ईसाइयत और इस्लाम को अन्य संस्कृतियों को मिटाने में लंबा समय लगा वहीँ वैदिक सनातन धर्म को मिटाने के लिए २६ नवम्बर, १९४९को संविधान बना कर उसे (वैदिक सनातन संस्कृति को) ईसाइयत और इस्लाम के हाथों में सौँप दिया गया है| अज़ान को भारतीय दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अधीनअपराध नहीं माना जाता| राष्ट्रपति व हर राज्यपाल ने अज़ान व मस्जिद को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१), पुलिस के संरक्षण और दंप्रसं की धारा १९६ के कवच में रखा है|

स्पष्टतः अंग्रेजों की कांग्रेस द्वारा संकलित भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ की असाधारण सामरिक योजना ने वैदिक सनातन संस्कृति के समूल नाश में अभूतपूर्व बड़ी सफलता प्राप्त की है| जहाँ भारतीय संविधान का अनुच्छेद २९(१) ईसाइत और इस्लाम के सभी मिशन और जिहाद को, वैदिक सनातन संस्कृति के विरुद्ध आक्रमण के लिए संरक्षणपोषण व संवर्धन देता है, वहीं राष्ट्रपति और राज्यपाल की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेदों ६० व १५९ के अधीन भारतीय संविधान और कानूनों के संरक्षणपोषण व संवर्धन के शपथ लेने के बाद होती है| राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं है| या तो वे अपने ही सर्वनाश की शपथ लें, अन्यथा पद न लेंदंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६, जिसका नियंत्रण राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास सुरक्षित है, वैदिक सनातन संस्कृति के रक्षार्थ किये गये किसी भी विरोध को बड़ी चतुराई से निष्क्रिय कर देती है| ईसाई और मुसलमान को तो उनके मजहब ही वीर्यहीन कर शासक के वश में कर चुके हैं, हम वैदिक सनातन संस्कृति के अनुयायियों को शासक एन केन प्रकारेण वीर्यहीन कर अपने अधीन कर रहे हैं|

अज़ान देने के बदले सरकारें इमामों को सरकारी खजाने से वेतन दे रही हैं| वह भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से! (एआईआर, एससी, १९९३, प० २०८६). अज़ान के विरुद्ध कोई जज सुनवाई नहीं कर सकता| (एआईआर, कलकत्ता, १९८५, प१०४). इसके विपरीत जो भी ईसाइयत और इस्लाम का विरोध कर रहा है, भारतीय  दंड संहिता की धाराओं १५३ व २९५ के अंतर्गत राज्यपालों के संस्तुति पर दंप्रसंकीधारा१९६ के अधीन जेल में ठूस दिया जा रहा है|

मै घोर सांप्रदायिक वैदिक संस्कृति का अनुयायी हूँ। मुसलमानों व ईसाइयों के अनुसार मेरे पूर्वजों ने अनुसूचित जातियों का शोषण किया और यातनाएँ दीं। मैने अपनी पुस्तकअज़ान’ में मैकाले द्वारा स्वीकार किए गए तथ्यों को उद्धृत किया है। जिसमें स्वयम् मैकाले के अनुसार सन १८३५ के पूर्व भारत में कोई अनुसूचित वर्गभिखारी या चोर था ही नहीं! अनुसूचित जाति के मेरे एक मित्र प्रदीप गौतम हैं। गौतम उनका गोत्र है। मेरे ननिहाल के लोग भी गौतम मिश्र हैं। यानी एक शोषक वर्ग का ब्राह्मण और दूसरा शोषित वर्ग का हरिजन। यह समझ से परे है कि हमारे बीच रहने वाले अनुसूचित जाति के शोषित लोग तो अपना मूल गोत्र व संस्कृति बचाए हुए हैं लेकिन आज से २०१४ वर्ष पूर्व ईसाइयत नहीं थी और न १४३५ वर्ष पूर्व इस्लाम था। किसी भी मुसलमान व ईसाई को यह भी नहीं मालूम कि उनके पूर्वज कौन थेउनका मूल धर्म क्या थाजिस प्रकार आज वे आतंक के बल पर लूट व वासना के लोभ में शासकों व पुरोहितों के दास बने हुए हैंउसी प्रकार इन आतताई मजहबों के कारण उनके पूर्वजों को भी अपना मूल धर्म छोड़ना पड़ा था। शासक व पुरोहित उनको खतना और वीर्यहीन कर उनका ईश्वरीय बल छीन चुके हैं| क्या मुसलमान व ईसाई अपने संतानों को चरित्रवान, शक्तिमान और ब्रह्मज्ञानी बनाना और इस्लाम व ईसाइयत से अपने पूर्वजों का बदला लेना नहीं चाहेंगेताकि मानव जाति को बचाया जा सके?

वीर्य और ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक ज्ञान| ताकि:-

1.    काम तत्त्व के बारे में मोटी जानकारी हो जाए।

2.     वीर्य क्षरण से नुकसान व रक्षण के लाभ समझ में आए।

3.     शारीरिक व मानसिक ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाने का संकल्प जागे।

4.     वीर्य रक्षा का उपाय स्पष्ट हो जाए।

5.    नारी के प्रति पवित्र दृष्टि जागे।

पाठकों! ‘‘ब्रह्मचर्य’’ शब्द से आप सभी परिचित होंगे। पर ब्रह्मचर्य क्या हैइसे कैसे साधा जाता हैइसके लाभ हानि क्या-क्या हैआदि विषयों पर शायद ही आप जानते होंगे। इस लेख में हम यही सब जानने समझने की कोशिश करेंगे।

पाठकों! ब्रह्मचर्य एवं काम तत्त्व के बारे में आपको जो जानकारी दी जाएगी उससे आपके बहुत से भ्रम भी दूर होंगे। यह विषय इतना अधिक महत्त्वपूर्ण हैंकि इसके सही जानकारी के बिना मनुष्य का जीवन विवेकशून्य, भटकाव भरा और शक्तिहीन हो जाता है। पुरातनकाल में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। जिसका परिणाम था कि भारत हर क्षेत्र में शक्ति सम्पन्न रहा। यहाँ वीर योद्धाज्ञानीतपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए। पर आज हमारा दुर्भाग्य हैकि पाश्चात्य अपसंस्कृति के दबाव में आकर हम बर्बाद हो गये।

ब्रह्मचर्य के बारे में यदि यह कहा जाय कि यह जीवन में सफलता प्राप्त करने की ‘मास्टर की’ है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ब्रह्मचर्य का शब्दार्थ है वह आचरण जिससे ब्रह्म अर्थात् परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

आयुर्वेद के मतानुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है। आइए जानें वीर्य बनने की प्रक्रिया-भोजन-रस-रक्त-मांस-मेदा-अस्थि-मज्जा-वीर्य। भोजन से रस बनने में ५ दिन लगते हैं फिर रस से रक्त बनने में ५ दिन लगते हैं। आगे ५ - ५ दिन का क्रम चलता है, तब कहीं जाकर अन्त में वीर्य बनता है। इस प्रकार भोजन से वीर्य तैयार होने में ३५ दिन लग जाते हैं। मनुष्य एक दिन में औसतन ८०० ग्राम भोजन करता है, जिससे ३५ दिन बाद आधा ग्राम वीर्य तैयार होता है। ४० बूंद रक्त से १ बूंद वीर्य होता है। एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग १५ ग्राम वीर्य का नाश होता है जो कि ३० दिन के २४ कि.ग्रा. भोजन से तैयार होता है। जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है। मैथुन के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है। रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है।  ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, रोग प्रतिरोधक क्षमता, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है। आज के समय में चारित्रिक दुर्गति के विभिन्न कारण :-

1.    टी.वी. व सिनेमा की सत्यानाशी हवा।

2.     अश्लील साहित्य और चित्र।

3.     वर्तमान शिक्षा पद्धति व शिक्षण संस्थानों का वातावरण।

4.     कुसंगति।

5.     मोबाईल कम्पनियों द्वारा ......।

6.     परिवार में पारिवारिक व आत्मीय वातावरण का अभाव।

7.     इन्टरनेट का दुरुपयोग।

ब्रह्मचर्य जीवन जीने के उपाय- शरीर के अन्दर विद्यमान ‘वीर्य’ ही जीवन शक्ति का भण्डार है। शारीरिक एवं मानसिक दुराचार तथा प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक मैथुन से इसका क्षरण होता है। कामुक चिंतन से भी इसका नुकसान होता है। अत: बचने के कुछ सरल उपाय निम्रानुसार है-

१. ब्रह्मचर्य जीवन जीने के लिये सबसे पहले ‘मन’ को साधने की आवश्यकता है। अत: अन्नमय कोष की साधना करें। भोजन पवित्र एवं सादा होना चाहिएसात्विक होना चाहिए। बिना देशी गौ के दूध सेवन वीर्य की रक्षा नहीं हो सकती|

२. कामुक चिंतन आने पर निम्न उपाय करें-

जिस प्रकार गन्ने का रस बाहर निकल जाने के पश्चात ‘छूछ’ कोई काम का नहीं रह जाता उसी प्रकार व्यक्ति के शरीर से ‘वीर्य’ के न रहने पर होता हैइस भाव का चिंतन करें।

तत्काल निकट के देवालय में चले जायें एवं कुछ देर वहीं बैठे रहें।

अच्छे साहित्य का अध्ययन करें। जैसे- ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकतामानवी विद्युत के चमत्कारमन की प्रचण्ड शक्तिमन के हारे हार है मन के जीते जीतहारिए न हिम्मत आदि।

अच्छे व्यक्ति के पास चले जायें।

आपके घर रिश्तेदार में रहने वाली महिला को याद करें कि मेरे घर में भी माता हैबहन हैबेटी है। अत: सामने खड़ी लडक़ी/महिला भी उसी रूप में है।

लड़कियों से आँख में आँख मिलाकर बाते न करें क्योंकि शरीर में विद्यमान विद्युत शक्ति सबसे ज्यादा ‘आँखों’ के माध्यम से बाहर निकलती है एवं प्रभावित करती है।

3. मैथुन क्रिया से होने वाले नुकसान निम्रानुसार है-

शरीर की जीवनी शक्ति घट जाती हैजिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

आँखो की रोशनी कम हो जाती है।

शारीरिक एवं मानसिक बल कमजोर हो जाता है।

जितना वीर्य बचाओगे उतना ही जीवन पाओगे।

जिस तरह जीने के लिये ऑक्सीजन चाहिए वैसे ही ‘निरोग’ रहने के लिये ‘वीर्य

ऑक्सीजन प्राणवायु है तो वीर्य जीवनी शक्ति है।

अधिक मैथुन से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती  है।

चिंतन विकृत हो जाता है।

सात्विक भोजनसकारात्मक चिंतन एवं सेवा कार्यों में व्यस्त रहने से ‘मन’ नियंत्रित होता है। मन के नियंत्रण से ब्रह्मचर्य जीवन साधने में ‘सरल’ हो जाता है।

ब्रह्मचर्य रक्षा के उपाय :- (उपाय बताने के पहले सबसे उनके पिछले गलत आदतोंघटनाओं व समस्याओं को कागज में लिख लें। पढक़र फाड़ दें।)

1.    प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएँ।

2.    तेज मिर्च मसालों से बचें। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन करें। देशी गौ का दूध अवश्य पियें|

3.    सभी नशीले पदार्थों से बचें।

4.    गायत्री मन्त्र या अपने ईष्ट मन्त्र का जप व लेखन करें।

5.    नित्य ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करें।

6.    रात्रि में सोने के १-२ घंटे पहले ठण्डा करके देशी गौ का दूध अवश्य पियें|

7.    रात्रि शयन के पूर्व महापुरुषों के जीवन चरित्र का स्वाध्याय करें।

8.    मन को खाली न छोड़ें किसी रचनात्मक कार्य व लक्ष्य से जोड़े रखें।

9.    नित्य योगाभ्यास करें। निम्न आसन व प्राणायाम अनिवार्यत: करें-आसन-पश्चिमोत्तासनसर्वांगासनभद्रासन प्राणायाम- भस्त्रिकाकपालभातिअनुलोम विलोम।

10.    एकान्त में लड़कियों से बातचीत मेल मिलाप से बचें।

काम तत्व के ज्ञान-विज्ञान को भी समझा जाए-

वीर्य कैसे बनता है?

वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान धातु है। भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। श्री सुश्रुताचार्य ने लिखा हैः

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते।

मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्र संभवः।।

जो भोजन पचता हैउसका पहले रस बनता है। (भोजन से रस बनने में  दिन लगते हैं) पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पाँच दिन बाद रक्त से मांसउसमेंसे ५ - ५ दिन के अंतर से मेदमेद से हड्डीहड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है। स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे 'रजकहते हैं। इस प्रकार वीर्य बनने में करीब ३०दिन   घण्टे लग जाते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि ३२ किलो भोजन से ८०० ग्राम रक्त बनता है और ८०० ग्राम रक्त से लगभग २० ग्राम वीर्य बनता है।

आकर्षक व्यक्तित्व का कारण

वीर्य के संयम से शरीर में अदभुत आकर्षक शक्ति उत्पन्न होती हैजिसे प्राचीन वैद्य धन्वंतरि ने 'ओजकहा है। यही ओज मनुष्य को परम लाभ-आत्मदर्शन कराने में सहायक बनता है। आप जहाँ-जहाँ भी किसी के जीवन में कुछ विशेषताचेहरे पर तेजवाणी में बलकार्य में उत्साह पायेंगेवहाँ समझो वीर्यरक्षण का ही चमत्कार है।

माली की कहानी

एक माली ने अपना तन मन धन लगाकर कई दिनों तक परिश्रम करके एक सुंदर बगीचा तैयार कियाजिसमें भाँति-भाँति के मधुर सुगंध युक्त पुष्प खिले। उन पुष्पों से उसने बढ़िया इत्र तैयार किया। फिर उसने क्या कियाजानते हो ? उस इत्र को एक गंदी नाली (मोरी) में बहा दिया। अरे! इतने दिनों के परिश्रम से तैयार किये गये इत्र कोजिसकी सुगंध से उसका घर महकने वाला थाउसने नाली में बहा दिया! आप कहेंगे कि 'वह माली बड़ा मूर्ख थापागल था.....मगर अपने-आप में ही झाँककर देंखेंउस माली को कहीं और ढूँढने की जरूरत नहीं हैहममें से अधिकांश लोग ऐसे ही माली हैं।

वीर्य बचपन से लेकर आज तकयानी १५-२० वर्षों में तैयार होकर ओजरूप में शरीर में विद्यमान रहकर तेजबल और स्फूर्ति देता रहा। अभी भी जो करीब ३० दिन के परिश्रम की कमाई थीउसे यों ही सामान्य आवेग में आकर अविवेकपूर्वक खर्च कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है! क्या यह उस माली जैसा ही कर्म नहीं हैवह माली तो दो-चार बार यह भूल करने के बाद किसी के समझाने पर संभल भी गया होगाफिर वही की वही भूल नहीं दोहरायी होगी परंतु आज तो कई लोग वही भूल दोहराते रहते हैं। अंत में पश्चाताप ही हाथ लगता है। क्षणिक सुख के लिए व्यक्ति कामांध होकर बड़े उत्साह से इस मैथुनरूपी कृत्य में पड़ता है परंतु कृत्य पूरा होते ही वह मुर्दे जैसा हो जाता है। होगा हीउसे पता ही नहीं कि सुख तो नहीं मिला केवल सुखाभास हुआ परंतु उसमें उसने ३०-४० दिन की अपनी कमाई खो दी।

युवावस्था आने तक वीर्य संचय होता है। वह शरीर में ओज के रूप में स्थित रहता है। वीर्यक्षय से वह तो नष्ट होता ही हैसाथ ही अति मैथुन से हड्डियों में से भी कुछ सफेद अंश निकलने लगता हैजिससे युवक अत्यधिक कमजोर होकर नपुंसक भी बन जाते हैं। फिर वे किसी के सम्मुख आँख उठाकर भी नहीं देख पाते। उनका जीवन नारकीय बन जाता है। वीर्यरक्षण का इतना महत्त्व होने के कारण ही कब मैथुन करनाकिससे करनाजीवन में कितनी बार करना आदि निर्देश हमारे ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में दे रखे हैं।

सृष्टि क्रम के लिए मैथुनः एक प्राकृतिक व्यवस्था

शरीर से वीर्य-व्यय क्षणिक सुख के लिए प्रकृति की व्यवस्था नहीं है। संतानोत्पत्ति के लिए इसका वास्तविक उपयोग है। यह सृष्टि चलती रहे इसके लिए संतानोत्पत्ति जरूरी है। प्रकृति में हर प्रकार की वनस्पति व प्राणिवर्ग में यह काम-प्रवृत्ति स्वभावतः पायी जाती है। इसके वशीभूत होकर हर प्राणी मैथुन करता है व उसका सुख भी उसे मिलता है किंतु इस प्राकृतिक व्यवस्था को ही बार-बार क्षणिक सुख का आधार बना लेना कहाँ की बुद्धिमानी है ! पशु भी अपनी ऋतु के अनुसार ही कामवृत्ति में प्रवृत्त होते हैं और स्वस्थ रहते हैं तो क्या मनुष्य पशुवर्ग से भी गया बीता है ? पशुओं में तो बुद्धि तत्व विकसित नहीं होता पर मनुष्य में तो उसका पूर्ण विकास होता है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।

भोजन करनाभयभीत होनामैथुन करना और सो जाना – ये तो पशु भी करते है। पशु-शरीर में रहकर हम यह सब करते आये हैं। अब मनुष्य-शरीर मिला हैअब भी यदि बुद्धि विवेकपूर्वक अपने जीवन को नहीं चलाया व क्षणिक सुखों के पीछे ही दौड़ते रहे तो अपने मूल लक्ष्य पर हम कैसे पहुँच पायेंगे?

   जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है। मैथुन के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है। रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है।  ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेजवाणी में प्रभावरोग प्रतिरोधक क्षमताकार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है। कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार से सम्बन्ध, ईश्वर बनने की शक्ति का मार्ग वीर्य रक्षण ही है|

    स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के आठ प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है - 1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना। 2. उन्हें स्पर्श करना। 3. सविलास की क्रीड़ा करना।4. स्त्री के गुणों की प्रशंसा करना। 5. एकांत में संलाप करना। 6. कामुक कर्म का दृढ़ निश्चय करना। 7. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना। 8. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया।

    इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया (हस्त मैथुन से हानि समझें) आदि इसमें शामिल है। शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगता है और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है। ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है। अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता।

    धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तानोत्पत्ति और बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है। इस प्रकार के आचरण को संसार के सब विद्वान और विचारकों ने गर्हित तथा मानव जीवन को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला माना है।

    प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से एक जिज्ञासु ने पूछा - मनुष्य को स्त्री प्रसंग कितनी बार करना चाहिएजवाब में सुकरात ने कहा जीवन में एक बार। जिज्ञासु व्यक्ति ने असंतोष व्यक्त करते हुए पूछा कि इतने से संतोष न हो तोसुकरात ने कहा - वर्ष में एक बार। इससे भी उस व्यक्ति को सन्तुष्टि नहीं हुई तो कहा - माह में एक बार। इस पर भी असन्तोष जाहिर करने पर सुकरात ने कहा - ‘‘जाओ पहले सिर पर कफन बाँध लो और अपने लिए कब्र खुदवालो फिर चाहे जो भी करो।’’

स्रोतः ऋषि प्रसादअक्तूबर 2010पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 214

ब्रह्मचर्य का महिमा गान :-

विद्वानोंचिंतकों और चिकित्सकों की दृष्टि में ब्रह्मचर्य

ब्रह्म के लिए चर्या (आचरण) ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य अर्थात् सभी इन्द्रियों पर संयमसभी इन्द्रियों का उचित उपयोग।

मुहम्मद स्वयं मुसलमानों का भयानक शत्रु

धृतराष्ट्र के न्यायपालिका ने जुए में हारने के बाद पांडवों को निर्णय दिया था कि दास के अधिकार नहीं होतेमुसलमान स्वेच्छा से खतना करा कर अपनी कब्र खोद रहे है। इस्लाम अपने अनुयायियों का ही शत्रु है। इस्लाम का अल्लाह अपने अनुयायी मुसलमानों से वादे जन्नत की करता हैलेकिन १४०० से अधिक वर्षो से मुसलमानों को कब्र में सड़ा रहा है और आगे कयामत तक सड़ाएगा। मुसलमान यह न भूलें कि ईसाई वैदिक सनातन संस्कृति को मिटाने के लिए उनका दोहन कर रहे हैं| यदि वैदिक सनातन संस्कृति मिट गई तो मुसलमानों को मिटने में समय नहीं लगेगा|

 सन्दर्भ पुस्तकें :-

 1.    ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता।

 2.  आध्यात्मिक काम-विज्ञान।

 3.    ब्रह्मचर्य साधना (स्वामी शिवानन्द)

क्या आप तेजस्वी एवं बलवान बनना चाहते हैं?

संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है। चाहे किसी के पास कितने ही सांसारिक सुख-वैभव और भोग-सामग्रियाँ क्यों न होंपर यदि वह स्वस्थ नहीं है तो उसके लिए वे सब साधन सामग्रियाँ व्यर्थ हैं। आरोग्य-शास्त्र के आचार्यों ने उत्तम स्वास्थ्य के लिए मूल चार बाते बतलायी हैं- आहारश्रमविश्राम और ब्रह्मचर्य।ब्रह्मचर्य के विषय में भगवान धन्वंतरी ने कहा हैः 'जो शांति-कांतिस्मृतिज्ञानआरोग्य और उत्तम संतति चाहता हो उसे संसार के सर्वोत्तम धर्म 'ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिए। आयुर्वेद के आचार्य वाग्भट्ट का कथन हैः 'संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है। आयुर्वेद के आदि ग्रन्थ 'चरक संहितामें ब्रह्मचर्य को सांसारिक सुख का साधन ही नहींमोक्ष का दाता भी बताया गया हैः

सत्तामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्।

ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः।।

'सज्जनों की सेवादुर्जनों का त्यागब्रह्मचर्यउपवासधर्मशास्त्र के नियमों का  ज्ञान और अभ्यास आत्मकल्याण का मार्ग है।'              (दू.भा. 143)

आयुर्वेद के महान आचार्यों ने सभी श्रेणियों के मनुष्यों को चेतावनी दी है कि यदि वे अपने स्वास्थ्य और आरोग्य को स्थिर रखते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने के इच्छुक हैं तो प्रयत्नपूर्वक वीर्यरक्षा करें। वीर्य एक ऐसी पूँजी हैजिसे बाजार से खरीदा नहीं जा सकताजिसके अपव्यय से व्यक्ति इतना दरिद्र बन जाता है कि प्रकृति भी उसके ऊपर दया नहीं करती। उसका आरोग्य लुट जाता है और आयु क्षीण हो जाती है। यह पूँजी कोई उधार नहीं दे सकता। इसकी भिक्षा नहीं माँगी जा सकती। अतः सावधान !

जो नवयुवक सिनेमा देखकरकाम विकार बढ़ानेवाली पुस्तकें पढ़कर या अनुभवहीन लोगों की दलीलें सुनकर स्वयं भी ब्रह्मचर्य को निरर्थक कहने लगते हैंवे अपने चारों तरफ निगाह दौड़ाकर अपने साथियों की दशा देखें। उनमें से हजारों जवानी में ही शक्तिहीनता का अनुभव करके ताकत की दवाएँ या टॉनिक आदि ढूँढने लगते हैं। हजारों ऐसे भी हैं जो भयंकर रोगों के शिकार होकर अपने जीवन को बरबाद कर लेते हैं।

नेत्र व कपोल अंदर धंस जाना, कोई रोग न होने पर भी शरीर का जर्जर, ढीला सा रहना, गालों में झाँई-मुँहासे, काले चकते पड़ना, जोड़ों में दर्द, तलवे तथा हथेली पसीजना, अपच और कब्जियत, रीढ़ की हड्डी का झुक जाना, एकाएक आँखों के सामने अँधेरा छा जाना, मूर्छा आ जाना, छाती के मध्य भाग का अंदर धंस जाना, हड्डियाँ दिखना, आवाज का रूखा और अप्रिय बन जाना, सिर, कमर तथा छाती में दर्द उत्पन्न होना ये वे शारीरिक विकार हैं जो वीर्य रक्षा न करने वाले युवकों में पाये जाते हैं।

धिक्कार है उस पापमय जिंदगी पर, जो मक्खियों की तरह पाप के विष्ठा के ऊपर भिनभिनाने में और विषय-भोगों में व्यतीत होती है! जिस तत्व को शरीर का राजा कहा जाता है और बल, ओज, तेज, साहस, उत्साह आदि सब जिससे स्थिर रहते हैं, उसको नष्ट करके ब्रह्मचर्य को निरर्थक तथा अवैज्ञानिक कहने वाले अभागे लोग जीवन में सुख-शांति और सफलता किस प्रकार पा सकेंगे? ऐसे लोग निश्चय ही दुराचारी, दुर्गुणी, शठ, लम्पट बनकर अपना जीवन नष्ट करते हैं और जिस समाज में रहते हैं उसे भी तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा नीचे गिराते हैं।

चारित्रिक पतन के कारणों में अश्लील साहित्य का भी हाथ है। निम्न प्रवृत्तियों के अनेक लेखक चरित्र की गरिमा को बिल्कुल भुला बैठे हैं। आज लेखकों की एक ऐसी श्रेणी पैदा  हो गयी है जो यौन दुराचार तथा कामुकता की बातों का यथा तथ्य वर्णन करने में ही अपनी विशेषता मानते है। इस प्रकार की पुस्तकों तथा पत्रिकाओं का पठन युवकों के लिएबहुत घातक होता है। बड़े नगरों में कुछ पुस्तक विक्रेता सड़कों पर अश्लील चित्र एवं पुस्तकें बेचते हैं। अखबारों के रंगीन पृष्ठों पर ऐसे चित्र छापे जाते हैं जिन्हें देखकर बेशर्मी भी शरमा जाय।

जीवन के जिस क्षेत्र में देखियेसिनेमा का कुप्रभाव दृष्टिगोचर होता है। सिनेमा तो शैतान का जादूकुमार्ग का कुआँकुत्सित कल्पनाओं का भण्डार है। मनोरंजन के नाम पर स्त्रियों के अर्धनग्न अंगों का प्रदर्शन करकेअश्लीलतापूर्ण गाने और नाच दिखाकर विद्यार्थियों तथा युवक-युवतियों में जिन वासनाओं और कुप्रवृत्तियों को भड़काया जाता है उनसे उनका नैतिक स्तर चरमरा जाता है। किशोरोंयुवकों तथा विद्यार्थियों का जितना पतन सिनेमा ने किया हैउतना अन्य किसी ने नहीं किया।

छोटे-छोटे बच्चे बीड़ी-सिगरेट फूँकते हैंपानमसाला खाते हैं। सिनेमा के भद्दे गाने गाते हैंकुचेष्टाएँ करते फिरते हैं। स्वयं को पापाचरण में डालते हैं। वीर्यनाश का फल उस समय तो विदित नहीं होता परंतु कुछ आयु बढ़ने पर उनके मोह का पर्दा हटता है। फिर वे अपने अज्ञान के लिए पश्चाताप करते हैं। ऐसे बूढ़े नवयुवक आज गली-गली में वीर्यवर्धक चूरनचटनीमाजूनगोलियाँ ढूँढते फिरते हैं लेकिन उन्हें घोर निराशा  ही हाथ लगती है। वे ठगे जाते हैं। अतः प्रत्येक मातापिताअध्यापकसामाजिक संस्था तथा धार्मिक संगठन कृपा करके पतन की गहरी खाई में गिर रही युवा पीढ़ी को बचाने का प्रयास करे।

यदि समाज सदाचार को महत्त्व देने वाला हो और चरित्र हीनता को हेय दृष्टि से देखता हो तो बहुत कम व्यक्ति कुमार्ग पर जाने का साहस करेंगे। यदि समाज का सदाचारी भाग प्रभावशाली हो तो व्यभिचार के इच्छुक भी गलत मार्ग पर चलने से रुक जायेंगे। सदाचारी व्यक्ति अपना तथा अपने देश और समाज का उत्थान कर सकता है और किसी उच्चलक्ष्य को पूरा कर लोक और परलोक में सदगति का अधिकारी बन सकता है।

जैसे सूर्य संसार को प्रकाश देता है, वैसे ही वीर्य मनुष्य और पशु-पक्षियों में अपना प्रभाव दिखाता है। जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों से रंग-बिरंगे फूल विकसित होकर प्रकृति का सौन्दर्य बढ़ाते हैं, इसी प्रकार यह वीर्य भी अपने भिन्न-भिन्न स्वरूपों में अपनी प्रभा की छटा दिखाता है। ब्रह्मचर्य से बुद्धि प्रखर होती है, इन्द्रियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, चित्त में एकाग्रता आती है, आत्मिक बल बढ़ता है, आत्मनिर्भरता, निर्भीकता आदि दैवी गुण स्वतः प्रकट होने लगते हैं। वीर्यवान पुरुषार्थी होता है, कठिनाई का मुकाबला कर सकता है। वह सजीव, शक्तिशाली और दृढ़निश्चयी होता है। उसे रोग नहीं सताते, वासनाएँ चंचल नहीं बनातीं, दुर्बलताएँ विवश नहीं करतीं। वह प्रतिभाशाली व्यक्तित्व प्राप्त करता है और दया, क्षमा, शांति, परोपकार, भक्ति, प्रेम, स्वतंत्रता तथा सत्य द्वारा पुण्यात्मा बनता है। धन्य हैं ऐसे वीर्यरक्षक युवा।

परशुरामहनुमान और भीष्म इसी व्रत के बल पर न केवल अतुलित बलधाम बनेबल्कि उन्होंने जरा और मृत्यु तक को जीत लिया। हनुमान ने समुद्र पार कर दिखाया और अकेले परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से आततायी और अनाचारी राजाओं को नष्ट कर डाला। परशुराम और हनुमान के पास तो मृत्यु आयी ही नहींपर भीष्म ने तो उसे आने पर डाँट कर भगा दिया और तब रोम-रोम में बिँधे बाणों की सेज पर तब तक सुखपूर्वक लेटे रहेजब तक सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश नहीं हुआ। सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश हो जाने पर ही उन्होंने स्वयं मृत्यु का वरण किया। शर शय्या पर लेटे हुए भी वे केवल जीवित ही नहीं बने रहेअपितु स्वस्थ और चैतन्य भी बने रहे। महाभारत के युद्ध के पश्चात उन्होंने इसी अवस्था में पाण्डवों को धर्म तथा ज्ञान का आदर्श उपदेश भी दिया। यह सारा चमत्कार उस ब्रह्मचर्य-व्रत का ही थाजिसका उन्होंने आजीवन पालन किया था।

दीपक का तेल बाती से होता हुआ उसके सिरे पर पहुँचकर प्रकाश उत्पन्न करता है लेकिन यदि दीपक की पेंदी में छेद हो तो न तेल बचेगा और न दीपक जलेगा। यौनशक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाना प्रयत्न और अभ्यास के द्वारा संभव है। कालिदास ने प्रयत्न और अभ्यास से इसे सिद्ध करके जड़बुद्धि से महाकवि बनने में सफलता प्राप्त की। जो पत्नी को एक क्षण के लिए छोड़ने के लिए तैयार नहीं थेऐसे तुलसीदास जी ने जब संयमब्रह्मचर्य की दिशा पकड़ी तो वे श्रीरामचरितमानस जैसे ग्रंथ के रचयिता और संत-महापुरुष बन गये। वीर्य को ऊर्ध्वमुखी बनाकर संसार में आश्चर्य जनक सफलता प्राप्त करने वाली ज्ञात-अज्ञात विभूतियों का विवरण इकट्ठा किया जाय तो उनकी संख्या हजारों में नहींलाखों में हो सकती है।

रामकृष्ण परमहंस विवाहित होकर भी योगियों की तरह रहेवे सदैव आनंदमग्न रहते थे। स्वामी रामतीर्थ और महात्मा बुद्ध ने तो परमात्म-सुख के लिए तरुणी पत्नी तक का परित्याग कर दिया था। ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द ब्रह्मचर्य के ओज-तेज से सम्पन्न होकर अमर हो गये। न्यूटन के मस्तिष्क में यौनाकर्षण उठा होता तो उसने अपना बुद्धि-कौशल सृष्टि के रहस्य जानने की अपेक्षा कामसुख प्राप्त करने में झोंक दिया होता।

संसार वीर्यवान के लिये है। वीर्यवान जातियों ने संसार में राज्य किया और वीर्यहीन होने पर उनका नामोनिशान मिट गया। वीर्यहीन डरपोककायरदीन-हीन और दुर्बल होता है। ज्यों-ज्यों वीर्यशक्ति क्षीण होती है मानोंमृत्यु का संदेश सुनाती है। वीर्य को नष्ट करने वाला जीवन भर रोगीदुर्भाग्यशाली और दुःखी रहता है। उसका स्वभाव चिड़चिड़ाक्रोधी और रूक्ष बन जाता है। उसके मन में कामी विचार हुड़दंग मचाते रहते हैंमानसिक दुर्बलता बढ़ जाती हैस्मृति कमजोर हो जाती है। अतएव हम वीर्यहीन बनने के लिए तैयार नहीं हैंहम तभी तक सम्पन्न रहेजब तक हमारे गुरुकुल रहेहमारे यहाँ सन १८३५ तक मैकाले को एक भी चोर या भिखारी नहीं मिलाआज सभी चोर और भिखारी हैंहमारा राज्य संसार पर तभी तक था जब तक हम सच्चरित्र और वीर्यवान थे|

लोकतंत्र, ईसाइयत और इस्लाम की पंथनिरपेक्षता घातक है और अन्य धर्मावलम्बी के लिए मात्र दो विकल्प धर्मान्तरण कर दास बनना या मृत्यु प्रस्तुत करती है| अन्य धर्मावलम्बी से वे वैसा ही अच्छा व्यवहार कर सकते हैं, जैसे किसान अपने पशु के साथ करता है| लेकिन अन्य धर्मावलम्बी उनका भाई या मित्र नहीं हो सकता|

यह कैसा लोकतंत्र हैनागरिकों को आजादी कौन सी मिली हैक्या मीडिया सोनिया से पूछेगी?

अर्थ: कैकेय देश के राजा अश्वपति ने कहा, “मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, कंजूस नहीं, शराबी नहीं, ऐसा कोई गृहस्थ नहीं है, जो बिना यज्ञ किये भोजन करता हो, ही अविद्वान है और ही कोई व्यभिचारी है, फिर व्यभिचारी स्त्री कैसे होगी?”

वैदिक राज्य में चोर, भिखारी और व्यभिचारी नहीं होते थे| स्वयं मैकाले ने फरवरी १८३५ को इस बात की पुष्टि की है| लेकिन इंडिया का संविधान ही चोर है| भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३९() लुप्त अनुच्छेद ३१| लेकिन भारतीय संविधान को चोर कहना एलिजाबेथ के रोम राज्य के विरद्ध भारतीय दंड संहिता के धारा १५३ २९५ के अंतर्गत अपराध है और संसद विधानसभाओं के विशेषाधिकार का हनन भी| जो भी इस सच्चाई को कहे या लिखेगा, उसे एलिजाबेथ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ में जेल भेजवा देंगी| मुसलमान ईश निंदा में कत्ल करेगा| मै ४२ बार हवालात और जेल गया हूँ| और हमारे अधिकारी आज भी जेलों में बंद हैं||

इसके अतिरिक्त मैं नीचे राम चरित मानस की पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ,

“अनुज बधू भगिनी सुत नारी| सुनु सठ कन्या सम ए चारी|

“इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई| ताहि बधें कछु पाप न होई||

राम चरित मानस, किष्किन्धाकाण्ड; ;

अर्थ: [श्री रामजी ने कहा] हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्रवधू और कन्या ए चारों समान हैं| इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता|

सोनिया के ईसा को बुरी दृष्टि की कौन कहे, सीधे बेटी (बाइबल, , कोरिन्थिंस ७:३६) से विवाह करने वाले दास ईसाई व पुत्रवधू (कुरान, ३३:३७-३८) से निकाह करने वाले मुसलमान और धरती के किसी नारी के बलात्कार के बदले स्वर्ग पाने वाले (बाइबल, याशयाह १३:१६) व (कुरान २३:६) दास और भेंड़ ईसाई व मुसलमान और सोनिया के मातहत और उपकरण लोकसेवक वैदिक सनातन धर्म को मिटाने के लिए सम्मानित भद्र पुरुष बन गए हैं! अज़ान द्वारा और आप की नारियों का बलात्कार कर मुसलमान आप को अपमानित कर रहे और वीर्यहीन बन और बना रहे हैं|

वीर्यहीन व्यक्ति अपनी इन्द्रियों और शक्तिवान का दास ही बन सकता है, स्वतन्त्र नहीं रह सकता| हम वीर्यहीन बनने के लिए तैयार नहीं हैं|

विद्या, स्वतंत्रता और विवेक के लिए अब्रह्मी संस्कृतियों' में कोई स्थान नहीं है| कुरान २:३५ व बाइबल, उत्पत्ति २:१७. हम गायत्री मंत्र द्वारा ईश्वर से बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाने की प्रार्थना करते हैं| हमारी गीता मानव मात्र को उपासना की आजादी देती है| (गीता ७:२१), हम आतताई अल्लाह व जेहोवा को भगवान मानने के लिए तैयार नहीं हैं, न जेहोवा और अल्लाह के उपासना की दासता स्वीकार करनेके लिए तैयार हैं| अज़ान व नमाज को पूजा मानने के लिए तैयार नहीं हैं| जो भी ईसाइयत और इस्लाम का समर्थक है, मानव जाति का शत्रु है| वह जीवित नहीं बचेगा!

चरित्र की नई परिभाषाएं

ईसाइयतइस्लामसमाजवाद और प्रजातंत्र अपने अनुयायियों में अपराध बोध को मिटा देते हैं। ज्यों ही कोई व्यक्ति इन मजहबों या कार्लमार्क्स के समाजवाद अथवा प्रजातंत्र में परिवर्तित हो जाता हैउसके लिए लूटहत्याबलात्कारदूसरों को दास बनानागाय खानाआदमी खाना आदि अपराध नहीँ रह जाताअपितु वह जीविकामुक्तिस्वर्ग व गाजी की उपाधि का सरल उपाय बन जाता है। जले पर नमक छिड़कने के लिए इन्हीं पुस्तकों को ईसाई व मुसलमान धर्म पुस्तक कहते हैं। यदि ये धर्म पुस्तकें हैं तो फिर अधर्म व अपराध क्या हैयदि सम्पत्ति समाज की है तो समाज लुटेरा क्यों नहीं?

ऐसे समाज के पास सदाचार कहां हैजिस समाज के पास सदाचार नहीँ है वह भ्रष्टाचार कैसे मिटाएगाअल्लाह व जेहोवा महान इसलिए हैं कि उन्होंने लूटहत्याबलात्कार,दूसरे की मातृभूमि पर बलपूर्वक अधिकार और धर्मान्तरण और राष्ट्रन्तरण के बदले अपने अनुयायियों को जीविकाजन्नत और गाजी की उपाधि दे दिया है।

हर मुसलमान व ईसाई खूनी है| सोनिया कैथोलिक ईसाई है| धर्मपरिवर्तन के लिए उकसाने वाले को कत्ल करने की बाइबल की आज्ञा है| (व्यवस्था विवरण, १३:६-११). व धर्म परिवर्तन करने वाले को कत्ल करने की कुरान की आज्ञा है| (कुरान ४:८९). २०१४ वर्ष पूर्व ईसाई नहीं थे| न १४३५ वर्ष पूर्व मुसलमान ही थे| अतएव धर्मत्यागी सोनिया व हामिद को उनके ही मजहब के अनुसार कत्ल करने का हमे भारतीय दंड संहिता की धारा १०२ से प्राप्त अधिकार है| क्यों कि बाइबल, लूका १९:२७ के ईसा के आदेश से सोनिया हमे कत्ल करेगी और कुरान २१:९८ के आदेश से हामिद अंसारी कत्ल करेगा| इनसे अपनी रक्षा का हमारे पास और कोई मार्ग नहीं है|

ब्रह्मचर्य

प्रश्न:ब्रह्मचर्य कैसे रखें?

उतर:अपनी इन्द्रियों को आकर्षण वाले विषयों में न लगायें। जैसे किसी सुन्दर जीव को देखकर मोहित हो जाना। इससे ब्रह्मचर्य नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि फिर तो पुरुष स्त्री पर मोहित हो जायेगा और फिर ब्रह्मचर्य न रखा जायेगा। मैथुन पर क्रोध करें और उससे डरें।

प्रश्न:स्त्री से आकर्षण तोड़ देने से क्या लाभ है?

उतर:स्त्री से आकर्षण तोड़ देने से वीर्य वृद्धि होती है। क्योंकि फिर स्वप्न में वीर्य स्खलित कभी नहीँ होता है।

प्रश्न: वीर्य वृद्धि के क्या फायदे हैं?

उतर: वीर्य वृद्धि से व्यक्ति बलवान हो जाता है। फिर उस शक्ति को अपनी पढाई में लगावें तो बहुत उतम है। वीर्य वृद्धि से व्यक्ति लम्बी उम्र को प्राप्त होता है।

प्रश्न:क्या ब्रह्मचर्य केवल पुरुषों के लिए है?

उतर:नहीं,स्त्रियां भी ब्रह्मचर्य रखें।

प्रश्न: ब्रह्मचर्य कितने समय के लिये रखें?

उतर: पुरुष ४८ और स्त्री २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्य रखें। लेकिन जो जीवन भर ब्रह्मचर्य चाहें वो तो और भी उतम है। जो विवाहित स्त्री पुरुष अपने बचपन से लेकर विवाह तक वीर्य कभी नहीं स्खलित करतें हैं उनकी संतानें बलवान पैदा होकर लम्बी आयु को प्राप्त होती हैं।

प्रश्न: ब्रह्मचारी कौन होता है?

उतर: जो व्यक्ति केवल ब्रह्म अर्थात वेदविद्या ही के चारों और चक्कर लगाये वह ब्रह्मचारी होता है।

ये सब बातें महर्षि दयानन्दजी के ग्रन्थों ही से लिया गया है। जो इनकी किताबों से ब्रह्मचर्य के उपाय का गहन अध्ययन करने से आता हैवैसा उपाय कहीं अन्य नहीं हैं।

हम जो भोजन हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है। भोजन के बाद रस बनता है जो कि नाडियों में चलता है। फिर बाद में खून बनता है। इस प्रकार से यह क्रम चलता है और अंत में वीर्य बनता है। वीर्य में अनेक गुण होतें हैं। शायद वैज्ञानिक अपनी ही बात को टाल रहें हैं। वैज्ञानिक स्वयं कहतें हैं कि वीर्य में हाई क्वालिटि प्रोटीन,कार्बोहाईड्रेट आदि होतें हैं। जो कि हमारे शरीर को बल प्रदान करते हैं।

वीर्य महिमा के समर्थन में मुझे वर्तमान में एक ही प्रमाण देना हैशेर से कई गुने भारी हाथी सदैव झुण्ड में चलते हैंफिर भी अकेले शेर से परास्त होते हैंक्योंकि हाथी कामी होता है और शेर जीवन में एक बार सम्भोग करता हैअतः वीर्यवान|

क्या आपने कभी यह सोचा है कि शेर इतना ताकतवर क्यों होता हैवह अपने जीवन में केवल एक बार बच्चों के लिये मैथुन करता है। जिस वजह से उसमें वीर्य बचा रहता है और वह इतना ताकतवर होता है।

जो वीर्य इकठ्ठा होता है वह जरूरी नहीं है कि धारण क्षमता कम होने से वीर्य बाहर आ जायेगा। वीर्य जहाँ इक्कठा होता है वहाँ से वह नब्बे दिनों बाद पूरे शरीर में चला जाता है। फिर उससे जो सुंदरताशक्तिरोग प्रतिरोधक क्षमता आदि बढती हैं उसका कोई पारावार नहीं होता है।

अयोध्या प्रसाद त्रिपाठीफोन ९१५२५७९०४१

  

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AyodhyaP Tripathi,
Feb 28, 2014, 5:56 AM
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